मेरी बात

रिश्तों की तलाश‍ कविता में

समय के इस भाग में कविता लेखन और वाचन के क्षेत्र में जो चल रहा है उसका का स्पष्ट चेहरा तो समय की धुँध हटने पर ही दिखाई देगा। किन्तु जो थोड़ा बहुत दिखाई दे रहा है उससे यह साफ लग रहा है कि कविता का ध्यान एक बार फिर से रिश्तों की तलाश की और चला गया है। यह बात नहीं कि ऐसा कविता के क्षेत्र में ही हुआ है, भारतीय फिल्में भी इसी दौर से गुजर चुकी हैं और गुजर रहीं हैं। कविता के क्षेत्र में भी यह अचानक संभव नही हुआ। कुछ वक्त पहले तक कविता में जो आक्रोश और गरम तेवर था, इधर अचानक पिघल सा गया है। इसके कई कारण हो सकते हैं, एक तो यह है कि इस तेवर को अपनाने वाली आवाजें थक गईं या फिर सहुलियतें मिलने से चुकने लगीं हैं। निसन्देह इनके एवज में नई आवाजें उठनी चाहिए, और उठी भी, किन्तु बड़ी बेजान और फुसफुसी। कुछ अजीब जरूर लग रहा है, किन्तु समाज में आए परिवर्तनों की ओर निगाह डाली जाए तो कुछ स्थिति समझ में आती है। इसमे कोई सन्देह समाज और उसमें जगने वाली परिस्थितियाँ साहित्य पर अपना प्रभाव डालती जरूर हैं। इस वक्त हम चाहे कितना ही रोना क्यों ना रो लें कि कविता समाज से दूर जा रही है , इस बात में कोई सन्देह नहीं कि कविता आज भी समाज से कहीं ना कहीं जुड़ी है, विशेष रूप से रचना के सन्दर्भ में।

हाँ तो हम बात कर रहे थे, कविता रचना और उसके परिवेश की। तमाम उन सब बातों के, जिनकी दुहाई देकर साहित्य पर संकट की बात की जा रही थी, कविता आज भी लिखी जा रही है। मजेदार बात यह है कि यह लेखन उस समूह में ज्यादा सक्रिय है जो माध्यम बनने का कारण माना जा रहा था। यह बात चीख चीख कर कही जा रही थी कि तकनीकि शिक्षा समाज को साहित्य से जुदा कर रही है, युवाओं के साहित्यिक संस्कार को बिगाड़ रही है। लेकिन यदि नेट के साहित्य को पढ़ा जाए तो अधिकतर कवि लेखक तकनीक से जुड़े लोग हैं, और इनमें से अधिकर विदेश में बसे हैं। यानी कि तकनीक युवकों को साहित्य से अलग नहीं कर रही है, बल्कि कुछ अर्थों में जोड़ ही रही है। रात के अधिकतर भाग को उजाले में बदलने वाले ये युवक जमीन और जबान से इतने दूर चले जाते हैं कि साहित्य या फिर कहे तो लेखन उनके लिए जिन्दगी का विश्राम बन जाता है। अपनों से दूर जाने की कसक और काम का मानसिक दवाब एक ऐसा मनोरंजन चाहती है जो मशीनों की संगत के प्रभाव से छुटकारा दिलवा सके। साहित्य भी इस तरह के मनोरंजनों के दायरे में आता है। यही कारण है कि आज नेट पर जितनी कविताएँ दिख रही हैं, उन में से अधिकतर आई .टी से सम्बन्ध रखने वाले युवकों द्वारा रची जाती हैं। यह स्थिति मात्र हिन्दी में ही नही बल्कि अधिकतर भारतीय भाषाओ में हैं।

आई.टी के छात्र मेधावी होते हैं, इस में कोई संदेह नहीं। कड़ी मेहनत और प्रतिस्पर्धा ही उन्हें इस क्षेत्र में लाती है, अतः उनकी समस्या योग्यता नहीं होती है। बल्कि समस्या होती है कविता के संस्कार की। कविता की यात्रा को नकार कर घिसेपिटे शब्दों का प्रयोग और कविता में कल्पना की कमी इन कविताओं के स्तर को प्रभावशाली बनाने में बाधक बन जाती है। लेकिन इस युवा वर्ग के पास सबसे बड़ी शक्ति है छपने की और एक दूसरे से संवाद की । नेट पत्रिकाएँ और ब्लाग आदि कविता के द्रुत संवाहक बन जाता हैं तुरन्त प्रतिक्रिया भी मिल जाती है, वाह वाह से युक्त यह कविसम्मेलन रचनात्मक विकास की अपेक्षा मनबहलाव का साधन बन जाता है। बिल्कुल उसी तर्ज पर जिस पर विभिन्न चैनलों पर कवि सम्मेलनों को परोसा जा रहा है। ऐसा नहीं है कि इनमें से कोई भी कविता स्तर की नहीं, असलियत तो यह है कि इन लेखकों के गद्य लेखन काफी सशक्त हैं, विशेष रूप से संस्मरणात्मक। उसका कारण यह है कि इन लेखों में ईमानदारी और जिन्दगी से जुड़ाव है। जहाँ घोर साहित्यिक लेखन समाज से दूर जाता जा रहा है, नेट जिन्दगी से जोड़ रहा है। लेकिन जब कविता की बात आती है कविता के संस्कार की बात नकारना काफी मुश्किल हो जाता है। क्यों कि कविता की यात्रा यहीं से शुरु होती है। शब्दों ‌और भावों की बेजान आवृति भावों की पुनरावृत्ति कविता के लिए नया रास्ता बनाने में समर्थ नहीं है। लेकिन इन कविताओं में एक बात स्पष्ट है कि अधिकतर कविताएँ सम्बन्धों के इर्दगिर्द घूमती हैं। ऐसा लगता है कि सम्बन्धों को को नए रूप मे तराशना आज के वक्त की आवाज बन गई है।
इतिहास गवाह है कि जब साहित्य का ध्यान सामाजिक सन्दर्भों से हट कर रिश्तों के इर्द- गिर्द घूमने लगता है , समाज में दो तरह की स्थितियाँ बन रही होती है, एक... समाज का आर्थिक आधार इतना सुदृढ़ हो गया हो, ( कम से कम किसी वर्ग विशेष का ) कि कवि का ध्यान समष्टि से व्यक्ति की ओर केन्द्रित होने लगता है, और दूसरी.. स्थिति इतनी बिगड़ रही हो कि जिन्दा रहने के लिए, या अपने आप को बचाने के लिए एक काल्पनिक माहौल की जरूरत पड़ जाए।
मुझे लगता है कि इस वक्त हम इन दोनो स्थितियों से नहीं गुजर रहे हैं। सामाजिक स्थिति विचित्र सी ही है, एक ओर जीवन स्तर बढ़ा है तो दूसरी ओर अत्याचार, गरीबी, बेबसी भी। आज भी देश में दो तरह की स्थितियाँ हैं। किन्तु जो बात मुझे चिन्तित कर रही है, वह यह है कि आज का साहित्य अभाव के साथ नही खड़ा है, आज साहित्य लाभ चाहता है, वह भावनाओं का व्यापारीकरण चाह रहा है। बिल्कुल वैसे ही जैसे कि कवि अय्यप्पा पणिक्कर की "वीडियो मौत" कविता में बेटा , आसन्नमरणा माँ के दर्द को महसूस करने की अपेक्षा उसकी मौत का वीडियो चाहता है जिसे वह अपने विदेशी मित्रों को दिखा सके ।
अब हमे सोचना है कि हम जो रच रहे हैं वह मात्र स्वान्त सुखाय है, या फिर कुछ सोचने को भी मजबूर करता है।

इसी सोच के साथ कृत्या का अंक प्रस्तुत है। इस अंक में पुनः श्रीनगर से अरुणिमाल को लाए हैं जिनकी कविताओं में घाटियों का दर्द है। अपने अग्रजो को पढ़ते हुए हम काफी कुछ सीख पाते हैं।

प्रिय कवि के रूप में अय्यप्पा पणिक्कर की कविताएँ हैं जो हरदम अपने समय के साथ चलती हैं।

समकालीन कविता में गुजराती और डोगरी के प्रमुख कवियों के साथ चीनी कविताएँ भी हैं, हालाँकि वे समकालीन कविता की श्रेणी में नहीं आती हैं , फिर भी उनकी वेदना आज भी प्रासंगिक है।

अथर्ववेद की प्रेम कविताओं को हम अलग से धारावाहिक रूप में दे रहे हैं। कविता के बारे मे इस बार फिर एक सवाल है कि क्या कविता जिन्दगी की थैरोपी बन सकती है?

मित्रों कृत्या फिर आपके हाथ में है, अपने सुझावों से अवश्य अवगत करवाते रहें


रति सक्सेना

नोट-
पिछले अंको की तरह इस अंक के समस्त चित्र युवा कलाकार विजेन्द्र विज द्वारा बनाए गए हैं। विजेन्द्र ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने कम समय में अन्तराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है । विजेन्द्र ने कंप्यूटर और डिजिटल आर्ट में भी महारत हासिल की है। विजेन्द्र की कलाकृतियाँ अन्तर्राष्टीय स्तर पर खरीदी जाती हैं। विज के चित्रों की अनेक प्रदर्शनियाँ हुईं हैं । विजेन्द्र में प्रतिभा और लगन के साथसाथ नम्रता भी है जिसके के कारण कला में आगे बढ़ने की संभावना बढ़ती जाती है । विज ने अपनी कलाकृतियाँ कृत्या को समर्पित की हैं , इनकी बिक्री से कृत्या के रखरखाव के लिए मदद मिलेगी । जो कलाप्रेमी इन कृतियों को खरीदना चाहते हैं वे कृत्या के संपादक से संपर्क कर सकते हैं । विजेन्द्र से सीधा सम्पर्क करने का पता है

STUDIO VIJ'S
06, Madhuban Building, 54-55 Nehru Place
New Delhi, IN 110019

इस अंक के सारे रेखाचित्र चित्रकार प्रभाकर के कलाकार पुत्र रोशन ने बनाएँ हैं। हमे आशा ‌और विश्वास है कि इस अंक के सारे रेखाचित्र चित्रकार प्रभाकर के कलाकार पुत्र रोशन ने बनाएँ हैं। हमे आशा ‌और विश्वास है कि रोशन भी पिता की तरह नाम कमाएँगे।

अलंकरण हेतु चित्रों का निर्माण संपादक द्वारा किया गया है
 



रति सक्सेना


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