कविता थेरोपी

रामचरित मानस के बारे में
यह बात बार बार सुनी गई है कि इसके वाचन ने किस तरह
सैंकड़ों बंधुआ
मजदूरों को देश से दूर गन्नों के खेतों के बीच मानसिक संबल दिया और
किस तरह उन्ही मजदूरों की आत्मिक शक्ति से एक सुन्दर देश का
निर्माण किया। मारीशस के इतिहास में रामचरित मानस एक का नाम
स्वत्नत्रता संग्रामी के रूप में भले ही ना हो , किन्तु उस पीढ़ी के
जेहन में अवश्य होगा जिसकी यादों से वे काले दिन धुँधले नहीं हुए
हो। कुछ दशक पहले तक भारतीय गाँवों और कस्बों में रामचरित का वाचन
मानसिक थकान से निवृत्ति पाने का माध्यम था। रामचरित मानस का पाठ
हर परिवार के घरेलू आयोजनों का हिस्सा था। हर घरेलू समस्या का
निजात चौपाइयों से लगा लिया जाता था।
जन सामान्य में मानस का पाठ भक्ति से जोड़ देखा जाता है, कोई संदेह
नहीं। किन्तु मानस को मात्र ईश्वर स्मरण का निमित्त मान कर उसके
कविता पक्ष नकारा नहीं जा सकता। मानस का वाचन अनायास श्रोताओं के
मन को कवित्तमय करता है। उसके दोहे, चौपाइयाँ मानस मन को इस तरह
प्लावित करते है कि तमाम नकारात्मक भाव गायब हो जाते हैं। केरल में
कई जगह आज भी पुराने आचारों का पालन होता है । इनमें से एक है
कर्कटं मास में (केरलीय सावन से
पहले का महिना ) अध्यात्म रामायण का वाचन होता है । कर्कटं मास
बीमारियों का महिना माना जाता है क्योकि इससे पूर्व भीषण गर्मी के
बाद जबरदस्त बारीश का दौर बीत चुका होता है । अतः कर्कट मास में
लोग आयुर्वैदिक चिकित्सा करवाते हैं और नियम से अध्यात्म रामायण का
पाठ करते हैं । अध्यात्म रामायण रामचरित मानस की तरह ही मलयालम
कवित्वकला का बेजोड़ नमूना है। चिकित्सा के साथ रामायण का पाठ क्या
इस बात की सूचना नही कि कविता सर्वांग चिकित्सा का एक उपांग है।
शारीरिक चिकित्सा के साथ साथ मानस की चिकित्सा के लिए साहित्य से
बढ़ कर और क्या हो सकता है।

दरअसल कविता अनजाने में जो चिकित्सा करती है, उससे हम अनजान नहीं
हैं। कवि और पीड़ा का साथ इस बात की पुष्टि करता है कविता पीड़ा से
निवृत्ति पाने का एक उपाय है। यदि हम पुराने जमाने की बात छोड़ भी
दे तो वर्तमान वक्त में ना तो कविता की पुस्तके कम हुई हैं और न ही
लेखन। वेब की दुनिया में भी धड़ाधड़ कविताएँ लिखी जा रही हैं। यह
स्थिति भारत में ही नहीं विश्व के अनेक देशों में है। ऐसा भी देखने
में आया है कि देश में रह कर साहित्य में विशेष रुचि न रखने वाले
युवाजन विदेश के अकेलेपन को भोगते हैं तो साहित्य में त्रास पाने
की कोशिश करते हैं।
आखिर क्या कारण है कि भारतीय भाषाओं पर गहरे संकट की बात करने वाले
इस समय में कविता रचना के उत्साह में कमी नहीं आई है । भाषा से दूर
भागने वाले युवक भी साहित्य से अपने आप को काट नहीं पा रहे हैं ।
यहाँ पर हम केवल कविता की बात कर रहे हैं, कविता के संस्कार की
नहीं। यानी कि यह बात अलग है कि इस तरह की कविताएँ साहित्य को क्या
दे पा रहीं हैं । लेकिन इसमे कोई सन्देह नहीं कि ये कविताएँ जमीन
से कटे लोगों को जीने का संबल जरूर दे रही हैं ।
अब हम इस बात पर विचार करते कि आखिर कविता में ऐसा क्या है जो
आकर्षित करता है ? या मन को सन्तुलित करता है। दरअसल कविता में
पाँचों इन्द्रियों को त्वरित करने की क्षमता होती है। कविता बहुत
कुछ को बहुत कम में कहती है । यानी कि कविता में पाठक या श्रोता की
प्रतिभागिता काफी होती है । पाठक कविता में अपने आप को खोजने के
साथसाथ कवि के बनाए कल्पना लोक से अलग भी अपना एक लोक बना सकता
है । यह स्वच्छन्दता उसे रचनात्मकता के करीब ले जाती है । अच्छी
कविता पढ़ते वक्त रचनाकार और पाठक में काफी कम भेद रह जाता है। इस
तरह के वाचन से मन और मस्तिष्क दोनों सक्रिय हो जाते हैं । यह
सक्रियता मन और तन दोनों के कष्टमय होने की स्थिति में सहायक होती
हैं । कल्पना शक्ति एक अलग लोक का निर्माण कर देती है । यह नया लोक
व्यक्ति को उसके वर्तमान से कुछ वक्त के लिए दूर ले जाते है ।
परिणाम स्वरूप पाठक कुछ वक्त के लिए अपने आसपास से कट जाता है । यह
स्थिति सायास नहीं होती है, अतः मानसिक सन्तुलन आसानी से होता है ।
आकर्षण शक्ति कहानी में भी होती है , कभी कभी कविता से कई गुना
ज्यादा. किन्तु कहानी कल्पना को अवकाश कम देती है। पाठक को कथा
सूत्र के साथ साथ चलना पड़ता है । अतः वे कहानियाँ पाठक को ज्यादा
बाँध पाती हैं जो कविता के समान कल्पना को अवकाश दें। रामचरित मानस
या अध्यात्म रामायण में कथा के साथ उच्च कोटि की कविता भी है। यही
पाठक या श्रोता को मन्त्र के समान बाँधने मे सक्षम है। कविता के
साथ दूसरी खूबी यह है कि यह मन के हर भाव को स्थान देती है। हर रस
को अभिव्यक्ति देती है, परिणाम स्वरूप कविता में अभिव्यक्ति की
क्षमता अधिक होती है । इसी कारण से कविता पाठन या वाचन मन की
ग्रन्थियों को खोल देता है । किसी अच्छी प्रेम कविता पढ़ते वक्त
पाठक अपने को प्रेम से जोड़ कर देखता है , वह कवि के प्रेम लोक से
निकल कर अपने संसार में चला आता है , इस तरह, जो उससे जिन्दगी में
खो गया है कविता में मिल जाता है । मीरा की कविता मात्र इसलिए
प्रिय नहीं है कि उनमें कृष्ण भक्ति है बल्कि इसलिए भी हैं कि
उनमें प्रेम के लिए दीवानगी है , यह दीवानगी श्रोता को अपने मन में
अंकुरित या अनांकुरित प्रेम का स्मरण दिला देती है। इस तरह मीरा का
प्रेम सर्व व्यापी बन जाता है । यही स्थति पीड़ा या अन्य भावनाओं के
सन्दर्भ में होती है । कवि की पीड़ा किस तरह अनायास पाठक की पीड़ा को
अभिव्यक्त करने लगती है , पाठक समझ ही नहीं पाता है । एक पीड़ित
व्यक्ति को किसी भी कवि की कविता पढ़ कर अपनी स्वयं की पीड़ा से एक
स्थिति तक छुटकारा मिल जाता है क्यों कि उसके दुख को शब्द मिल जाते
हैं । हमें नही भूलना चाहिए कि गीत या गजल गायन कविता का विस्तरण
है । और गजलों के प्रचलन में उनके भीतर छुपी कविता को नहीं नकारना
चाहिए ।
आजकल जोर से कविता वाचन का प्रचलन कम हो गया है, अन्यथा इस तरह का
वाचन गले और फेफड़ों को भी सक्रिय करता है। रामचरित आदि के वाचन में
श्रवण सुख भी प्रधान होता है जो मन में रस के संचार द्वारा
जीवनदायक तत्वों में इजाफा करता है। किसी भी अच्छी कविता का खुल कर
वाचन किया जाए या उसे गीत या गजल के रूप में सुना जाए तो मानसिक
कष्ट का निवारण स्वयं ही हो जाएगा।
संगीत या नृत्य कविता का ही परिष्कृत रूप हैं । लेकिन उनका प्रभाव
कविता वाचन से भिन्न होता है। नृत्य कविता को चक्षु ग्राह्य बनाता
हैं , अतः उसमें कविता वाचन की अपेक्षा अलग प्रभाव होता है नृत्य
देखते वक्त आनन्दाभिव्यक्ति अधिक होती है , इसमें कोई सन्देह नहीं,
किन्तु वह उतनी प्रगाढ़ नहीं हो पाती जितनी कविता के और उसके अन्य
रूपों के साथ संभव है । फिर भी नृत्य एक सीमा तक ग्रन्थियों को
खोलता है , कोई सन्देह नहीं ।
आज जब व्यक्ति भीड़ में अकेला पड़ता जा रहा है कविता को लेकर कई
प्रयोग किए जा सकते है । कविता एक ऐसी थैरोपी के रूप में उपयोगी हो
सकती है जिसका का प्रयोग चिकित्सा के साथ किया जा सकता है। आज जो
सर्वांग चिकित्सा की बात चल रही है उसमें कविता का महत्वपूर्ण
स्थान दिया जाना चाहिए है। लेकिन इस में कोई सन्देह नहीं कि पहले
कविता के सही प्रयोग पर कुछ चिन्तन भी होना जरूरी है।
अपनी बात मैं एक कहानी से खत्म करती हूँ जिसे ना जाने कब पढ़ा था,
अब मुझे ना कहानी याद है ना यह कि कब और कहाँ पढ़ी थी लेकिन कुछ
हिस्सा मस्तिष्क में अटका पड़ा है और वह शायद कुछ इस तरह है.....
एक विज्ञान के नामी प्रोफेसर अचानक बीमार हुए, कुछ इस तरह कि
बीमारी डाक्टरों की समझ से काफी ऊपर निकली। वे लड़खड़ाने लगे थे ,चल
नहीं पा रहे थे। शिष्यों में कई नामी डाक्टर थे, सभी ने सब कुछ
अजमा लिया। स्थिति यहाँ तक बिगड़ी कि उन्हें बिस्तर पर लेटे रहने को
मजबूर होना पड़ा। इस बीच उनके अनेक मित्रों में से एक अंग्रेजी
साहित्य के प्रोफेसर उनके पास आते रहे। प्रोफेसर हमेशा अपने इन
मित्र की हँसी बनाते रहे थे कि वे मरे हुओं को पढ़ा कर छात्रों का
भविष्य क्यों बिगाड़ रहे हैं। अंग्रजी के प्रोफेसर मित्र आते तो कभी
भी बीमारी का जिक्र भी नही करते, बस बैठे रहते । तभी प्रोफेसर की
बेटी अंग्रेजी कविता के बारे में कुछ सन्देह निवारण के लिए इन
मित्र प्रोफेसर से बातचीत करने लगी। अंग्रेजी के प्रोफेसर उसे कुछ
कविताएँ सुनाते और दोनों में कविता के शिल्प आदि को लेकर संवाद
होता। विज्ञान के प्रोफेसर मूक श्रोता थे। आरंभ में तो उन्हें दोनो
की बातें बकवास लगती किन्तु धीरे-धीरे वे भी उस चर्चा में शामिल
होने लगे। कुछ दिनों में वे ना केवल उठे बल्कि चलने भी लगे।
लेकिन कहानी यहीं पर खत्म नही हुई । एक बार वे मार्निंग वाक के लिए
जा रहे थे , उन्हे सूनी सड़क पर एक नोट पड़ा मिला , आसपास किसी को ना
देखकर उन्होंने यह सोच कर नोट जेब में रख लिया कि यदि कोई मिलेगा
तो पूछ लेंगे और वापिस कर देंगे , किन्तु वह नोट उनकी जेब में ही
रह गया। कुछ ऐसा हुआ कि अब प्रोफेसर साहब की निगाहें बादलों या
दरख्तों या फिर उन पर गाती चिड़ियाओं पर ना जाकर बार- बार जमीन पर
जाने लगी । कुछ दिनों में प्रोफेसर साहब फिर बिस्तर पर थे ।
बस मैं यह कहना चाहती हूँ कि कविता हकीकत में रहती हुई भी उस
कल्पना से साक्षात्कार करवाती है जो साक्षात नहीं है, यही जिन्दगी
की प्रेरणा बन जाती है।
रति सक्सेना