अरुणिमाल



कश्मीरी साहित्य में नारी मन की विरह वेदना, गहरा दर्द ‌और टीस को व्यक्त करने वाली कविताओं का नाम लिया जाए तो अरुणिमाल ( १९३७‍ से लेकर १७७८ ) का नाम सहज कौंध जाता है। वे कश्मीरी वचन काव्य की उत्कृष्ट कवयित्री हैं। हालाँकि वचन काव्य का सृजन सबसे पहले हब्बा खातून ( १५५३-१६०५) ने किया है। अरुणिमाल बारामुला जिले के पलहालन गाँव में जनकी थीं। अत्यन्त सुन्दर, कुशाग्र और संवेदनशील ग्राम बाला अरुणिमाल का विवाह कच्ची उम्र में ही श्री नगर शहर के मुंशी भवानीदास काचरू के साथ हो गया था। मुंशी भवानीदास काचरू त्तकालीन कश्मीर के बर्बर अफगान शासकों के यहाँ प्रतिष्ठित कवि थे। आप फारसी के शीर्षस्थ कवि थे।

अरुणिमाल का प्रेम और सौन्दर्य पति को दरबारी ताम के आगे फीका लगा। उन्होंने अरुणिमाल को विवाह के कुछ दिनो बाद ही छोड़ दिया। अरुणिमाल ने पति को रिझाने का हर संभव प्रयास किया। संगीत सीखा, दरबारी आदाब सीखे, किन्तु वे सल नहीं हो पाईं और उन्हें शेष जीवन पति के विरह में तड़पते हुए मायके में बिताना पड़ा। विरह, प्रतीक्षा और वेदना आपकी कविता के केन्द्र भाव हैं।

किवंदती है मुंशी भवानीदास काचरू अंततः जब अरुणिमाल के पास लौटे तो अरुणिमाल की अर्थी निकल रही थी।


अरुणिमाल की कविताएँ

१‍

अरणि पुष्प सी मैं हुई पीली
सावन की उजली चमेली
कब लौट मुझे वे दर्शन देंगे

झेल रही हूँ उलाहने नित
आँच विरह की दग्ध किए है
कौन उसे जा हाल बखाने
कब लौट मुझे वे दर्शन देंगे

कंद मिश्री की आरटी उतारी
फिर छल कर मुझे कहाँ गये
बीच सबों के उपहास किया
कब लौट मुझे वे दर्शन देंगे

मेरी कौन सौतन भरमाई उन्हें
जो मुझे छोड़ दूसरी ने लुभाया
सजूँगी मैं भी अस्त्र शस्त्र से
कब लौट मुझे वे दर्शन देंगे

सुबह उठूँगी मैं मुँह अंधेरे
पर्वत पर्वत ढ़ूढ़ूंगी उनको
कब लाकर कमाई मेरे हाथ रखेंगे
कब लौट मुझे वे दर्शन देंगे

मैं राह जोतती बीच पलहालन
पिया विहारे तुलमुल नदियाँ
कौन उन्हे दे फूलों का दस्ता
कब लौट मुझे वे दर्शन देंगे



वले आओ पिया, मेरे सखा
तेरे कदमों में न्यौछावर नैना
चतुर थी मैं नादान लड़कपन में
नहीं जान पाई मूल्य यौवन का
मैं अकुलाई प्रेम पगी दर्शन दो
ओ पिया ओ सखा
नन्हे नन्हे पद चिन्ह क्यो नहीं
छोड़े कोयल, तो डोले मेरा मन
याद आ गई तुम्हारी बतियाँ
ओ पिया ओ सखा
आओगे आज , वचन दिया तुमने
दर्शन दो शीष चढ़ाऊँगी चरणों में
ओ पिया ओ सखा




क्या बोलूँ पिया , क्या बोलूँ
जो बीती मुझ पर, वो बोलूँ
मैं किस्मत की मारी, वो बोलूँ
क्या बोलूँ पिया, क्या बोलूँ

मेरी बगिया में बादाम-कुसुम
किस्मत खोयी, वो बोलूँ
क्या बोलूँ पिया, क्या बोलूँ

मेरी बगिया में खूबानी - फल
स्नेह- स्निग्ध हैं वो बोलूँ
क्या बोलूँ पिया, क्या बोलूँ

मेरी बगिया में नाशपति - फल
टहनी टहनी अकुराई वो बोलूँ
क्या बोलूँ पिया, क्या बोलूँ

मेरी बगिया में अलीची के फूल*
क्या से क्या बनाया, वो बोलूँ
क्या बोलूँ पिया, क्या बोलूँ

*चेरी जैसा एक फल



दूर वनो में जाकर बैठा
काश सखी वे आ जाए
कहाँ दूर से जाएंगे वन में
पर छिपा कहीं ल्हासा जाकर
मैं विरह-विदग्ध टहनी सी
झेलूँ कैसे आग दहकती
काश सखी वे आ जाए




करूँ क्या, वह वन वन भटके
घटती नहीं अनुरक्ति मेरी
कोयल थी मैं टहनी ऊपर
नीड़ बनाती बड़े जतन से
अंगन लगी वसंत-बिजली सी
अलके झूलें, देखो मेरी
माथा है चकराता जाए
घटती नहीं अनुरक्ति मेरी


 

 

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