चीन की जनपदीय लोक कविताएं

अंग्रेजी से अनुवाद : सुमनिका सेठी

युन्नान जनपद में गेज्यू टिन खदानों के
खान मजूरों के चार पुराने गीत

1
मेरा घर परिवार नहीं

सड़क किनारे की जंगली घास भी
फूलती है और तब गिराती है अपने बीज
पर मैं चालीस की उम्र में अभी से हो गया बूढ़ा
मेहनत से निचुड़ा
नहीं है मेरा कोई घर परिवार
जानता हूं खूब
गर न चुराया होता खदान मालिक ने मेरा पौरुष
कब के हुए होते मेरे भी
कई सारे प्यारे गदबदे बच्चे t

यद्यपि ये गीत समकालीन की श्रेणी में नही आते हैं किन्तु इनकी उपादेयाता समकालीन है‍‍....संपादक
 

खान मजूरों के अन्य  गीत )


अनूप सेठी की कविता

बड़े भाई के नाम खत


मेरा भी स्कूटर डोलने लगा है दाएं बाएं
क्या एक उम्र के बाद ऐसा होता है?
जैसे जरा सा ज्यादा मुड़ गया हैंडल तो लगता है
सारा तूम तमाड़ सड़क पे बिछ जाएगा पलक झपकते

बैठा करते थे बच्चे पहले आगे फिर पीछे
क्या एक उम्र के बाद ऐसा भी होता है?
हम रह गए खड़े के खड़े वहीं
वे यह ले वह ले उड़ गए हवा से बातें करते
मिलेंगे अजनबियों जैसे अपनी ही दुनिया में रमे हुए

पीने लगा है तेल बहुत और ठल ठल करता रहता है
क्या एक उम्र के बाद ऐसा ही होता है?
घुटने अड़ने लगते हैं,  चश्मे चढ़ने लगते हैं
बातें जो कहनी हैं, रह जाती हैं
अर्थ समझ में पहले से ज्यादा आने लगते हैं
फूल तोड़ना चाहते थे,  अब डाली पर ही भाता है

समझ नहीं कुछ आता पर
जीवन का ऐसा क्या अर्थ हाथ लग जाता है !
 

( अनूप सेठी की अन्य कविताएँ .. )


कृष्ण किशोर की कविता

युद्ध 1

किसी न्याय, अन्याय को परखने के लिए
हमे अपने अतिरिक्त कोई
साक्षी नहीं चाहिए, विश्व संघ नहीं चाहिए
जीने के लिए हर वक्त हमें
मोर्चाबन्दी नहीं करनी
किसी भी छोटे-मोटे
आर्थिक या सामाजिक युद्ध में
भाग लेने के लिए
घर के रोशनदानों से झाँक कर
नहीं देखना
कि बाहर खतरा कितना है
चलो हम चलें
अधनंगे और भूखे बच्चों को
लेकर
दूर किसी देश के अधनंगे और पूरे भूखे
बच्चों के साथ इकट्ठा खेलने
या मरने के लिए
और धरती की दरारों में झाँककर
देखने के लिए
कि आज तक की प्रगति
कहीं दूर नीचे, बहुत नीचे
पाताल में तो नहीं।
और अगर कुछ न दिखे तो
तो हम आवाज में आवाज मिला कर
कह सकें कि
कहीं कुछ नहीं है
पाखंड है उन सत्ताधारियों का
जिन्हें उन्होने कभी देखा नहीं
लेकिन जिनके झूठ से
सारा आकाश गूँज रहा है
सारी धरती के लोग
जिनकी विराटता की ध्वजा
थामे थामे कुबड़ा गए हैं
आओ हम चलें
कहीं भी सारे विश्व में
कहीं भी निरंतर चल रहे
बाहर से थोपे हुए गृह युद्धों में
भाग लेने के लिए
जहाँ के लोग अपने देशों का इतिहास
लिखवा रहे हैं उन लोगों से
जो उस धरती का
रंग, गंध, स्वाद कुछ भी नहीं जानते।
मध्यस्थ हम नहीं बनेंगे वहाँ जाकर
सिर्फ हर बन्दूक धारी से
इतना भर कहेंगे कि चलो
उस चट्टान के पीछे
सूखी सी झाड़ी ‍पर जंगली फूल तोड़ कर
उसे दो
जो तुम्हारी प्रतीक्षा में तो नहीं
लेकिन जिसके लिए
तुम्हे देख पाने से बढ़ कर और कुछ भी नहीं
और उस अर्ध जीवित अस्थिपिंजर को
जो विधिवत तुम्हारा बेटा नहीं है
लेकिन तुम्हारी ही रक्त गंध है उसमें।
उसे गोद में उठा कर कहो
कि तुम अब
उसके साथ ही रहोगे
और किसी को कभी भी
उसके काँधे पर बन्दूक नहीं रखने दोगे।
उसके रस्सी जैसे बालों में
हाथ फिरा कर
उसे खूब प्यार करोगे
और फिर अगर आँखे भर आएँ
तो छिपाओगे नहीं
उसे देखने दोगे कि उसके लिए
भोजन से अधिक जीवनदायी
तुम्हारी गीली आँखे हैं।

( कृष्ण किशोर की अन्य कविताएँ.. )


डोगरी कवि केहरी सिंह मधुकर का गीत

त्रिमूर्ति



युगों युगों से रचता आया, मैं धरती के गीत निराले।
तब बनी तस्वीरें सुन्दर
मन के जब फूटे छाले ।।
कविता के जन्म से पहले,  दुनिया थी रीती रीती
मैं ब्रह्मा का रूप कवि था,  जिसने रचना की गीतों की ।।
प्रीत के अंकुर तब फूटे ,  जब मिली ममता की लोरी ।
प्रेम को मिली स्मरण पीड़ा,  चित्त को करना आया जब चोरी ।।
आसमान को गीत बनाया मैंने,  तारों को तब मिले सुर ।
तभी तो चाँद चाँदनी के संयोग सजे हरदम के लिए ।।
मैंने पर्वत के राग बनाए, आसमान को जो दे आवाज।
सागर को भी गीत मे ढाला,  जो रीत निभाए प्रीत की ।।
पर्वत की छाती से रिसते,  झरने ये सब गीत हैं मेरे
भूमि की छाती पर बिछते,  सब ताने सुन्दर घेरे ।।
पछतावे के ये लाल निडर,  उदासी के बँधन डलवाए
मैं कविता का रूप कवि,  तभी तो इतने गीत सजाए ।।

डोगरी से अनुवादः डा अरुणा शर्मा

(  मधुकर का गीत ....आगे.. )


अनिल जनविजय की कविता

दिन पतझड़ का

पीला सा था झरा झरा

छुट्टी का दिन था
वर्षा की झड़ी से भीग रहा था मस्कवा
चल रही थी बेहद तेज ठंडी हवा
खाली बाजार, खाली थीं सड़कें
जैसे भूतों का डेरा
खाली उदास मन था मेरा

तुमको देखा, तो झुलस गया तन
हुलस गया मन
बिजली चमकी हो जो घन
लगने लगा फिर से यह जीवन भरा भरा

तुम आई तो आया वसन्त
दिन हो गया हरा हरा
 

( अनिल जनविजय की अन्य कविताएँ.. )


गुजराती के प्रसिद्ध कवि योसफ मैक्वान की कविताएँ

मैं कवि और जगत


उसके बाद दिन चिरा गया
और अंधकार बाहर आया
उसके बाद शब्द कट गए और कलशोर बाँध हो गए।
उसके बाद वृक्षों के रंग बदल गए
उसके बाद यवन में खलबली हुई
उसके बाद नगर ढोल जैसे बजने लगे
उसके बाद कर्कश संगीत बजना शुरु हुआ
उसके बाद सब बधिर बनं और सुनते रहे
उसके बाद सब बोलने लगे मगर मूक जैसे
उसके बाद अंधे हो गए और दौड़ने लगे
उसके बाद बाद सब चुपके चुपके खाने लगे
फिर भी भूखे कि भूखे रहे

इन सबमे से कवि जगा
उसके बाद
अकेला अकेला उनके लिए कविता करने लगा
उसके बाद ....
उसके बाद अंधकार चिरा गया
और दिवस बाहर आया....

१९७८

गुजराती से अनुवाद कौमुदिनी राठौर

( योसफ मैक्वान की कविताएँ .. )


विजेन्द्र विज की कविता


दस्तावेजों की दुनिया

बरसों से बन्द पड़े
मेरे दस्तावेजों की दुनिया
बड़ी दिलकश है
एक उम्र का अनुभव कैद है
इनमे

एक अर्थहीन पीड़ा
पन्नों में साँस लेती है
कितनी ही स्मृतियों के
बीज बोये हैं मैने
इसके आँगन में

जिन्दगी की खुशियों गमों के
न जाने कितने कसीदे
काढ़े हैं मैंने इसमे

मेरी अपनी ही जमीन और
भाषा है यहाँ
प्रेम, सपन और
निराशा है यहाँ
और है एक जिद
जो शायद अभी अभी इतिहास में
तब्दील हुई है.

कितनी शामे गुजारी मैंने
खामोश उदास सितारों के साथ
कितनी पगडंडियाँ बनाईं
जो अब नजर भी नहीं आतीं

मेरे दिल से शब्द निकलते हैं
उनमे तेजाब भरा है
वे मुझे ले जाते हैं दूर
वेतना के विराट सौन्दर्य से

शायद एक व्यथा है
एक राही की
जिसे लगातार
तलाश है घर की


(
विजेन्द्र विज की कविताएँ .. )  


रति सक्सेना‍


एक खिड़की और आठ सलाखें

*

एक खिड़की और ८ सलाखें, आठ भागों में कटा
नारियल वृक्ष का तना, पीछे से झाँकती
कटहल की एक शाख,  ढ़ेर सारे पत्ते
चिड़िया चहचहाई,
पड़ोस से किसी बच्चे के रोने की आवाज

एक हवाई जहाज गुजरा

एक दिन पूरा हो गया .

**

खजुराहो की भंगिमाओं के बीच, कलम से भरा जार
बस्तर का घोटुल ,  दिल्ली का कलमदान
खिड़की की सिल पर ,
पूरा देश बस गया

ठहरो !!
सलाखों से लटकते गुजरात की पुतलियों की ओर
किसी का ध्यान गया नहीं.

***

यदि यह खिड़की नहीं
चित्र होता ?

पत्ते हवा में हिलते नहीं
चिड़ियों की चहचहाटें सुनाई नहीं देतीं

तब शायद मैं खिड़की के अन्दर नहीं
बाहर होती

(रति सक्सेना‍ की कविता ...आगे )

 


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