मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 

कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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केरल में रहते हुए मैंने अपना कर्तव्य समझा कि मलयालम के शीर्षस्थ कवियों की रचनाएँ हिन्दी पाठकों तक पहुँचाऊँ। केरलीय कवियों का अपना दुख था कि उनकी रचनाएँ सही तरीके से नहीं पहुँच पा रही हैं। लेकिन मेरे इस काम ने मेरे ऊपर अनुवादक का ठप्पा लगा दिया और हिन्दी जगत ने मेरी कविताओं पर से आँखें मून्द लीं।
पता नहीं कैसे मेरी कविताएं विदेश में पसन्द की जाती रहीं , और ईरान, इटली आदि देशों में बकायदा छपती रहीं। फेदरिकों, जो स्वयं भी एक मजबूत कवि हैं ने करीब तीन साल लगाए कविताओं के अनुवाद के लिए। मुझे ना तो जल्दी थी, ना ही हड़बड़ी। किताब छपने में एक बरस लग गया। लेकिन पिछले बरस नवम्बर में मेरे पास मोन्जा (मिलान)से कविता पाठ के लिए खत आया, जिसमें उन्होंने मेरी कविताओं को पसन्द करने के कारण आमन्त्रण भेजा था। इसी आमन्त्रण के साथ मैंने अपने यूरोपीय कवि मित्रों से बात कर अन्य देशों में भ्रमण का कार्यक्रम भी बना लिया और अपने साथ कुछ युवा कलाकारों को भी साथ ले जाने की बात सोची।
रति सक्सेना
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आज मेरी वैष्णवी साधना
सफल हो गई बंधु,
मेरी देह भागवत पर
तुमने अनुराग-जुष्ठिता
नयन-बांसुरी को
धर दिया
मेरे भागवतीय क्षणों को
सार्थक बना दिया तुमने,
काम-गायत्री फूंक कर
तुम्हारी इस-
वृन्दावनी कृपा पर
मुग्ध हूँ, बंधु"

दिनेश द्विवेद
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वक्त की सियाही में
तुम्हारी रोशनी को भरकर
समय की नोक पर रक्खे
शब्दों का कागज़ पर
कदम-कदम चलना।

एक नए वज़ूद को
मेरी कोख में रखकर
माहिर है कितना
इस कलम का
मेरी उँगलियों से मिलकर
तुम्हारे साथ-साथ
यूँ सुलग सुलग चलना |
मीना चोपड़
*

न किसी दमयंती का संदेशा लिए
नल की तलाश में भटकते धूसर प्रेमपाखी
किसी उदास भग्नावशेष के अन्तःपुर की
शमशानी शान्ति में जीवन बिखेरते पखेरू भी नही
अशोक कुमार पाण्डेय

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रति की कवितायें जिन्दगी का सीवन उधेड़ कर उसके अंतस को महसूसने की कोशिश करती है। यह किसी सुख की तलाश में दुख को नकारने की कोशिश नहीं है, बल्कि दुख में सुख खोजने की अदम्य जिजीविषा है। यहां विडम्बनाओं और तनाव के बीच जीवन की अनेकोनेक स्वीकारोक्तियाँ भी मौजूद हैं जिसमें कविता उन्हीं के शब्दों में ‘कोई लौंडी नहीं जिसका काम मात्र मनोंरजन करना हो।’ एक ओर जहां वह अपनी उस आन्तरिक व्यथा से उबरने की यत्न में हैं जिसके कांटे समय ने बो दिये हैं तो दूसरी ओर वैदिक ऋचाओं के आह्वान का असर भी यत्र-तत्र कविता में प्रकट हो उठता है।
आगे उनकी कविताओं में अभी और भी अनगिन संभावनाओं का पारावार हिलोरें ले रहा है। प्रसंगवश उनकी कविता संग्रह “अजन्मी कविता के कोख़ से जन्मी कविता” की एक कविता ‘कुंडली मारे बैठी स्त्री देह’ का जिक्र करना इस दृष्टि से यहां लाजमी होगा।

सुशील कुमार
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कदम

उस वक्त
जब मैंने पहला कदम भरा
तो तुमने मेरा हाथ कस कर पकड़ा
अब हम कमरे चलते हैं तो
मैं तुम्हे सहारा देती हूँ
मैं महसूस कर पा रही हूँ कि
तुमने काफी लम्बा रास्ता पार किया
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धीरे-धीरे बरस गडमड्डा गए

धीरे - धीरे बरस गडमड्डा गए
जैसे कि बसन्त में भेड़ें
पहाड़ी पर फैल जाती हैं

तुम हौले से
झुकी , मेरे माथे पर
चुम्बन देने के लिए

और हम दोनों हँस पड़े
एक साथ उस वक्त पर
जो गरमी की स्पंदित सुबह में
क्रीड़ा कर रहा था.
अरी रिरियाती माँ, रोटी माँ

अरी रिरियाती माँ, रोटी माँ
मोतियों से बनी माँ, प्रार्थना से बनी माँ
रगड़ती माँ , भागती माँ

ओडविग क्लिवे Odveig Klyve
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नागमती का बारहमासा

मिलहिं जो बिछुरे साजन अंकम भेंटि अहंत।
तपनि मृगसिरा जे सहैं ते अद्रा पलुहंत ।।

आषाढ़

चढ़ा असाढ़ गगन घन गाजा। साजा बिरह दुंद दल बाजा।।
धूम साम धीरे घन धाए। सेत धजा बग पाँति देखाए।।
खड़ग बीजु चमकै चहुँ ओरा। बुन्द बान बरसहिं घन घोरा।।
पुष्य नखत सिर ऊपर आवा।हौं बिनु नाह, मन्दिर को छावा।।
अद्रा लाग, लागि भुँइ लेई ।मोही बिनु पिउ को आदर देऊ।।

सावन

सावन बरस मेह अति पानी। भरनि परी , हौं बिरह झुरानी।।
सखिन्ह रचा पिउ संग हिंडोला। हरियर भूमि कुसुंभी चोला।।
हिय हिंडोल अस डोलै मोरा। बिरह झुलाइ देइ झकझोरा।।
बाट असूझ अथाह गँभीरी। जिउ बाउर, भा फिरै भँभीरी।।
जग जल बूड़ जहाँ लगि ताकि। मोरि नाव खेवक बिनु थाकी।।

भादों

बरसै मघा झकोरि झकोरी। मोर दुइ नैन चुवैं जस ओरी।।
पुरबा लाग भूमि जल पूरी। आक जवास भई तस झूरी।।

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VOL - V/ PART I

(जून-  2009)

संपादक :  रति सक्सेना


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