कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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मित्रों आज करीब चार सवंत्सर की यात्रा पूरी कर कृत्या सामय से काफी पीछे निकल पा रही है। यह देरी आलस्य का परिणाम नहीं बल्कि एक आहुति की समाप्ति के उपरान्त का मौन है। करीब तीन वर्ष पहले मुझे एक इतालवी कवि का पत्र मिला कि वे मेरी कविताओं का अनुवाद करना चाहते हैं। मेरे लिए तो यह अचम्भे वाली बात थी। हालांकि तब तक मेरी कविताएँ अन्य देशों की अनेक पत्रिकाओं में छप चुकीं थीं, लेकिन अपने देश में तो लोग बात करने में भी हिचकते थे। केरल में रहते हुए मैंने अपना कर्तव्य समझा कि मलयालम के शीर्षस्थ कवियों की रचनाएँ हिन्दी पाठकों तक पहुँचाऊँ। केरलीय कवियों का अपना दुख था कि उनकी रचनाएँ सही तरीके से नहीं पहुँच पा रही हैं। लेकिन मेरे इस काम ने मेरे ऊपर अनुवादक का ठप्पा लगा दिया और हिन्दी जगत ने मेरी कविताओं पर से आँखें मून्द लीं।
पता नहीं कैसे मेरी कविताएं विदेश में पसन्द की जाती रहीं , और ईरान, इटली आदि देशों में बकायदा छपती रहीं। फेदरिकों, जो स्वयं भी एक मजबूत कवि हैं ने करीब तीन साल लगाए कविताओं के अनुवाद के लिए। मुझे ना तो जल्दी थी, ना ही हड़बड़ी। किताब छपने में एक बरस लग गया। लेकिन पिछले बरस नवम्बर में मेरे पास मोन्जा (मिलान)से कविता पाठ के लिए खत आया, जिसमें उन्होंने मेरी कविताओं को पसन्द करने के कारण आमन्त्रण भेजा था। इसी आमन्त्रण के साथ मैंने अपने यूरोपीय कवि मित्रों से बात कर अन्य देशों में भ्रमण का कार्यक्रम भी बना लिया और अपने साथ कुछ युवा कलाकारों को भी साथ ले जाने की बात सोची। लेकिन अपनी अपनी समस्याओं के चलते सभी युवा कवि, कलाकार जा ना पाए, मात्र एक प्राध्यापक महोदय के।

मैं तीन मई को ही वापिस लौट पाई, हालांकि मैं ज्यादातर काम जाने से पहले कर गई थी, लेकिन वापिस आने के बाद देह ने शिकायत करनी शुरु कर दी। यही कारण है कि कृत्या इस बार देर से आ रही है। हिन्दी अंक के लिए मुझे हर काम अपने आप करना पड़ता है, इसलिए कुछ शार्टकट भी अपना रही हूँ। सुशील कुमार जी ने मेरे बारे में कुछ टिप्पणी लिखी थी, और छापी भी थी। मैं उसे भी इस अंक में दे रही हूँ। हालाँकि अपने बारे में अपनी ही पत्रिका में छापना मुझे अच्छा नहीं लगता, पर यह सुशील जी का लेख है, मेरा नहीं। इसलिए उनके लेखन कौशल का सम्मान करते हुए, अपने मेहनत को कम करने के मद्दे नजर यह लेख दिया जा रहा है।

मित्रों यूरोपीय कवियों के बारे में अग्रिम अंको में बात करूंगी, इस बार मैंने प्रिय कवि के रूप में नोर्वे की ओडवे को लिया है, आगे भी आप उन से परिचय पाते रहेंगे। इस यात्रा के उपरान्त मैं इतना तो कह सकती हूँ कि भारतीय साहित्य में बेहद दम है, और यदि हम एक साथ काम करें तो सर्वश्रेष्ठ हो सकते हैं।

पाँचवें सर्ग के प्रथम चरण में पहुँचने के लिए आप सब को बधाई!!

शुभकामनाएँ

रति सक्सेना

 

The paintings in this issue are by Meena Chopra, who is also a poet. My best wishes to all readers of Kritya on this successful fifth year of our poetic expedition.

पत्र-संपादक के नाम                                                      
 


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