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नागमती का बारहमासा

मिलहिं जो बिछुरे साजन अंकम भेंटि अहंत।
तपनि मृगसिरा जे सहैं ते अद्रा पलुहंत ।।


आषाढ़

चढ़ा असाढ़ गगन घन गाजा। साजा बिरह दुंद दल बाजा।।
धूम साम धीरे घन धाए। सेत धजा बग पाँति देखाए।।
खड़ग बीजु चमकै चहुँ ओरा। बुन्द बान बरसहिं घन घोरा।।
पुष्य नखत सिर ऊपर आवा।हौं बिनु नाह, मन्दिर को छावा।।
अद्रा लाग, लागि भुँइ लेई ।मोही बिनु पिउ को आदर देऊ।।


सावन

सावन बरस मेह अति पानी। भरनि परी , हौं बिरह झुरानी।।
सखिन्ह रचा पिउ संग हिंडोला। हरियर भूमि कुसुंभी चोला।।
हिय हिंडोल अस डोलै मोरा। बिरह झुलाइ देइ झकझोरा।।
बाट असूझ अथाह गँभीरी। जिउ बाउर, भा फिरै भँभीरी।।
जग जल बूड़ जहाँ लगि ताकि। मोरि नाव खेवक बिनु थाकी।।

भादों

बरसै मघा झकोरि झकोरी। मोर दुइ नैन चुवैं जस ओरी।।
पुरबा लाग भूमि जल पूरी। आक जवास भई तस झूरी।।

कुवार

चित्रा मित्र मीन कर आवा। पपिहा पीउ पुकारत पावा।।
उआ अगस्त, हस्ति घन गाजा। तुरय पलानि चढ़े रन राजा।।
स्वाति बून्द चातक मुख परे। समुद्र सीप सब मोती भरे।।
सरवर सँवारि हंस चलि आए। सारस कुरलहिं खँजन देखाए।।
भा परगास, काँस बन फूले। कंत न फिरे बिदेसहिं भूले।।

कातिक

कातिक सरद चंद उजियारी। जग सीतल हौं बिरहै जारी।।
चौदह करा चाँद परगासा। जनहुँ जरे सब धरति आकासा।।
तन मन सेज जरै अगिदाहू। सब कहँ चंद, भयउ मोहिं राहू।।
अबहूँ निठुर! आउ एहि बारा। परब देवारी होइ संसारा।।
सखि झूमक गावैं अँग मोरी। हौं झुरावँ, बिछुरी मोरी जोरी।।

अगहन

काँपै हिया जनावै सीऊ। तौ पै जाइ होइ सँग पीऊ।।
पिउ सौ कहेहु सँदेसड़ा हे भौंरा हे काग।
सो धनि बिरहै जरि मुई तेहिक धुँआ हम्ह लाग।।

माघ

पहल पहल तन रूई झाँपै। हहरि हहरि अधिकौ हिय काँपै।।
टप टप बूँद परहिं जस ओला। बिरह पवन होइ मारै झोला।।


फागुन

तन जस पियर पात भा मोरा। तेहि पर बिरह देइ झकझोरा।।
तरिवर झरहिं, झरहि बन ढ़ाखा। भइ ओनंत फूलि फरि साखा।।
करहि बनसपति हियें हिलासू। मो कहँ भा जग दून उदासू।।
फागु करहिं सब चाँचरि जोरी। मोहि तन लाइ दीन्ह जस होरी।।
राति दिवस सब यह जिउ मोरे। लगौं निहोर कंत अब तोरे।।
यह तन जारौं छार कै कहौं कि पवन! उड़ाव।
मकु तेहि मारग उड़ि परै कंत धरै जँह पाव।।

चैत

बौरे आम फरै अब लागे। अबहुँ आउ घर , कंत सभागे।।
सस्वर हियाघटत निति जाई। टूक टूक होई कै बिहराई।।
बिहरत हिया करहु, पिय, टेका। दीठि दवँगरा मेरवहु एका।।
कँवल जो बिगसा मानसर बिनु जल गएउ सुखाइ।
कबहुँ बेलि फिरि पलुहै जौ पिय सींचे आइ।।

जेठ

जेठ जरै जग, चलै लुवारा। उठहिं बवंडर परहिं अँगारा।।
चारिहुँ पवन झकोरै आगी। लंका दाहि पलंका लागी।।
उठै आगि औ आवै आँधी। नैन न सूझ मरौं दुख बाँधी।।
तपै लागि अब जेठ असाढ़ी। मोहि पिउ बिनु छाजनि भइ गाढ़ी।।
तन तिनउर भा झूरौं खरी। भइ बरखा दुख आगरि जरी।।
बंध नाहि औ कंध न होई। बात न आव कहौं का रोई।।
साँठि नाठि, जग बात को पूछा। बिनु जिउ फिरै मूँज तनु छूछा।।
भई दुहेली टेक बिहुनी। थाँभ नाहिं उठि सकै न थूनी।।
बरसै मेह, चुवहिं नैनाहा। छपर छपर होइ रहि बिनु नाहा।।
कोरौं कहा ठाट नव साजा। तुम बिनु कंत न छाजनि छाजा।।
दहि कोइला भइ कंत सनेहा। तोला माँसु रही नहिं देहा।।
रकत न रहा, बिरह तन गरा। रती रती होइ नैनन्ह ढरा।।

धौरी पंडुक कहु पिउ नाऊँ। जौं चितरोख न दूसर ठाऊँ।।
जाहि बया होइ पिउ कंठ लवा। करै मेराव सोइ गौरवा।।
जेहि पंखी के नियत होइ कहै बिरह कै बात।
सोई पंखी जाइ जरि तरिवर होइ निपात।।
कुहुकि कुहुकि जस कोइल रोई। रकत आँसु घुँघुची बन बोई।।
जहँ जहँ ठाढ़ि होइ बनबासी। तहँ तहँ होइ घुँघुची कै रासी।।
बूँद बूँद मँह जानहुँ जीऊ। गूँजा गूँजि करै पिउ पीऊ।।
तेहि दुख भए परास निपाते। लोहू बूड़ि उठे होइ राते।।
राते बिंब भीजि तेहि लोहू। परवर पाक,फाट हिय गोहूँ।।

( नागवती वियोग खण्ड )
 
 

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