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दफैरुन
की कविताएँ बेहद खूबसूरत खुशबू की तरह थीं, मैंने कई सालों तक पढ़ा,
पर पता नहीं कहा चला गया यह कवि, कोई पता नहीं, कुछ पन्ने मेरे पास
हैं, कविताओं के जो दफैरुन ने भेजे थे, मैं बार बार इन्हें छाप रही
हूँ यह सोच कर कि कहीं तो भीज मिलेंगे इस कवि के..यदि कोई पता जानता
हो बताए, मै दफैरुन की तीन बेटियों से भी मिलना चाहती हूँ.....
आत्मीयता
बड़ी आत्मीयता से
जिस सिगरेट को
जिसने ओंठों से बार बार चूमा
उसी ने रौंदा
उसे जूते से
ऐसा फूलों के साथ भी किया गया
ऐसा ही किया गया और चीजों के साथ भी
जैसे आईने के साथ
कंघे के साथ
दाड़ी बनाने वाले ब्रश के साथ
और सफेद बालों को
काटने वाली कैंची के साथ
मैं भी शामिल हूँ
ऐसी ही चीजों की फेरहिस्त में
ये आत्मीयता और आत्मीय से
डरने का समय है
डरो कि
किसी भी वक्त
तुम्हे भी शामिल किया जा सकता है
ऐसी ही चीजों की फेरहिस्त में.
आदमी
मैंने
कभी नहीं होना चाहा ईश्वर
हमेशा बने रहना चाहा
आदमी,
इसलिए नहीं
कि मैं ईश्वर हो नहीं सकता
इसलिए कि ईश्वर आदमी से छोटा है

और उसने
जब जब
होना चाहा है बड़ा
उसे होना पड़ा है
आदमी.
सकते में बने रहे फूल
अपनी अपनी तरह से जीने वालों ने
फूलों से कहा
खुशबू ऐसी नहीं
ऐसी होनी चाहिए
बहुत देर तक
सकते में बने रहे फूल
फिर मुरझा गए
पेड़ अकेला नहीं कटता
कट गया पेड़
पृथ्वी से आकाश तक फैली
कट गई एक दुनिया
पेड़ अकेला नहीं कटता
एक पूरी कि पूरी दुनिया
पेड़ के साथ कटती है
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