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कविता
अपने साथ भाव ही नहीं वाद लेकर भी चलती रही है, हालाँकि ये वाद
कविता के बाद बनते हैं, लेकिन एक बार यदि वाद कविता पर हावी हो जाए
तो एक बहुत बड़ी शक्ति इन वादों के इर्दगिर्द घूमने में ही खत्म हो
जाती है। यह नियम है या विडम्बना, मालूम नहीं... लेकिन वाद
निर्धारण में आम कवि की भूमिका बहुत कम दिखाई देती है। मुझे याद है
एक बार हैदराबाद में मैं एक कवि गोष्ठी में भाग ले रही थी तो पाया
कि वहाँ उपस्थित करीब तीन चार महिला कवियों नें जो कविताएँ सुनाई,
उनमें पुरुष की बेवफाई और स्त्री के आँसू ही थे। उनकी हर कविता पर
पुरुष समाज से भी उन्हें काफी वाहवाही मिल रही थी। जब कि पुरुष
कवियों में अधिकतर ने प्रेम कविताएँ सुनाई। यह स्थिति अनेक बार,
अनेक जगहों पर दिखाई दी है। एक बार मलयालम साहित्य की एक
अध्यापिका से बात करते वक्त मैंने पूछा कि मलयालम साहित्य में
प्रेम कविताओं का इतना अकाल क्यों है, विशेषरूप से महिला कवि,
प्रेम कविता नहीं के बराबर लिखती हैं, तो वे मुस्कुरा कर बोलीं कि
- यदि किसी महिला को प्रेम कविता लिखनी है तो वह कृष्ण का सहारा
लेकर लिख पाती है, सामान्य रूप से प्रेम कविता लिखने की उसकी
हिम्मत ही नहीं होती। (ध्यातव्य है कि कमला दास कविता अंग्रेजी में
लिखती थीं, और उनकी कविताओं में जो खुलापब था, उसकी बराबरी कोई भी
अन्य महिला कवि नहीं कर पाई)मैंने मन में सोचा कि यदि हिन्दी में
कोई कवयित्री राधा कृष्ण को केन्द्र बना प्रेम भाव उकेरना चाहेगी
तो उसे तुरन्त दक्षिण पंथी मान कर निष्कासन मिल जाएगा।
हाँ तो जब मैं वाद की बात कर रही हूं तो आइडियोलोजी की भी.. काफी
लम्बे अर्से से हम उस से बन्ध गए से हैं। आज भी हिन्दी कविता में
गरीबी, तंगी, विद्रूपता मात्र पर लेखन करना एक बड़ी आइडियोलोजी का
मानना है। कोई सन्देह नहीं कि ये बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
लेकिन इनके अलावा भी और कई मुद्दे हैं, जो दबे पाँव चले आ रहे हैं,
और एक बार करीब आएँ तो जिन्न से विशालकाय बन जाएंगे.. मसलन
पर्यावरण, प्रकृति संरक्षण और सबसे बढ़ कर निस्वार्थ प्रेम आदि आदि
ऐसे भाव है जो हमारी नजर में रोमानटिज्म के दायरे में आते हैं, और
अभी तक वहीं फँसे हैं, जबकि ये मुद्दे आने वाले समय में बेहद
महत्वपूर्ण साबित होंगे। विशेष रूप से पर्यावरण का मुद्दा।
पिछले दिनों जब मैं नोर्वे में थी तो वहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य
से अभिभूत थी , लेकिन जब मुझे रोगालैण्ड के कवि Helge Torvund
से मिलवाते हुए उनके बारे में यह बतलाया गया कि
उनकी कविताओं में लैण्डस्केप को प्रमुखता दी गई है तो मैंने मन ही
मन सोचा- अरे, हम तो इस रोमान्टिज्मता से कभी के उबर गए।
मैं तब अचम्भित रह गई जब Helge Torvund मुझे अपनी बैठक में
ले गए, जिसकी सीमा दशों दिशाओं में फैली हुई थी। जी हाँ, हैल्गे
अपना अधितर लेखन प्राकृतिक चट्टान पर बैठ कर करते हैं, और तो और
उनका खास दोस्त एक खूबसूरत दरख्त है। उनसे बात करते वक्त उन्होंने
एक महत्वपूर्ण बात बताई कि उन्होंने साहित्यिक आन्दोंलन के तहत उस
बेहद खुबसूरत समुद्र तट और आसपास के इलाके को सुरक्षित घोषित करवा
लिया। अब उस इलाके की घास तक तोड़ना कानूनी जुर्म है। मुझे आश्चर्य
हुआ.....अरे ढेर सारी प्रकृति है इनके पास, फिर
इस कानून की क्या जरूरत।
लेकिन बातचीत के दौरान यह मालूम पड़ा कि नोर्वे का बुद्धिजीवी
इस बात के लिए अभी से चिन्तित है कि नोर्वे की प्रकृति का दोहन ना
हो।
नोर्वे को सही तरीके से स्वतन्त्रता 1940 में मिली है। स्वतन्त्रता
से पहले की कठिनाई उनके जेहन में अभी तक ताजी है। उन्होंने अपनी
जमीन अपने आप तैयार की है, इसलिए प्रकृति उनके लिए मात्र आनन्द
अनुभव का माध्यम नहीं है, बल्कि जीवन का भी।
मैं अपने देश के किसानों की भुखमरी को याद करती हूँ, किसानों की
आत्महत्या को याद करती हूँ। हमारे बुद्धिजीवी उनके बारे में लिखने
के लिए भी ए सी कमरे की जरुरत महसूस करते हैं। लेकिन हम यह नहीं
सोचते हैं कि इन सब समस्या के पीछे हमारा प्रकृति से कटाव तो नहीं
है?
आज जरूरत है कि प्रकृति के सौन्दर्य को इस तरह से रेखांकित किया
जाए कि हम संरक्षण के प्रति जागरुक हो सकें।
इस अंक मैंने उनकी कविताओं में कुछ को अनूदित कर प्रिय कवि के रूप
में दिया है, ये नन्ही नन्ही कविताएँ इतने बृहद फलक को किस तरह
समेट लेती है, यही मेरे लिए सीखने की वस्तु है। कविता के बारे में
अंक के लिए वनिता ठक्कर का महत्वपूर्ण लेख मिला है जो नाद संगीत पर
है़ संगीत को कविता के उपांग के रूप में स्वीकारने में हमें कोई
हिचक नहीं होनी चाहिए।समकालीन कविता
निसन्देह हर अंक में महत्वपूर्ण है। भविष्य में हम कुछ और लिंक
जोड़ेंगे, ऐसा विश्वास है।
इस अंक के चित्र यूरोप यात्रा में लिए गए चित्र हैं, जिनमें सड़कों
मनचले युवकों द्वारा उकेरे हुए चित्रों से लेकर पोस्टर और मूर्ति
शिल्प आदि हैं।
धरती में जल जीवन के लिए शुभकामना सहित!
रति सक्सेना
पत्र-संपादक
के नाम
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