नाद
सागर अपरम्पार
संगीत आवाज़ की कला है । सांगीतिक सर्जन ध्वनि-शिल्प होते हैं ।
कर्ण-मधुर ध्वनि-तरंगें कानों में घुलकर मन और आत्मा के अमाप व्याप
को अनुरंजित कर देती हैं ।
सुर, ताल व लय, शब्द एवं भाव इस ध्वनि-शिल्प के अवयव हैं, जिनका
समुचित समंवय उसे कर्ण-प्रिय एवं हृदय-स्पर्शी बनाकर पूर्ण /
शाश्वत बनाता है । शब्द / स्वर देह हैं, सूर प्राण, लय हृदय, ताल
धड़कन और भाव आत्मा । इन अवयवों की दुर्बलता, इनके बीच असंतुलन,
शिल्प को कमज़ोर और निस्तेज बना देता है । भावानुसार यह शिल्प
सात्विक, राजसी और तामसी प्रकृति का होता है । सत्त्व, रजस और तमस
में से जो गुण सबल या प्रधान होता है, शिल्प उसी गुण की अभिव्यक्ति
का माध्यम बनता है ।
सन 1950 से 1985 के बीच का दौर हिन्दी फिल्म संगीत का सुवर्ण-काल
कहा जाता है । इस दौरान अनेकों अविस्मरणीय रचनाएँ बनीं जिनका
प्रभाव स्थाई एवं सकारात्मक है । अधिकांशत: नए गाने ऐसे स्थाई भाव
से रिक्त क्यों हैं ? ऐसा सहज सवाल उठता है, सुनने में आता है । इस
रिक्तता का यह आभास-एहसास जीवंत सम्वेदनशीलता का परिचायक है, आशा
का स्रोत है । ध्वनि-शिल्प के अवयवों की दुर्बलता और उनके बीच
असंतुलन के सामान्य उदाहरण इस रिक्तता का कारण बनते हैं, जैसे -
- शब्दों के प्रति लापरवाही – अर्थ या
उच्चारण या दोनों के प्रति । शब्द भावों का वहन करते हैं, अत: गीत
के रूप और गुण दोनों पर दुष्प्रभाव पड़ता है ।
- पाश्चात्य संगीत के प्रभाव के कारण
ताल-प्राधान्य का अतिरेक रचना को नीरस और निष्प्राण बना देता है और
ताल वैविध्य की सम्भावना सीमित हो जाती है ।
- पाश्चात्य विचार-धारा और जीवन-शैली के
प्रभाव से रंगे संगीत में रजस-तमस का प्राधान्य होता है ।
भारतीय संगीत और भाषा-शास्त्र सुविकसित, समृद्ध एवं विस्तार-क्षम
है ।
श्रुति-स्वरों के अलग-अलग मेलों में अनगिनत सांगीतिक सम्भावनाएँ
विद्यमान हैं । सात स्वरों – सा, रे, ग, म, प, ध, और नि – के सप्तक
में 22 श्रुतियों पर कुल 12 स्वरों को स्थापित किया गया है । उत्तर
हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति में 10 थाट प्रचलित हैं (दक्षिण भारतीय
(कर्णाटिक) पद्धति में 72 मेल हैं), जिनसे अथाह सांगीतिक
विस्तार-क्षमता वाले सैकड़ों राग बनते हैं । शुध्द शास्त्रीय संगीत
के प्रस्तुतीकरण में राग नियमों का पालन अनिवार्य होता है ।
उप-शास्त्रीय और सुगम / प्रचलित संगीत प्रकारों में ऐसे बन्धन नहीं
होते । कर्ण-मधुर सुरावलियों – स्वर-संगतियों द्वारा मुक्त
स्वर-विहार किया जा सकता है ।
ताल पक्ष के जुड़ने से ताल-वैविध्य भी सम्मिलित हो जाता है । पुराने
गानों में दादरा (6 मात्राएँ) और कहरवाँ ( 4 / 8 मात्राएँ) के
अलावा रूपक (7 मात्राएँ, गीत : तुम गगन के चन्द्रमाँ हो, फिल्म :
सति सावित्री, स्वर : मन्ना डे और लता मंगेश्कर), झप ताल (10
मात्राएँ, गीत : आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें, फिल्म : परवरिश,
स्वर : मुकेश), एक ताल (12 मात्राएँ, गीत : पवन दिवानी, फिल्म :
डॉ. विद्या, स्वर : लता मंगेश्कर), त्रिताल (16 मात्राएँ, गीत :
पूछो ना कैसे मैंने रैन बिताई, फिल्म :मेरी सूरत तेरी आँखें, स्वर
: मन्ना डे) आदि तालों का भी प्रयोग किया जाता था । आधुनिक फिल्म
संगीत में ये सब ताल लुप्त-से हो गए हैं । 2, 3 या 4 मात्राओं वाले
पाश्चात्य तालों का बोलबाला है । समृद्धी और विस्तार-क्षमता की
कीमत पर पाई सरलता विकास के लिए अवरोधक और हानिकारक है ।
शब्द पक्ष भाषाओं के अनंत क्षितिज तक फैला हुआ है । अधिकांशत:
भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत है । भाषा के व्याकरण और उच्चारण
शास्त्र में गहरा सम्बन्ध होता है । संस्कृत और उससे उत्पन्न
भाषाओं के व्याकरण और उच्चारण शास्त्र का वैज्ञानिक विकास एवं
विस्तार हुआ है । स्वर-तंत्र के विभिन्न अवयवों का जैसा अधिक और
वैविध्य-सभर प्रयोग भारतीय भाषाओं में होता है, वैसा अंग्रेज़ी में
नहीं होता । फेशन के तौर पर अंग्रेज़ी उच्चारण शैली में हिन्दी /
भारतीय भाषाएँ बोलनेवालों को बहुधा इस बात का एहसास नहीं होता कि
वे अपनी नैसर्गिक उच्चारण क्षमता को हानि पहुँचा रहे हैं। भारतीय
विचार-धारा और जीवन-दर्शन के अनुसार संगीत जीवन के सर्वोच्च
उद्देश्य – मोक्ष – को प्राप्त करने का साधन है । संगीत नाद-ब्रह्म
की उपासना है । संगीतकार / कलाकार साधक माना जाता है / होना चाहिए
। उसकी साधना का अर्क ध्वनि-शिल्प / कलाकृति में प्रवाहित और
प्रज्ज्वलित होता है
।
लापरवाही फेशन के तौर पर प्रचलित और दुर्भाग्यवश स्वीकृत हो ऐसे
क्षेत्र और समय में व्यवसाय या कार्य से जुड़ी सामाजिक, नैतिक और
आध्यात्मिक ज़िम्मेदारी के प्रति जागृति की आशा रखना व्यर्थ लगता है
। भारतीय विचार-धारा और जीवन-दर्शन ऐसी नादानी, मनस्विता और
लापरवाही का आधार नहीं है । पारस्परिकता (inter-dependence) से
कटी-टूटी स्वतंत्रता (independence) स्वच्छन्दता है, यह शास्त्रीय
समझ ऐसी कलाकृतियों में लुप्त-प्राय होती नज़र आती है । ऐसे रजस-तमस
से भरपूर संगीत का प्रभाव कोल्ड-ड्रींक या मदिरा के प्रभाव जैसा
क्षण-भंगूर होता है ।
संगीत की प्रत्येक विधा / आयाम अपने आप में सम्पूर्ण और अनंत है ।
इसी लिए कहा गया है – “नाद सागर अपरम्पार, किनहुँ न पायो पार
.....” । ध्वनि-शिल्प में इन सब का एक सुन्दर मेल होता है ।
सुर-धारा अमृत-धारा बन सकती है । हमारे मन को किसकी खोज है ?
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