हमारे
समाज में कुछ कविताएँ ऐसी हैं जो लोक गीतों के श्रेणी में आती हैं,
लेकिन जन जीवन से इतनी ज्यादा जुड़ी है कि कस्बाई जीवन का आधार हैं।
ये लोक गीत सीधे सीधे कविता की श्रेणी में न आती हुई भी लोक काव्य
कला की झलक देती हैं। अभी हाल में ही कृत्या को रास्थान से लूर
नामक पत्रिका का " बन्नी लोक गीत विशेषांक मिला जिसमें कई बेहद
सुन्दर बन्नी गीत मिले हैं।
हम श्रीमती पवित्रा "सुह्द" द्वारा संकलित वरनी गीतों को प्रस्तुत
कर रहे हैं।
*
जनकपुर सीता को रच्यौ है विवाह
हरो हरो गोबर अंगन लिपिऔ, मौतीन चौक पुराओ। जनकपुर...
कूम कलश इमरत भर लाओं चम्पे की डार झकोर हो। जनकपुर...
पाँच सुपारी पाँच रूपइया, पाँच हरद की गाँठ हो। जनकपुर..
लाड़ो की लगुन लिखाई है
*
चन्दन चौकी कुँवर मेरी बैठी, तौ केश दिए छिटकाय हो
केश सम्हारों मेरी वारी सी वरनी
अब कहा केश सम्हारू मेरे बाबा सम्हारूँ मेरे ताऊ
तौ भई है धर्म की बार हो
*
कोरे से कागज लाडो भई है पराई, वामन के वेद लाडो भई है पराई
हरों नारियल लाडो भई है पराई, पाँच सुपारी लाडो भई है पराई
पाँच गिंदौरा लाडो भई है पराई, हल्दी की गाँठ लाडो भई पराई
*
ए जा नदिया के उल्ली पल्ली पार वाके बाबा जुअरा खेलिए
ए वाकी दादी रानी पूँछत बात तौ कहा पिया तुम हारिए
ए हम हारे है, घोड़ी घुड़सार तौ कन्या हारे आपनी
ए हम हारे हैं मुहर पचास रूपइया हारे डेध सौ
ए मैं मरूंगी जहर विष खाय मेरी कन्या का एकू हारी है।
*
वाले बाबा ले आँगन सुहाग विरला
बाकी दादी ताई सींचत भर गडुआ
जैसे महकत आवै सुहाग विरला
जैसे झामकत आवै सुहाग विरला
*
हरे हरे बाँस कटाय वाकै बाबा, ऊँचों मड्यौ छइयौजी
जैसी मेरी लाडो बेटी बैसाई दुल्हा लइयों जी
छै मासे की नरम कचौरी ढाई मासे के लड्डू जी
धीरे धीरे जैऔ बराती, साजन लज्जा राखौ जी
*

दइयारे दइया वरनी को नजर लागी, मैं डिबिया काजर की लेकर भागी
शीश वनी के झूमर सोहे
दइया रे दइया वरनी को नजर लागी, मैं डिबिया काजर की लेकर भागी
*
ए जनकपुर सीता को रच्यौं है विवाह
हरो हरो गोबर अंगन लिपायौ, मोतिन चौक पुराय। जनकपुर सीता...
हरे हरे बासन मंडप छायों, लौंगन गूंथ बधाय। जनकपुर सीता...
दुल्हा से दुल्हन परत भंवरियाँ, दोऊ दल बैठे आय। जनकपुर सीता...
ब्याह चलौ दशरथ कौ नन्दन, लै चलौ रथ पै चढ़ाय। जनकपुर सीता...
छोटौ सौ बीरन पकरी पलकिया, मेरी बहन कहाँ जाए।जनकपुर सीता...
तुम कूँ तौ बीरन महल अटारी, हमकूँ तौ लिखौ परदेस। जनकपुर सीता...
हमतौ रे बीरन झामे की चिरिया, रैन बसै उड़ जाये। जनकपुर सीता...
हमतौ रे बीरन खूंटे की गइया, जित हाकौं हंक जाय। जनकपुर सीता...
मय्या के रोयवेते गंगा बहत है, बाबुल के रोए सागर ताल।जनकपुर
सीता...
वीरन के रोयवेते पटुका भीजें, भावज मन आनन्द। जनकपुर सीता...
जाय उतारी अयोध्या नगरी, कौशिल्या तिलक संजोये। जनकपुर सीता...
पाँच रुपइया बड़ौ नारियल, सास बहुत कौ मुख देख। जनकपुर सीता...
तुम चिर जीवों मेरे बाल गोविन्दा, देत अशीष समाय। जनकपुर सीता...
|
|