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लीलाधर
जगूड़ी जी कविताएँ आम आदमी की कविताएँ हैं, और उनका तेवर आम आदमी को
आवाज देता है। इस बीच यह तेवर खो सा गया लगता है, इसी को मद्देनजर
रखते हुए आम आदमी के पक्ष में जगूड़ी जी कविताओं को प्रस्तुत किया
जा रहा है, जिन्हें आपकी पुस्तक - रात अब भी मौजूद है से साभार लिया
गया है।
उदासी के खिलाफ
उदास लोगों! यह बज्रपात है
इसके बाद तुम्हारे चेहरे पर
हिलती हुई इच्छा के अलावा
आक्रमण के लिए शेष
नहीं रह जाएगी कोई दूसरी जमीन
उदास लोगों! उठो और फैसला दो
उठों और जिसने कल तु्म्हें कुचला था,
उसे घोड़ों की नाल बना दो
उसकी मजबूत हठवादिता को
उसकी मजबूत दुर्भावना को
सड़क पर मिला दो
क्यों कि हमें मजबूत सड़कों की जरूरत है
उनकी पाखण्डी संगीने छीनों
और दोने पर निकाल कर
उनकी घमण्डी आँखों का पानी
चिड़िया को पिला दो
क्यों कि एक मामूली चिड़िया को भी
हमे अब स्वाभिमानी बनाना है
उदास लोगों ! यह वज्रपात है।
दृश्य
एक आदमी अभी मेरा एक शब्द लेकर
मुझे टोह गया
उसके मुँह में वह शब्द
अब भी गरम होगा
ऐसा उस वक्त हुआ
जब काँच की किरच वाली दीवार पर
एक बिल्ली
मुँह में चूहा लेकर जा रही थी
झाड़ी में बिल्ली ने
चूहे को छोड़ दिया
गरम
कोमल
फड़कता चूहा
चला,
चलने
के बाद
दौड़ने लगा
दौड़ते ही फिर दबोचा बिल्ली ने
पकड़ कर फिर दूसरी झाड़ी में ले गयी
झाड़ी के ऊपर
मँडराती रहीं
केंकती चिड़ियाएँ
चूहे से छूट चुकीं थीं
चूहे भर जमीन
बिल्ली के नीचे दबी हुई थी
बिल्ली भर जमीन
लेकिन उसकी परछाई
और बड़ी होकर
बाघ की तरह पसरी हुई थी
दुबारा वह आदमी
मेरी ओर आ रहा है
और मुझे दूसरे शब्दों की तरह देख रहा है।
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