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त्रिलोचन
कविता के नाम पर हम अनेक सह तत्वों की बात करते हैं, जैसे कि रस,
छन्द ( या मुक्त छन्द)प्रतीक इत्यादि। कविता मात्र सूचना नहीं
होती, बात को प्रस्तुत करने की कला भी होती है। लेकिन यह कला कितनी
सरल या सहज हो सकती है, मैंने त्रिलोचन जी कि पुस्तक " जीने की कला
" पढ़ते हुए पाया। इस पुस्तक में त्रिलोचन जी ने अपने आस पास बिखरी
तमाम सार्थक निरर्थक चीजों को बड़ी सहजता से इस तरह प्रस्तुत किया
है जैसे कि गाँव कस्बों में बड़े बूढ़े सहजोक्तियों द्वारा बच्चों को
अनजाने में सीख दे जाते थे। इस पुस्तक को पढ़ते वक्त मैं एक बारगी
कविता की कला को भूल गई, और त्रिलोचन जी द्वारा बयान की गई जीवन की
कला को अगण्य सी चीजों में खोजने लगी।
दुनिया कैसे बचे
ऊवरकों के अंधाधुंध
उपयोग से कृषि के लिए
हानिकर कीट तो नष्ट
ही हो गए
साथ ही दुसरे जीव भी
समाप्त हो गए
वनस्पतियों के सहारे जीने वाले
जीव जंतु भी जीव रहित हो गए
गीध आदि जो वायुमंडल को
स्वच्छ रखा करते थे
नष्ट होते होते नष्ट हो चले
इस दुर्घट योग से दुनिया कैसे बचे!
अमरूद
तुम भी प्रिय अमरुद वाटिकाऔं के वासी
हो, सेवा दुष्प्राप्य तुम्हें दी जाती है, मैं
आशंसा भी आज क्या करूं, मेरे जैसे
अगणित जन गुण गान तुम्हारा किया करेंगें।
नाम रूप का अंत हिं है, इस जगती में
कर के अनुसंधान इसे पहचान चुका है।
जो बी है आहार वही जीवन दर्शन है
इस सीमा के पार ञान अञान एक है।
सुविचारक प्राचीन तुम्हारा नाम भुला कर
इतस्ततः भटकाव में रहे, क्षमा योग्य हैं
संज्ञाओं से ज्ञान रुप अपना पांता है
जहां नहीं है ञान कहो अज्ञान कहाँ है।
जीने की कला
भूख और प्यास
आदमी से वह सब कराती है
जिसे संस्कृति कहा जाता है।
लिखना, पढ़ना, पहनना, ओढ़ना,
मिलना, झगड़ना, चित्र बनाना, मूर्ति रचना,
पशु पालना और उन से काम लेना यही सारे
काम तो इतिहास हैं मनुष्य के सात द्वीपों और
नौ खंण्डों में।
आदमी जहाँ रहता है उसे देश कहता है। सारी
पृध्वी बँट गई अनगिनत देशों में। ये देश अनेक
देशों का गुट बना कर अन्य गुटों से अकसर
मार काट करते हैं।
आदमी को गौर से देखो। उसे सारी कलाएँ, विज्ञान
तो आते हैं। जीने की कला उसे नहीं
आतीं।

साही
साही के शरीर पर काँटे ही काँटे
होते हैं जो उस पर हमला करने वाले से
उस की रक्षा करते हैं।
जब संकट नहीं होता तब अँधेरी रात में
साही सावधानी से चलता है, उस चलते से
काँटों से जो आवाज होती है उस से
जान पड़ता है कोई तरुणी पायल नूपुर पहने
प्रिय से मिलने के लिए जा रही है।
आत्मरक्षा के लिए साही के सभी काँटे
शत्रु को घायल कर देते हैं।
महुए का मधुपर्व
महुए के कूचे लिए
इन कूचों से मोतियों जैसे फू॥
रात में जरे और सबेरा हो जाने पर भी झरते रहे।
सबेरा होने पर चँगेरी में चुनने के लिए
लड़कियाँ आईँ, रात में जानवर इन फूलों को
खाते रहे, मन भर जाने पर मनचाही जगह गए।
महुए में फल आए, फल कच्चे भी उपयोग में
रहे. पकने पर, फूलों के समान ही, फलों के भी
पशुओं चिड़ियों और आदमियों ने अपने अपने
अंश ग्रहण किए।
फलों के भीतर ही महुए का बीज भी मिलता
है। इन बीजों से तेल निकाला जाता है, जो
विविध कामों में आदमी को व्यस्त रखता
है।
अहरा
किसनू ने उपलों का अहरा लगा दिया।
फिर ढ़ाक के पत्ते ले ले कर
दोने और पातरें बना डालीं।
अहरे पर हँडिया चढ़ा दी गई
अब उस की देखरेख करने के लिए
इन्द्रनाथ पंडित अहरे की घेर में जा बैठे
कोई पास पहुँच गया तो उसे ऊँची आवाज में
डाँटते थे- छू न जाय।
हँदिया में दाल भाजी एक में पकाए गए
किसनू ने आटा गूँध कर भौरियाँ बना लीं
भोजन हो जाने पर किसनू को चौके से बाहर
परोस दिया, और उसे सावधान किया-
देखना तुम्हारी रोटियाँ कहीं कुत्ता न झपट ले जाय।
भाजी सहित पकी दाल स्वादिष्ट बन गई थी
भोजन से निबट कर किसनू ने पंडित के
पाँव दाबे।
लहटोरा

नई पत्तियाँ आईं लहटोरे में, देखो
मंजरियाँ भी, अब किसान के मोंडा-मोड़ी
मंजरियों को तोड़ेंगे जिस से भाजी का
काम चले आज का। शेष हैं जो मंजरियाँ
फूल जाएँगी, इन फूलों से फल निकलेंगे
फल पक पक कर गिरा करेंगे, जिन्हें रात में
बीन बीन कर जंबुक अपने पेट भरेंगे,
किस किस को अपनाता है यह तरु लहटोरा।
मुनगा
इतने सारे फूल
डालें, टहनियाँ भार से
झुकी झुकी पड़ती हैं
लगता है अब टूटीं, बस टूंटी
कहा था रहीम ने
सहिजन अति फूलै तऊ
डार पात की हानि।
बखरी में जो जनमे
उन के कई नाम होते हैं
सहिजन को मुनगा भी कहते हैं
फूल की अढ़िकाई से क्या हुआ
उस की तो कहीं कोई चर्चा नहीं करता
लाँबी लाँबी फलियाँ
रसोई में पहुँचती हैं।
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