
कृत्या प्रकाशन की पुस्तकें
कृपया लिंक देखें
|
|
|
कृत्या का अग्रिम काव्योत्सव फरवरी 2010 में होना निश्चित हुआ है।
इस बार हम एक ऐसे विषय को उत्सव का केन्द्र बनाने जा रहे हैं जो हर
सदी में ज्वलन्त मुद्दा रहा है। हर काल में आदमी अपनी जमीन से मोह
जोड़ता रहा है, और हर काल में उसे अपने इस मोह को विमोह में
परिवर्तित करने को बाध्य होना पड़ रहा है। जमीन से उसका यह रिश्ता
संभवतः उसका अपना बनाया हुआ है, लेकिन उतना ही सत्य है जितने अन्य
प्राकृतिक रिश्ते होते हैं। जमीन से मोह कब और कैसे उपजा? यह
चिन्तन का विषय नहीं है, बल्कि सोचना यह है कि इस रिश्ते की
बुनियाद क्या है? वेद में शाला (घर) को यजमान पत्नी के रूप में
प्रस्तुत किया गया है, अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त आदमी के जमीन के
प्रति मोह, प्रेम और समादर की कथा कहता है। भोजन की खोज में दर दर
भटकने वाला आदिम मानव कब और कैसे जमीन के मोह में पड़ गया,इस विषय
पर ज्यादा सोच की जरूरत नहीं। धरती को जोतना , उसे उर्वरा बनते
देखना......
रति सक्सेना
और »
|
|
|
|
एक
विशाल चट्टान के ऊपर
एक चट्टान इस तरह रखी हुई है
कि अभी अभी गिरने को है
यह अभी अभी गिरने को है पुरातन है
अभी अभी गिरने को है शाश्वत है
अभी अभी गिरने को है एक भविष्य है
विनोद कुमार शुक्ल
*
गमलों के पास
थीं चींटियाँ
तारों पर कपड़े।
अखबार कुछ,
बारिश में
भीगे हुए।
भाई की आई
याद
पास तक
बीते कितने बरस।
प्रयाग शुक्ल
*
चिड़ियाँ रे!
चिड़ियाँ होने का अर्थ फाड़ दो
मछली रे मछली होने का अर्थ काट दो
लड़की चिन्दी चिन्दी कर दो
लड़की होने के अर्थ को
बद्री नारायण
*
कहीं
मिल ना जाएँ
कुछ और यादें
भूली हुई जन्मान्तरों की
यह सोच कर
खोजने की कोशिश नहीं करती
रति
सक्सेना
और »
|
|
|
|
ओयविन्द नोर्वे में कविता की स्थिति से परेशान नहीं लगते, वे कहते
हैं कि यहाँ छोटे से लेकर बड़े तक कविता लिखते हैं। हालाँकि लोग
खरीदते नहीं, लेकिन पुस्तकालय में पढ़ते तो है। उनका मानना है कि
कविता को लोकप्रिय बनाने के लिए स्कूल से ही ध्यान देना चाहिए। वे
इसी तरह के इंस्टीट्यूट में पार्ट टाइम कविता पढ़ाते भी हैं।
अब मैंने ओयविन की पत्नी इंगरिड Ingrid Nielsen से बात करनी शुरु
की। वे स्वयं अध्यापिका होने के साथ- साथ ओयविन की सहचरी हैं जो
समय-समय पर पति की सहायता करती हैं। वे इस बात को समझती है कि
ओयविन्द पूर्वाधुनिक कविता शैली को लती उत्तराधुनिकता में
परिवर्तित करने की क्षमता रखती हैं। विषय में पेंच लाकर असामन्य को
सामान्य बना देते हैं।
मैंने आखिरी सवाल पूछा कि "आपको कैसे पता लगता है कि ओयविन कविता
लिखने वाले हैं, वे मुस्कुरा कर बोलौ कि जब ये बेहद चुप हो जाएँ,
घण्टों अपने में खोए रहें तो मैं इन्हे अकेला छोड़ देती हूँ,
....और »
|
|
|
|
जीने की कला
भूख और प्यास
आदमी से वह सब कराती है
जिसे संस्कृति कहा जाता है।
लिखना, पढ़ना, पहनना, ओढ़ना,
मिलना, झगड़ना, चित्र बनाना, मूर्ति रचना,
पशु पालना और उन से काम लेना यही सारे
काम तो इतिहास हैं मनुष्य के सात द्वीपों और
नौ खंण्डों में।
आदमी जहाँ रहता है उसे देश कहता है। सारी
पृध्वी बँट गई अनगिनत देशों में। ये देश अनेक
देशों का गुट बना कर अन्य गुटों से अकसर
मार काट करते हैं।
आदमी को गौर से देखो। उसे सारी कलाएँ, विज्ञान
तो आते हैं। जीने की कला उसे नहीं
आतीं।
* बखरी
में जो जनमे
उन के कई नाम होते हैं
सहिजन को मुनगा भी कहते हैं
फूल की अढ़िकाई से क्या हुआ
उस की तो कहीं कोई चर्चा नहीं करता
लाँबी लाँबी फलियाँ
रसोई में पहुँचती हैं।
त्रिलोचन
और »
|
|
|
नासरंध्रो के अन्दर से
विशालकाय बुद्ध के
आ रही आज सुबह की धुंध
- कोबायाशी इस्सा
------------------
बिजली चमकी
और एक रात के हेरान की चीख
अंधकार चीरती चली गई
- मात्सुओ बाशो
-----------------
एक पतझड़ की सांझ
एक घण्टा विश्राम का
एक क्षणिक जीवन में
- योसा बुसान
----------------
उमड़ती हवाएं
डांवाशोल हो रही
जालीदार, सफेद बुश क्लोवर
- मियुरा यूजुरु
-------------------
गौशाला के अन्दर
मच्छरों की मन्दिम गुनगुनाहट-
बाहर पतझड़ की तेज हवाएँ
- मात्सुओ बाशो
--------------------
ओह झींगुर!
कबर का रखवाला बन जाना
मेरे जाने के बाद
- कोबायाशी इस्सा
---------------------
निशब्द सम्मिलन
मेहमान
मेजमान, और सफेद गुलदावदी के मध्य
- ओशिमा रयोता
और »
|
|