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कृत्या
का अग्रिम काव्योत्सव फरवरी 2010 में होना निश्चित हुआ है। इस बार
हम एक ऐसे विषय को उत्सव का केन्द्र बनाने जा रहे हैं जो हर सदी
में ज्वलन्त मुद्दा रहा है। हर काल में आदमी अपनी जमीन से मोह
जोड़ता रहा है, और हर काल में उसे अपने इस मोह को विमोह में
परिवर्तित करने को बाध्य होना पड़ रहा है। जमीन से उसका यह रिश्ता
संभवतः उसका अपना बनाया हुआ है, लेकिन उतना ही सत्य है जितने अन्य
नैसर्गिक रिश्ते होते हैं। जमीन से मोह कब और कैसे उपजा,
यह
चिन्तन का विषय नहीं है, बल्कि सोचना यह है कि इस रिश्ते की
बुनियाद क्या है? वेद में शाला (घर) को यजमान पत्नी के रूप में
प्रस्तुत किया गया है, अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त आदमी का जमीन के
प्रति मोह, प्रेम और समादर की कथा कहता है। भोजन की खोज में दर दर
भटकने वाला आदिम मानव कब और कैसे जमीन के मोह में पड़ गया,
इस विषय
पर ज्यादा सोच की जरूरत नहीं। धरती को जोतना, उसे उर्वरा बनते
देखना, उसके पल- पल बदलते रूप रंग को चखना कम आल्हादक नहीं था, यहीं
नहीं उस धरा पर अपने बसेरों को कन्दराओं की अपेक्षा आरामदायक बनाना
आदमी के मन को कम आल्हाद नहीं देता था। लेकिन यही मोह न जाने कब
बढ़ते- बढ़ते आदमी को इस कदर जकड़ने लगा कि वह दूसरों की जमीन को भी
हड़पने की कोशिश में जानवरों की अपेक्षा अपनी ही नस्ल को खत्म करने
लगा। एक के बाद एक ना जाने कितने कोलोसियम खड़े होने लगे। और यहीं
शुरु हुआ जमीन के बिछोह की कथा। एक आदमी का मोह किसी दूसरे का
विमोह बन जाता है।
निर्वासन कई तरह का होता है, एक तो वह जिसमें कुछ नया पाने की चाह
में अपनी इच्छा से अपनी जमीन छोड़ी जाती है, यह निर्वासन अनजाने में
अपने साथ कुछ स्मृतियाँ बटोर ले चलता है, जिसे आदमी जब चाहे खोल कर
देखना पसन्द करता है। स्त्रियों के लिए, विशेष रूप से भारत में
निर्वासन की कथा नई नहीं है, विवाह के नाम पर नए
परिवेश में बसना उसकी अपनी भी चाह बन गई है. लेकिन उसकी स्मृतियों
का पुलन्दा काफी बड़ा होता है, जिससे वह अन्त तक छुटकारा नहीं पा
सकती।
फिर एक निर्वासन होता है प्राकृतिक आपदाओं के कारण से, जिसमें बाढ़,
भूकम्प आदि के कारण आदमी को अपनी जमीन से विलग होना पड़ता है। लेकिन
जो निर्वासन आदमी को कभी हजम नहीं होता, वह है युद्ध
जनित
निर्वासन।
युद्ध की बात करते वक्त हम अनायास शान्ति की बात कर लेते हैं।
आज के समय में शान्ति एक बड़ा मुद्दा है।
कृत्या2010, इसी शान्ति की ओर कलात्मक पहल है।
मित्रों कृत्या का नया अंक आपके समक्ष है, सभी स्तम्भ सोच समझ कर
बनाए गए है, आशा है आपको यह अंक पसन्द आएगा
इस
अंक के कलाकार इटली के Alberto Mori हैं।
शुभकामनाओं सहित
रति सक्सेना
पत्र-संपादक
के नाम
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