विनोद कुमार शुक्ल की कविता

एक विशाल चट्टान के ऊपर

एक विशाल चट्टान के ऊपर
एक चट्टान इस तरह रखी हुई है
कि अभी- अभी गिरने को है
यह अभी- अभी गिरने को है पुरातन है
अभी- अभी गिरने को है शाश्वत है
अभी- अभी गिरने को है एक भविष्य है
पर जो अभी- अभी गिरने को है
कब से कभी नहीं गिर रहा है
और इसके नीचे से एक रास्ता जा रहा है
यह कितना नवीन है
कि इस अभी अभी गिरने को है चट्टान की छाया में
अभी एक चरवाहा आकर खड़ा हो गया है।

(विनोद कुमार शुक्ल की अन्य कविताएँ)


शीला गुलजार की कविताएँ

तिमिर

गगन की गहराइयाँ चीरता
लपकता डकैत
सागर सेज से ज्योति पुंज छीन
साड़ा प्रकाश लील गया!

ज्योत्सना

गगन पर
तैनात खड़े
मेघ दल
पवन ने सीटी बजाई
और चंचल चपला
दुर्ग चीरती
लपकती आई,
कशमकश में टूटी
कंचन कंगन किरचें
चरचराती बिफर आई।

(
शीला गुलजार की अन्य कविताएँ)


प्रयाग शुक्ल की कविता

धूप में भाई

धूप की आँखे थीं अधमुंदी,
सहसा वे खुल गईं--

गमलों के पास
थीं चींटियाँ
तारों पर कपड़े।
अखबार कुछ,
बारिश में
भीगे हुए।

भाई की आई
याद
पास तक
बीते कितने बरस।

छत पर अकेले
यों बैंठे हुए--
फिर हुई अधमुंदी
धूप की आँखे।

( प्रयाग शुक्ल की अन्य कविताएँ)



बद्री नारायण की कविता

चिड़ियाँ रे

चिड़ियाँ रे!
चिड़ियाँ  होने का अर्थ फाड़ दो
मछली रे मछली होने का अर्थ काट दो
लड़की चिन्दी चिन्दी कर दो
लड़की होने के अर्थ को

बकुल के फूल, बकुल के फूल होने के अर्थ को
अपने से थोड़ा अलग करो,
और कमल के फूल की रूप छवियों में
नाभियों अपने लिए जगह माँगो,

पृथवी के नीचे फैली जड़ों,
पेड़ों के बिम्ब में अपने प्रति होने वाले
अन्याय के खिलाफ रख दो माँग पत्र
पत्तियों! उठो और कहो
कि फूल के बनाने में तुम भी शामिल हो

सभ्यताओं के तत्वों सब मिलकर
सब्यताओं का अर्थ ही बदल डालो,
रागों में पूरबी राग,
अपने लिए शास्त्रीय संगीत में जगह माँगो
और फूट नोटों , तुमसे मैं कहते कहते थक गया,
कि उठों और धीरे धीरे पहुँच जाओ
लेखों के बीच मे।

(बद्री नारायण की अन्य कविताएँ)
 


किरन सिंह की कविता

मैं ही तुम थीं

सोनचिरैया व्याकुल बोले
डाली डाली डोले
कब रे मिलेगी पीपल छैया
कोटर में हम सो लें

यह दुनिया एक जंगल चलता
जंगल राज यहाँ पर
कामी गोरिल्ले हैं, लोलुप
लोमड़ बाज यहाँ पर

ओ रे सँपेरे
बीन बजा दे
मत यूँ हाथ मले जा
नागिन बाँध ले जा

क्या तेरी किरपा का सावन
लायेगा हरियाली
क्या टेसू चम्पा महकेंगे
भर जाएगी डाली

ओ रे सँपेरे ज्णा की बूँटी
दे के चाहे चले जा

(किरन सिंह की अन्य कविताएँ)

रति सक्सेना की कविता

*

इन दिनों मैं
भूलने लगी हूँ
चीजें, संभाल कर
रखने पर भी

खोजना शुरु करती हूँ
एक प्रक्रिया की तरह
पर भूलती जाती है
याद के कुन्दों में अटक कर

भूल पानी की सतह पर तैरती
याद तली में जाकर छिप जाती है
दोनों के झगड़े में
वे सब चीजें मिलती जातीं
जिन्हें भूलना भी मैं भूल चुकी थी

और सब तो ठीक था
पर आज सवेरे सवेरे लगा कि
भूल गई हूँ तुम्हारी याद भी
कहीं रख कर

कहीं मिल ना जाएँ
कुछ और यादें
भूली हुई जन्मान्तरों की
यह सोच कर
खोजने की कोशिश नहीं करती

इन दिनों मैंने चीजों को
संभाल कर रखना बन्द कर दिया है।
 

(रति सक्सेना की अन्य कविताएँ)


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