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कृत्या
का अगला कवितोत्सव एक विशेष विषय पर केन्द्रित है- वह है निर्वासन,
पीड़ा और छुटकारा। कृत्या के कुछ अंकों में निर्वासन के बारे में
चर्चा चल रही है। आखिर क्या है निर्वासन. और उसकी पीड़ा। हम अपने
जिन्दगी को ही आईना बना कर देखे तो हमें निर्वासन के भी कई रंग
दिखाई देंगे। कबीर के शब्दों में हमें यह सांसारिक जीवन ही
निर्वासन दिखाई देता है, यानि कि जीवन भर हम परमात्मा के लोक से
निर्वासित होने की पीड़ा भोगते रहते हैं..रहना नहीं यह देश पराया
है. यह निर्वासन जब मन का हो जाता है तो व्यक्ति कला के क्षेत्र
में प्रवेश कर लेता है। प्रत्येक कलाकार, लेखक , कवि इस निर्वासन
को जिन्दगी भर महसूस करता रहता है। फिर एक होता है पारीवारिक
निर्वासन, जैसे कि विवाह के बाद पुत्री का पति के घर जा बसना, या
फिर नौकरी के लिए विदेश की खाक फाँकना... किन्तु इस तरह के
निर्वासन में बाध्यता की अपेक्षा आवश्यकता का महत्व होता है।
कवितोत्सव में हम इन सब निर्वासन की बात नहीं कर रहे हैं, हम उस
पीड़ा की बात कर रहे हैं जिसके पश्चातल में नफरत, हिंसा और युद्ध
होता है। यह निर्वासन कभी- कभी तो दैहिक होता है तो कभी मानसिक, जो
कुछ भी हो इस निर्वासन की टीस से छुटकारा पाना सरल नहीं, कभी कभी
तो इस दंश की चुभन पीड़ियों तक चली आती है, और लगातार निर्वासनों की
भूमिका बनाती जाती है। दुनिया भर के अनेक लोग इस तरह के निर्वासनों
से पीड़ित रहे हैं। इसका कारण कभी युद्ध होता है तो कभी जमीन के
प्रति अत्याग्रह। इस निर्वासन के शिकार सामान्य जन तो बनते हैं ही,
प्रमुख स्थान रखने वाले लोग भी इसे भोगने को मजबूर होते हैं।
मानव कितनी भी प्रेम की बात क्यों ना कर ले, वह इस निर्वासन से
छुटकारा नहीं पा पाया है।
कृत्याउत्सव 2010 इसी निर्वासन के विभिन्न अंग ले कर उपस्थित
होगा, कविता, चित्र और फिल्म के जरिये हम इन सभी भावों से
गुजरेंगे?
पाठकों और लेखकों से प्रार्थना है कि वे अपने विचारों से परिचित
करवाए और इस सम्बन्ध में यदि कोई विचार हों तो कृत्या के लिए भेजे।
यह अंक फिर अपने नए कलेवर में उपस्थित है, इस अंक के कलाकार अमित
कल्ला हैं।
प्रिय कवि के लिए इरान के कवि Abolqasem Esmaelpour की कविताओं के
अनुवाद है जो उन्होंने लिखी तो परशियन शैली में, लेकिन उनका रंग
चीनी है।
अन्य स्तम्भ भी पठनीय हैं इसी विश्वास के साथ नया अंक प्रस्तुत है।
रति सक्सेना
पत्र-संपादक
के नाम
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