प्रताप सहगल की कविता
दुरमुट
मजदूर के हाथों
रोडी कूटता दुरमुट
फिसल जाता है
हथिया लेता है उसे डॉक्टर
और मोटी सुई बना लेता है
मास्टर के हाथों में
छडी बन जाता हैं दुरमुट
पिता के हाथों आदेश
राजनेता के हाथ में
स्टेनगन होता है दुरमुट
और धर्माचार्य के होंठों पर
काला मन्त्र
अजीब शै है दुरमुट
हाथ बदलते ही शक्ल बदलता है
सुई, छडी, आदेश , काला मन्त्र
या नौकरशाह की
भारी भरकम कलम
कितना अच्छा लगता है
मजदूर के हाथ में ही दुरमुट
समतल करता ज़मीन
उस पर बनता है फर्श
फर्श पर ही टिके रहते हैं पाँव
वहीं से दीखते हैं शहर, कस्बे और गाँव

दुरमुट का हाथ बदलना
इतिहास में बार-बार हुई एक दुर्घटना है ।
(प्रताप
सहगल की अन्य कविताएँ)
चेतना वर्मा की कविता
कविता का जन्म
जैसे भींगते हैं पेड़ों पर पत्ते,
मुंडेर पर कबूतर
और पानी पर पानी
भींगती है लड़की-भींगती ही जाती है
चौके की गरमी से
जलता है मन
और उसमें उफनती है कविता
दूध में आये उबाल की तरह
बर्तनों की झनझनाहट
साँसों की उकताहट में
रोशनदान के मकड़जाल में बुनती कविता
शब्द बजते हैं
टेलिफोन की घंटी में
बच्चों की फीस में
दूध के हिसाब में
उलझ जाते है शब्द
टूटती हैं प्यालियाँ
तो टूट जाती है कविता
सलवटें माँ के आँचल की
बाबू के ब्लडप्रेशर
मुन्नी की सर्दी
और टीनू की जिद में सिमट जाती है कविता
पसीने शब्दों को बाँध नहीं पाते
कई कई बार लगता है कि बाँध कर रख ले
सहेज समेट लें शब्दों की भँवर को
मिट्टी की तरह साने, आकार दे
शब्दों में बोले
रेत रे मन को भी सींच लें
टूट भी जाये तो बिखरने न दे
पर टूटता है मन तो बिखरती है कविता
जितना सोचती है उतना दुखता है मन
साँसों के तार को कसे कि ढीला ही छोड़ दे
मन क्यों हर बार निर्बन्ध किसी बन्धन को
अब नही डरेगी या मरेगी कविता
जीवन के बंजर में भी पनपेगी
फिर जनम लेगी कविता
और फिर जनम लेगी कविता।
(चेतना वर्मा की अन्य कविताएँ)
आशीष दशोत्तर की कविता
उनकी दुआ
मृत्युंजय महादेव के सामने खड़े हो कर
यीशू का नाम लेती वे महिलाएँ
दुआ कर रहीं हैं खुदा से।
एक बड़े अस्पताल के स्वागत कक्ष में
हर रोज अपने दिन की शुरुआत
करती हैं वे इसी तरह।
वे दुआ करती हैं इसलिए कि
सेवा में सत्यता रहे
कर्म में कहीं कमीं न रह जाए
जो यहाँ आया है
मायूसी लेकर
वह मुसकुराहट के साथ लौटे
कहीं कोई निराश न हो,
हर तरफ खुशियाँ बिखरी रहे
कहीं अधर्म ना हो धर्म के नाम पर
किसी को अभावों में दम ना तोड़ना पड़े
उनकी दुआओं में कितनी पवित्रता है
कि उनका स्वर फूटेते ही
झूमने लगते हैं पेड़
लहराने लगती हैं लताएँ
खुशबू बिखेरने लगते हैं फूल
मरीजों के साथ महादेव के
मुख पर भी आने लगती है मुस्कान
यीशू और खुदा भी खुश होते होंगे इस समय
दुनिया की तमाम सभ्यताएँ साथ देने को
आतुर रही होंगी उनका
अन्याय और आतंक के खलिफाओं की
जमीन दरकने लगतीं होंगी इनकी आवाज सुनकर
नईं कोंपलों सी स्वाभाविकता लिए
कई कविताएँ जन्मना चाहतीं होंगी
समूची मानवता
इस वक्त जबकि अस्पताल में मौजूद तमाम लोग
खड़े हो जाते हैं उनके पीछे हाथ जोड़कर
उनकी दुआ यूं तब्दील हो जाती है
इंसानियत के राग में।
(आशीष
दशोत्तर की अन्य कविता)
विजय गौड़ की कविता
जवानी के इन दिनों में
बचपन के उन दिनों में
नहीं रहा उतना बच्चा
जितना खरगोश
जितनी गिलहरी
जितना कि धान का पौधा
जवानी के इन दिनों में
नहीं हूँ इतना जवान
जितना गाय का बछड़ा
अमरूद का पेड़
फिर बुढ़ापे के उन दिनों में
कैसे होऊँगा ऐसा बूढ़ा
जितना कि बरगद का पेड़।
(विजय
गौड़ की अन्य कविताएँ)
क्रान्ति की कविताएँ

धूप की जड़ें
तुम अपनी ह्थेली पर
सूरज मत बोना
उजाले की चाह में
मेरी तरह
धूप की जड़ें जब
रग रग में पहुँच जाती हैं
बहुत तकलीफ होती है
(क्रान्ति की की अन्य कविताएँ )