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क्रान्ति की कविताएँ घर परिवार से लेकर समाज के हर क्षेत्र में
झाँकती हैं, और कविता को सहजता से जोड़ती हैं।
अच्छा नहीं किया
तुम्हे मेरे कंधों पर से
बोझ उतारना था
तुमने मेरे कंधों पर से
सिर उतार कर अच्छा नहीं किया।
इस बार
सच कहती हूँ
इस बार गाँव जाऊँगी
तो पूरी की पूरी
वापिस नहीं लौटूंगी,
इस बार पहली बारिश के बाद
जब खेत पर चमकेगा पहला सूरज
मैं सौंधी गीली मिट्टी में
एक मुट्ठी याद बोकर आऊँगी।
सच कहती हूँ
इस बार गाँव जाऊँगी
तो पूरी की पूरी
वापिस नहीं लौटूंगी,

मैं पृथ्वी हूँ
मैं पृथ्वी हूँ
निरन्तर घूम रही हूँ
अपनी धुरी पर
और तुम्हारे चारों तरफ
तुम सूरज हो
प्रकाशित हो
परन्तु स्थिर हो
तभी तो
मेरी थकान से अनभिज्ञ
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