मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 

कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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आज की सबसे बड़ी चुनौती है मन के कोने में कोने में बसा अंधकार, जो हमारे लिए ला रहा है आतंक, पीड़ा और अविश्वास। युद्ध का स्वरूप बदल गया, उसका चेहरा और अधिक स्याह पड़ गया, आतंक के रूप बदल गए, वह और अधिक भयावह हो गया। आतंक और भय उस युग की याद दिलाने लगा है जब आदमी को अपने से कहीं बड़े जीवों के बीच अपने लिए जगह बनानी पड़ रही थी।
उस वक्त भय ने फन उठाया होगा , लेकिन आदमी उससे विजित रहने की कोशिश करता रहा।

लेकिन आज जब बाहर से सब कुछ चकाचौंध है, सब ओर सुरक्षा का आभास है , फिर भी कुछ ऐसा है कि आदमी पहले से कहीं ज्यादा भयभीत है. पहले से कहीं ज्यादा अंधकार में लिप्त है। सबसे बड़ी चुनौती तो उस अंधकार से है जो मुखौटा पहन कर आया है। कृत्या के अग्रिम उत्सव में हम उसी अंधकार को शब्द, रंग और चित्रों द्वारा रेखांकित करने की कोशिश करने जा रहे है।
रति सक्सेना

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मैं घूमती हूँ
पत्थर, तने
हड्डी, एक पत्ती
की तरह
मेरी मुट्ठी बन्द
हो जाती है
फिर कभी ना खुलने को
*
मेरी रोटी
सख्त हो गई है
पत्थर की तरह,
आँखो की लालिमा
प्रतिबिम्बित हो रही है
लकड़ियाँ सुलगनी
शुरु हो रही हैं
elisa biagini

*

कुछ औरते मुझे कब्र से दूर ले गईं
पर वे कहाँ दूर कर पाई मुझें पीड़ा से

मै्ने अविश्वास से चुपके रहना चाहा
सच पर अविश्वास, लेकिन
वह मिट्टी, तुम्हारी मिट्टी
आज भी मेरे जूतों पर चिपकी है।

हेलेन दावर

*
कभी तड़पी है, रूह ऐसे
गूँज उठा, हर कोना मेरा
ला अब तो मिला
वो जो है, अधूरा अक्स मेरा

समीर कक्कड़
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दुनिया रूमाल की तरह छोटी होती जा रही है, और आदमी नई नई जगह घूम रहा है। वह नई भूमि में अपने को आसानी से खपा भी लेता है, उसकी अस्मिता विस्तार पाती जाती है, वह वैश्विक राजनीति का हिस्सा भी बनता जाता है। लेकिन तभी तक, जब तक वह इस सवाल से रूबरू नहीं होता कि " मैं कौन हूँ?" और उसे ज्यादा परेशान करता है जिसकी अस्मिता वैश्विक अस्मिता के कारण बनी है।
जो निर्वासन में रहता है उसके लिए प्यार या अस्मिता एक मिथक में बदल जाती है। वह अपने खालीपन को नई चीजों से भरने की कोशिश में लगा रहता है। लौटने का कोई रास्ता नहीं , क्यों कि यह जरूरी नहीं कि लौटने पर वही पुरानी खोई हुई अस्मिता फिर से मिल जाए।
निर्वास उसके लिए एक आकार तैयार करता है, वह उसमे अपने को तैयार कर सकता है। मोहब्बत मौत से ज्यादा मारक होती है।
प्यार उसे जीवन रस देता है, उसे अस्मिता देता है और उसका अपने धर्म की भावभुमि तैयार करता है।

सिंगोनिया सिंगोने
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*
मुहब्बत अमरता है, रहेगी अमरत्व तक
प्रेमी छूट जाता है जिन्दगी और मुहब्बत के बन्धन से
कल जब कयामत आएगी
हर दिल जो प्रेम डूबा नहीं, छूट जाएगा बन्धन से
*
तुमने उसे चाँद कहा, गलत, चाँद की तुलना ही कहाँ?
तुमने उसे राजा कहा, गलत, राजा की कोई तुलना कहाँ?
न जाने कितनी बार तुमने कहा कि "तुम देर से उठे"
जब सूरज मेरे साथ तो वक्त का क्या मतलब मेरे लिए?
**
तुम्हारी मुहब्बत ने मेरी देह को उठा दिया आसमान तक
और तुमने ऊपर उठा दिया दोनों जहाँ से
मेरी चाहत है कि तुम्हारा सूरज मेरी बरसाती बून्दों तक पहुँचे
जिससे मेरी रुह बादल बन ऊपर उठे

***
 तुम जो हर कठिनाई को बनाते हो आसान
फूल पत्ते, बगीचे, और दरख्त पान करते तुम्हारा मधु उपहार,
गुलाब मदमत्त है, काँटे स्वप्न में लीन
एक प्याला और दो, वे आ मिलेंगे तुमसे सुरा नद में

मौलाना जलालुद्दिन रूमी

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अरणि पुष्प सी मैं हुई पीली
सावन की उजली चमेली
कब लौट मुझे वे दर्शन देंगे

झेल रही हूँ उलाहने नित
आँच विरह की दग्ध किए है
कौन उसे जा हाल बखाने
कब लौट मुझे वे दर्शन देंगे

कंद मिश्री की आरटी उतारी
फिर छल कर मुझे कहाँ गये
बीच सबों के उपहास किया
कब लौट मुझे वे दर्शन देंगे

मेरी कौन सौतन भरमाई उन्हें
जो मुझे छोड़ दूसरी ने लुभाया
सजूँगी मैं भी अस्त्र शस्त्र से
कब लौट मुझे वे दर्शन देंगे

सुबह उठूँगी मैं मुँह अंधेरे
पर्वत पर्वत ढ़ूढ़ूंगी उनको
कब लाकर कमाई मेरे हाथ रखेंगे
कब लौट मुझे वे दर्शन देंगे

अरुणिमाल की कविताएँ
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VOL - V/ PART VII

(दिसम्बर -  2009
)

संपादक :  रति सक्सेना


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