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जो
दो अनुभव आदमी को दहला देते हैं, उनमें से एक है अंधकार, दूसरा भय।
अंधकार मात्र प्रतीति नहीं, अभाव नहीं बल्कि भाव का आधार भी है।
नासदीय सूक्त में यही कहा गया है कि सृष्टि के आरंभ में केवल तम
था,जो स्वयं तम से आवृत्त था। उसी से सृष्टि का बीज हुआ। सृष्टि का मूल
तमस कब मन के तमस में परिवर्तित हो गया, मालूम ही नहीं पड़ा। सृष्टि
का सफर मात्र आदमी का सफर नहीं, पूरी कयानात साथ चली है, सभी जीव-जन्तु, सभी पेड़-पौधे, सभी कीड़े-मकौड़े. पानी, आकाश, हवा और ना जाने
क्या क्या। अंधकार भी इस सफर में साथ था, पर ना जाने कब और कैसे
अंधकार अपना अर्थ ही खो बैठा, सृजन के स्थान पर क्रूरता का पर्याय
बन गया।
आज की सबसे बड़ी चुनौती है मन के कोने में कोने में बसा अंधकार, जो
हमारे लिए ला रहा है आतंक, पीड़ा और अविश्वास। युद्ध का स्वरूप बदल
गया, उसका चेहरा और अधिक स्याह पड़ गया, आतंक के रूप बदल गए, वह और
अधिक भयावह हो गया। आतंक और भय उस युग की याद दिलाने लगा है जब
आदमी को अपने से कहीं बड़े जीवों के बीच अपने लिए जगह बनाने के लिए
क्रूरता और चतुराई को जिन्दगी का मूल उद्देश्य बनाना पड़ रहा था
उस वक्त भय ने फन उठाया होगा , लेकिन आदमी उससे विजित रहने की
कोशिश करता रहा।
लेकिन आज जब बाहर से सब कुछ चकाचौंध है, सब ओर सुरक्षा का आभास है
, फिर भी कुछ ऐसा है कि आदमी पहले से कहीं ज्यादा भयभीत है. पहले
से कहीं ज्यादा अंधकार में लिप्त है। सबसे बड़ी चुनौती तो उस अंधकार
से है जो मुखौटा पहन कर आया है।
कृत्या के अग्रिम उत्सव में हम उसी अंधकार को शब्द, रंग और चित्रों
द्वारा रेखांकित करने की कोशिश करने जा रहे है। इस संन्दर्भ में
सिंगोनिया सिंगोने ( इतालवी कवियित्री ) के उस लेख की कुछ
पंक्तियों को रेखांकित करना चाहूंगी जो उन्होने हमे उत्सव के लिए
विशेष रूप से भेजा है।
"आदमी जन्म से ही निर्वासन में जीता है। उसकी जिन्दगी का संचालन
मौत के हाथों होता है। तभी तो वह जब तक इस दुनिया में रहता है ,
अपनी अस्मिता और अपने आप को तलाशता रहता है। यह क्रम शताब्दियों से
चल रहा है। यही नहीं अपनी जड़ों को तलाशना आदमी की सबसे तीव्र
मनोभावना बन रही है। उसके लिए यह अनुभूत करना ही संतोषदायक होता है
कि उसकी जड़े इस धरती में हैं, यही नहीं उसके लिए खास जगह भी है, जो
शनै: शनै: उसकी अपनी बनती जा रही है। "
लेकिन इस का जवाब भी उन्ही के लेख में है- जो निर्वासन में रहता है
उसके लिए प्यार या अस्मिता एक मिथक में बदल जाती है। वह अपने
खालीपन को नई चीजों से भरने की कोशिश में लगा रहता है। लौटने का
कोई रास्ता नहीं, क्यों कि यह जरूरी नहीं कि लौटने पर वही पुरानी
खोई हुई अस्मिता फिर से मिल जाए।

निर्वासन उसके लिए एक आकार तैयार करता है, वह उसमे अपने को तैयार
कर सकता है। मोहब्बत मौत से ज्यादा मारक होती है।
प्यार उसे जीवन रस देता है, उसे अस्मिता देता है और उसका अपने धर्म
की भावभुमि तैयार करता है। यही उसकी कलात्मकता का आधार होता है जो
उसे ईश्वर से जोड़ती है, जहाँ निर्वासन की कोई भूमि नहीं। "
कृत्या का यह अंक अँधकार के विरुद्ध प्यार मोहब्बत के प्रति
इस अंक के कलाकार केरल के कलाकार बिनु है,
आशा है यह अंक कुछ संदेश देगा
शूभकामना सहित
रति सक्सेना
पत्र-संपादक
के नाम
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