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एलिसा बैगिनि elisa biagini

इतालवी से हिन्दी में अनुवाद

मैं चकराती हूँ
पत्थर, तने
हड्डी, एक पत्ती
की तरह
मेरी मुट्ठी बन्द
हो जाती है
फिर कभी ना खुलने को

*

मेरी रोटी
सख्त हो गई है
पत्थर की तरह,
आँखो की लालिमा
प्रतिबिम्बित हो रही है
लकड़ियाँ सुलगनी
शुरु हो रही हैं

*

एप्रोन के भीतर
रोटी और पत्थर
मेरी कलाई ने
धरती को सूंघा
घण्टी की तरह घनघनाते
बर्तन ने मुझे पुकारा

*

मैंने डोरी से नापा
घर से घर को
देह से देह तक
पानी से बतियाते
पत्थर को निहारते
(मेरे मुँह की गोलाई
चौराहे की तरह)

*

हवा, जो कि भूखी है
और टहनियों को चूस लेती है
हड्डी की तरह, फिर
थूक देती है, यहाँ
आदमी के कदम
कुल्हाड़ी की तरह

*

भूखे चिकने भेड़िये की तरह
मैं खिसक जाती हूँ
लकड़ियों के बीच में
खोजती हूँ पत्तियों के
फिंगर बेल्स को

अनुवाद-रति सक्सेना


नीलिमा गर्ग की कविता

समय

मुट्ठी में बंधी रेत की तरह
फिसल रहा है हाथ से
समय
बँधा क्यूं नही रहता
कुछ ख़ूबसूरत लम्हो की तरह
समय बहता रहता है दरिया की तरह
समय
पलट कर नही आता
नही दिखता गुज़रे वक़्त की परछाई
दर्पण में पड़ी लकीरो की तरह


( नीलिमा गर्ग की अन्य कविता)


वंदना शांतुईन्दु , गुजराती कविता

ओ नर्मदा के कंकर

विस्थापन का विष पीकर

बन जा तू शंकर.

पता है..........पता है कि

तेरे पुरखो के पसीने की सुगंध

उस मिट्टी में महकती है

उस सुगंध से मतवाली होकर नर्मदा

सुरपाण की घाटी में चिड़यॉ बन चहकती है

और अंतस तेरा रटता रहता है नर्मदा के मंतर

ओ नर्मदा के कंकर......

तेरे ही सांसो के तिनके लेकर

तेरी छाती की गुफा में

नर्मदा ने बनाया है घोंसला

और नर्मदा की छाती पर खेलकर

तेरा भी बुलंद हुआ है हौसला

बात यह जानते है न जाने कितने ही मनवंतर

ओ नर्मदा के कंकर.........

सिंधु जहॉ रुठ गई है

और सरस्वती हुई है लुप्त

वह मरीचिका के जंगलमें धरा लगती है

सगर के वंशज जैसी मृत

भागीरथ बन के तू नर्मदा को वहा बहा लेजा

करदे सब को तृप्त

तू ही भगीरथ,तू ही शंकर

बन जा तू धरती का अंतस.

 


शशि भूषण सिंह की कविता


जब भी होता हूँ पास तुम्हारे

एक गाँठ सी पड़ी है बरसों से
जो खुलने लगती है
एक टीस सी रहती है हरदम
जो मिटने लगता है
एक कोहरा सा आवृत्त है मन पर
जो छँटने लगता है

और क्या क्या बताऊँ
जब भी होता हूँ पास तुम्हारे
कितना छोटा होता है पल
किंतु उन पलों में
क्या कुछ नहीं होता

एक मौन सा
जो फैला है हर तरफ
गुनगुनाने लगता है
दौड़ता भागता
थका-थका सा तन मन
सुस्ताने लगता है
मेरा जीवन
जो मौसम है पतझड़ का
हरियाने लगता है

और क्या- क्या बताऊँ
जब भी होता हूँ पास तुम्हारे
कितना छोटा होता है पल
किंतु उन पलों में
क्या कुछ नहीं होता

जैसे चली हो पुरवाई
अचानक एकदम से
और पुराने जोड़ों का दर्द
सताने लगता है
जैसे अचंचल जल में किसी ने
फेंका हो कंकड़
और मन का कोना-कोना
लहराने लगता है
जैसे मन के भीतर एक और मन
जो रहता आया गुमसुम
तुम्हें देखकर अचानक
बतियाने लगता है

और क्या-क्या बताऊँ
जब भी होता हूँ पास तुम्हारे
कितना छोटा होता है पल
किंतु उन पलों में
क्या कुछ नहीं होता

कितनी पंकिल मिट्टी
लितना अनगढ़ साँचा
कैसे आकार दूँ इन्हें
ढ़ालूँ कैसे शब्दों में
कैसे कैसे प्रश्न उठते हैं मन में
पर उत्तर एक का भी नहीं होता!


(शशि भूषण सिंह की अन्य कविताएँ)


हेलेन दावर की कविता ( HELEN DWYER)

तुम्हारे दफनाने जाने की
अगली सुबह जब मैं उठी
तो पहली चीज जो मैने देखी
वे मेरे जूते थे

बरसात ने कब्र खोदने वालों का काम
आसान कर दिया था, तुम किसी को
परेशान करना ही कहाँ चाहते हो
शायद मैं भी उन्हे जल्द माफ कर दूँ
काम पाने के लिए गिद्ध की तरह
ताक लगाए उन लोगों को

कुछ औरते मुझे कब्र से दूर ले गईं
पर वे कहाँ दूर कर पाई मुझें पीड़ा से

मै्ने अविश्वास से चुपके रहना चाहा
सच पर अविश्वास, लेकिन
वह मिट्टी, तुम्हारी मिट्टी
आज भी मेरे जूतों पर चिपकी है।

(हेलेन दावर की अन्य कविताएँ)
 


समीर कक्कड़ की गजलें

तड़प

कभी तड़पी है, रूह ऐसे
गूँज उठा, हर कोना मेरा
ला अब तो मिला
वो जो है, अधूरा अक्स मेरा

फरियाद है जहनी
सुनाई नहीं, फकत महसूस होगी
जाने कब, तेरे सबब की
खुदाई में तामील होगी

( समीर कक्कड़ की अन्य गजलें)

 


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