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अक्कितम की कविताएँ
मलयालम
के सुप्रसिद्ध कवि अक्कितम जी उस पीढ़ी के कवि हैं, जिसने आधुनिकता
को पनपते और विकसित होते देखा। यही कारण है उनकी कविता पारम्परिक
सौन्दर्य के साथ समकालीन समस्याओं से जूझती हुई दिखाई देती है। कवि
केरल के नम्बूतिरी ब्राह्मण समाज से ताल्लुक रखते हूए भी सामाजिक
कुरीतियों से परहेज रखते हैं। आपकी कविताएँ एक लम्बे काल और सथान
से गुजरती हुई हर क्षण को सही जताती है।
इन कविताओं का अनुवाद उमेश कुमार सिंह चौहान ने किया है, जो स्वयं
कवि हैं और अच्छे अनुवादक है। अक्कितम अच्युतन नम्बूदिरी का जन्म
केरल में 18 मार्च 1926 में हुआ था़ आपने आठ की उम्र से काव्य रचना
आरम्भ कर दी थी। और कुल मिला कर 46 कृतियाँ प्रकाशित की। आपको अनेक
सम्मान मिले जिनमें प्रमुख हैं केन्द्र साहित्य अकादमी का ( 1973)
, कबीर पुरस्कार और केरल सरकार का एषुतच्छन सम्मान।
पतंगों से
आग में कूदकर मरने के लिए या
आग खाने की लालसा में
आग की ओर समूह में
दौड़े जा रहे हैं छोटे पतंगे?
आग में कूद कर मर जाने ले लिए ही
दुनिया में बुराइयाँ होती हैं क्या?
पैदा होते ही
भर गई निराशा कैसे?
खाने के लिए ही है यह जलती हुई आग
यदि तुम यही सोच रहे हो
तो फिर निखिलेश्वर को छोड़कर
तुमसे कुछ भी कहना नहीं।
विवेक पैदा होने तक अब हर कोई
बिना पंख वाला ही बना रहे।
घास
खिले पुष्पों से आच्छादित भूमि में
अतीत में ही पैदा हुआ मैं घास बनकर
उस वक्त भी आवाज सुनी
तुम्हारी बांसुरी की
मधुर रोमांच से खुल गई आँखे
आत्मा की आँखें खुलने पर
आश्चर्य से शिथिल हो गया मैं
उस रोमांच की लहर से ही तो मैं
आकाश तक विस्तृत हो सका
उत्तुंग मेरा मुख आकाशगंगा की
खंडित माला में संविलीन हो गया।
उस मुहुर्त में मेरा मुख
श्वेत कमल पुष्प बन गया
फिर भी पाँवों के नीचे अभी भी नम है
भूमि द्वारा अतीत में लिपटाई गयी मिट्टी
उस मिट्टी को छुड़ाऊँगा नहीं मैं
अन्यथा मेरा कमल पुष्प बिखर जाएगा न।

मेरी मिट्टी में ही उगी है न
तुम्हारे होंठों की बाँसुरी भी तो?
झंकार
बाँबी की शुष्क मिट्टी के
अन्तः अश्रुओं के सिंचन से
पहली बार विकसे पुष्प!
मानव वंश की सुषुम्ना के छोर पर
आनन्द रूपी पुष्पित पुष्प!
हजारों नुकीली पंखुड़ियों से युक्त हो
दस हजार वर्षों से सुसज्जित पुष्प!
आत्मा को सदा
चिर युवा बनाने वाले
विवेक का अमृत देने वाले पुष्प!
सुश्वेत कमल पुष्प!
तू निरन्तर सौरभ का कर संचार
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मैं इसे ग्रहण कर उनींदे मन से
प्रज्ञा की पलकें खोल रहा हूँ
मैं दीनानुकम्पा में वाष्पित हो
गीत की तरह हवा में तैर रहा हूँ
मैं सोमरस व सामवेद पर विजय प्राप्त करती
एक लय - रोमांच बनकर उभर रहा हूँ।
परम दुख
कल आधी रात में बिखरी चाँदनी में
स्वयं को भूल
उसी में लीन हो गया मैं
स्वतः ही
फूट फूट कर रोया मैं
नक्षत्र व्यूह अचानक ही लुप्त हो गया।
निशीथ गायिनी चिड़िया तक ने
कारण न पूछा
हवा भी मेरे पसीने की बून्दें न सुखा पायी।
पड़ोस के पेड़ से
पुराना पत्ता तक भी न झड़ा
दुनिया इस कहानी को
बिल्कुल भी न जान सकी।
पैर के नीचे की घास भी न हिली डुली
फिर भी मैंने किसी से नहीं बतायी वह बात।
क्या है
यह सोच भी नहीं पा रहा मैं
फिर इस बारे में दूसरों को क्या बताऊँ मैं?
इन कविताओं का अनुवाद उमेश कुमार सिंह चौहान ने किया है, जो स्वयं
संवेदनशील कवि , लेखक हैँ।
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