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नए दिन की शुरुआत मैं धूल झाड़ने से करती हूं, फर्नीचर पर, अलमारियों में ओर किताबों पर जमी धूल झाड़ते झाड़ते मैं ना जाने कब यादों पर जमी धूल जाड़ने लगती हूं, पता ही नहीं चलता है। मेरे हा् चल रहे हें. लेकिन यादों पर, मन भटक रहा है तो बस बीते हुए वक्त पर। मैं अपने को झकझोर कर कहती हूँ कि भई , यह वक्त आगे का सोचने का है, पीछे का नहीं... लेकिन भविष्य की नींव भूत पर ही तो रखी गई है। लोग जश्न मनाते हैं न॓ साल का, लेकिन नया क्या है इसे समझने में काफी वक्त लगता है। केवल कुछ अंकों के बदलने से, या दीवार पर टंगे कलेण्डर के बदल जाने से क्या क्या बदल सकता है?
मैं फिर धूल झाड़ने लगती हूं, यादों को चमका देती हूँ, लेकिन इससे मन को कष्ट ही होता है। हर याद किसी ना किसी तरफ की कसक लिए ही होती है। मेरी यादों से निकलते हैं केरल के धान के खेत, जो आज किसी सपने की तरह गुल हो गए है, आज सभी खेतों पर करोड़ों की कोठियाँ खड़ी हो गई हैं, जिसे खाड़ी में काम करने वाले केरलियों ने मेहनत से खड़ा किया है. लेकिन आज ये कोठियाँ खाली हैं, क्यों कि उनकी सारी कमाई तो ईँट- गारे में ही खप गई, लेकिन धान का कटोरा खाली हो गया।

नए साल में हम सब खाने की कीमतों को रो रहे हैं, लेकिन सभी जानते हैं कि इसके पीछे बहुत कुच ऐसा है जो हमारी गलती का परिणाम है। खेती ना जाने कब और केसे नगण्य काम बनता गया कि फस ना हो पाने के परिणाम की ओर हमारा ध्यान ही नहीं गया। काश हम लोग अब भी कुछ समझ लें। मेरी यादों की धूल झरती हे तो मां की बगीची दिखाई देती है। पिता की तबादले वाली नौकरी थी, लेकिन हम जहाँ भी जाते, मां दो चार महिने में ही घर को हरा भरा कर लेतीं। वे हर उस सब्जी का बीज बो लेती जो कुछ महिनों में ही फल दे सकती है. तौरई. घिया, हमारे बरामदों में लटकने लगतीं। हरा धनिया पौधिना पिछवाड़े में जम जाता, फिर देसी मौसमी सब्जियाँ, जैसे कि भीण्डी, टमाटर आदि। माँ ऐसा क्यों करती थीं, हम लोग सोच नहीं पाते थे, कभी कभी लगता भी कि यह क्या, खूबसूरत फूलों की जगह हमारे बरामदों में तौरई लौकी झूलती हूँ, लेकिन जब ये चीजें हमारे खाने की थालियों में आतीं तो नैमत बन जातीं थीं।
मुझे याद नहीं कि मैंने कभी सब्जी उगाने की कोशिश भी की हो..
मुझे लगता है कि कितने बड़े स्वाद को मैं खोती रही हूँ। लेकिन आज लगने लगता है कि आज की समस्या को कुच हद तक तो कम किया जा सकता था यदि हम सभी अपने अपने घरों में कुछ ना कुछ उगा सकते। यदि हम ईंट गारों के भवनों की जगह कुछ हरा भरा उगा पाते, या फिर नारियलों को ही झूमने देते।

साल नया है, लेकिन समस्याएँ नई नहीं, इन समस्याओं से जूझने की कोशिश नई नहीं। दरअसल जरूरत है , धूल झाड़ने की, और झाड़ने के बाद जो कुछ चमके उसे स्वीकार कर लेने की। बहुत कुछ ऐसा है जो हम अपने भूत से ले सकते हैं।

संभवतः इस तरह की बाते करना मेरे विचारों के बासी पड़ने का परिचायक है. लेकिन नए साल का एक यह मतलब भी है कि हम एक साल और बासी हो गए हैं, लेकिन इस बासीपन को ताजा किया जा सकता है पुराने विचारों को नई तरीके से अपनाने में।

नए वर्ष की शुभकामनाओं सहित

रति सक्सेना

 
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