सुरेश सेन निशान्त की मौलिक कविता

सर्द पहाड़ों पर
बर्फ से घिरे एक कवि की बुदबुदाहट

                      (अजेय के लिए)


एक

कहो कैसी है
वहाँ धूप
यहाँ तो खूब चिढ़ाती है
वह आजकल!

एक जल तरंग
एक धूप की किरण
एक चिड़िया की चहचहाहट
सुनने देखने को
तरसती रहती हैं इच्छाएं।

अंधेरी रातों में
याद आती है
कोई कविता।

उसे पढ़ने की जिद
देर तक ढूंढती रहती है
उस दीये की लौ
दिनों पहले ही
जल कर हो चुका है खत्म
जिसका तेल।

दो

अंधेरा
कांटे सा चुभता है।

हवा
शीत की तलवार लेकर
घूमती है
बैखोफ।

पिछली गर्मियों में
शुर का वह अकेला पेड़ भी
जल कर

हो गया खाक
जिसके हरेपन ने
न जाने कितनी बार था बचाया
उदासियों मे डूबने से
मुझे
हिमपात के इन
कठिन दिनों में।

(कविता का शेष भाग)


शैलेय की कविता

मृत्युंजय

अमृतपान
नहीं चाहता हूँ मैं
नहीं होना चाहता हूँ अमर
देवता बन कर

विष पीना चाहता हूँ
चाहता हूँ तांडव
इस रौरव समय में

दोस्तों उठों!!
उठ के ही मृत्युंजय


(शैलेय की अन्य कवित)


ब्रज श्रीवास्तव की कविता

गंवा दिया मैंने यूँ ही

जब बाढ़ आयी नदियों में
मैंने बादल और पानी को दी
कारण बताओ की चिट्ठी

जब भूकम्प आया तो
मैंने डाँट दिया धरती को
जब झुलसे लोग गर्मी में
तो मैं झल्लाया सूरज पर

इनमें से किसी ने नहीं की कोई प्रतिक्रिया
करते रहे अपना काम बेखौफ सभी

मै ही वंचित रहा
प्रकृति के खेल देखने से

स्वप्न में मिली नियंता की नौकरी को
गंवा दिया मैंने यूं ही,

अक्षर पर्व से साभार

(ब्रज श्रीवास्तव की और कविताएँ)
 


के. एस. एस. कन्हैया


एक

घेरेंगी बहुत गहरी उदासियाँ

गर बुझी न रखीं अंगीठियाँ

क्योंकि मनोरम होती हैं बहुत

बिखरी हुई काठ की सभी हाँडियाँ .



दो

ये जरूरी बहुत है सुकून केलिए

कि रंगरेज

भूले से भी न ओढ़ें

काली कमलियाँ .


तीन

रंगीन, चटख, वासंती-से थे

गुजरा इन्द्रधनुषी बहुत जीवन उन संग

कि हाय, क्यों रोया उस दिन

जो नहा गये वे रंजित श्रृगाल.


चार

गिनता है कौन

उनकी भेदी हुई छातियाँ,

बनाते हैं अपने सर से


जो किसी वक्ष मध्य

गड्ढा

छोटा – सा.


पाँच

मरा,

कि फैल गया था

ज़हर

घाव में,

लिखा अंत्य-परीक्षक

डाक्टर नाग ने .


छ:

तिरोहित हो गया है मेरा दारुण एकांत,

रहती है मेरे साथ अब तो गूँज

तेरी वर्जना की,

कि

"अब रहना है मुझे एकाकी

तुम मिलो मत अब मुझसे".

सात

अहा कितनी अंतरंगता से कहा उसने

"आएँ, मिलें, करें कुछ बात फार्मल-सी,

जाने से पहले."

उफ़, कैसे बदल जाते हैं

छिन-भर में हरे पेड़

दामिनी से अंतरंगता के बाद.


(के. एस. एस. कन्हैया)


सरूप बेन  की कविता

 

क्या है वज़ह मेरे जीने की


नहीं


मै क़लमा पढकर सुरैया नहीं बनना चाहती

कि इस देश की तमाम सुरैया, फ़ातिमा, शहनाज़ या अमीना से

अलग नहीं मैं, असंबद्ध नहीं,जुदा नहीं

जब-जब इस देश के दुःशासनों के हाथों

सरेआम खींचा जाता है उनका दुपट्टा

मै निर्वस्त्र हो जाती हूं


जब-जब हिंस्त्र पशु छूते हैं उनकी देह

मसलते हैं, उधेडते हैं

चींथते हैं, रौदतें हैं, चूसते हैं

जबरन करते हैं प्रवेश

तार-तार कर लहूलुहान कर डालते हैं

तब-तब मैं भी घायल होती हूं

उन सैकडों हज़ारों सांप्रदायिक अष्त्रों से




जब-जब चीरकर सगर्भाओं के पेट

ये बाहर खींच लाते हैं मानवजाति का बीज

तब-तब मैं भी कट जाती हूं

उजड जाती हूं और नष्ट हो जाती हूं समूल


जब-जब गैस के सिलिण्डर

अन्नपूर्णा से नरभक्षी पशु बन जाते हैं

तब-तब मै भी जार-जार हो जाती हूं

भष्मीभूत, राख-झडती हुई राख

जब-जब अनाथ बच्चे कलपते हैं दूध के लिये

तब-तब मेरी छाती छलकती है इन सबके लिये


जब-जब ये लोग तलवार, कुल्हाडी या आरी से चीर डालते हैं

रहमान, सुलेमान,इरफ़ान,अमान या इमरान को

तब-तब सूना हो जाता है मेरा आंचल, बिस्तर ख़ाली

और मेंहदी भरे हाथों से रंग के साथ-साथ

उतर जाती है मेरी त्वचा भी



मेरे अहमदाबाद के

शाहपुर,दरियापुर,ज़ुहापुरा,ज़ार्डनरोड

बेहराम्पुरा और आलमपुरा से लेकर

बडोदा के हालोल, चांपानेर, पानवड, गोधरा तक

सुलग रही है पूरी पूर्वी पट्टी

फिर क्या वज़ह बचती है मेरे जीने की?



सब्र करो

तुम क्यों मरोगे कवि

तुम्हारा तो नहीं हुआ सर्वनाश

किसी सुरैया, सलमान या शाहपुर की तरह

तुम तो सरूप हो ना-- सरुपबेन योगेशभाई ध्रुव

सुख ही सुख हैं तुम्हें

इतनी बढिया सुविधा मिली है जीने और लिखने की

फिर इतना तो करो कम से कम

सुरैया, सलमान और शाहपुर के भविष्य की सुरक्षा के लिये

अब तो उठाओ हाथों में क़लम हथियार की तरह

कवि! कहो…हो तैयार!
 

अनुदित -अशोक कुमार पाण्डेय
 


किशोर कुमार जैन की कविता

कब तक ढूंढता रहूंगा


हां ये सच ही है
तलाश किसी की पूरी नहीं होती
फिर भी खोजता रहता है मन
बाजार में,पार्क में, राह चलते, सिनेमा हाल में
अखबार में,किताब में, शास्त्र में
और न जाने कंहा-कंहा

चांद की ओर ताकते हुए
सूरज की तपन में तपते हुए
बारिस की शीतल बौछार में
वैश्वायन की हवा में कहीं
अपने आप ही उङता चला आये
इसी आस में ताकता रहा आसमां को

आखिर कहीं तो अंत होगा
कहीं तो कुछ मिलेगा
शायद कोई फकीर ही बता दे
या फिर किसी भिखारी को ही पुछ लूं
उङता हुवा पक्षी भी तो कुछ जानता होगा

एक हसीना ने कहा मेरे सौंदर्य मे खोज लो
साधु मे कहा शायद मेरी तपस्या में मिल जाए
कवि ने कहा कविता मे भी तो हो सकता है
होने को तो किस्से-कहानियों में भी तो हो सकता है
लेकिन हैरानी-परेशानी पसीने की बूंद में झलकने लगी है

तलाश तो ताजिंदगी जारी रहेगी
किसी एक में या अनेक में........

( किशोर कुमार की अन्य गजलें)

 


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