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समीर
की गजलें लकीर से कुछ अलग होते हुए भी गजल की शख्सियत को नहीं तोड़ती
हैं।
फितरत
हर इक रुह का है, इस जहाँ में दर्जा
हर इक शय की है, फितरत इबादत उसकी
ढूँढे फिरे क्यों हर जगह उसे
वजूद से तेरे, है सल्तनत उसकी
देर तक, सोचता माहताब
चाँदनी में मेरी, है रौशनी किसकी
तू माने उसे, चाहे न माने
तुझी से है, हकीकत उसकी
इक चहरा
सायों के भँवर में बहुत जी चुका
खुदी को अब तलाशता हूँ मैं
जिन्दगी से कोई, जैसे खुदा तराशे
इक चहरा ऐसे तलाशता हूँ मैं
ख्वाबों में फिर मिला हूँ आज
शख्स जिसे खो चुका हूँ मैं
हस्ता हूँ बेबात भी
कि बहुत रो चुका हूँ मैं
सायों के भँवर में बहुत जी चुका
खुदी को अब तलाशता हूँ मैं।
गहराई
गहराई है कितनी इस घड़े में
अक्ल समझ नहीं पाती
झुलसाए जितना आग जिन्दगी की
उतनी ये बढ़ती जाती

सोचो तो क्या औकात मिट्टी की
समझो तो पहाड़ बन जाती
अनगिनत फासले जो तय करे तूने
फिर दिलों की दूरी क्यों मिट नहीं पाती
आ लग जा गले ऐ जिन्दगी
उसका चहरा बन तू
क्यों है मुझे सताती
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