कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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कृत्या2010 के अन्तिम दिवस की शाम, हम सब अजीब सी मनोस्थिति में है,

एक बेहद सशक्त काव्य पाठ की सुनहरी आभा के बीचोबीच में से गुजर चुके हैं,

मादक मोहात्मकता हमें बाँध रही है

यात्राएँ हमें अपने नीड़ की ओर ले चलने को तैयार हैं

अलग अलग भाषाएँ, अलग अलग अलग प्रान्त , देश के विभिन्न भोगोलिक कोण, लेकिन कृत्या ने हमें ऐसा जोड़ा कि मानो हम एक मुहल्ले के रहने वाले हैं.

इजराइल की दिति रोनेन इरान के बहजाद जरीनपुर के ऐन सामने बैठी बतिया रही हैं, मानों बचपन से बिछुड़े साथी हों, मैं कुछ देर तक उन्हे देखने के बाद सवाल उछालती हूँ, भाई और भी लोग हैं यहाँ इजराइल और इरान के अलावा,

नोर्वे के ब्रेयान मुस्कुरा कर जवाब देते हैं....जब तक पालिस्तान की समस्या का अन्त नहीं होता ये लोग यूँ बतियाते रहेंगे...

तिब्बती युवक तेनसिंग (Tenzin Tsundue), जो कि कार्यक्रम के आरंभ में एलान कर रहा था कि मैं भारतीय नहीं हूँ, तिब्बती हूँ.. कार्यक्रम के अन्त में मंच की बागडोर संभालता हुआ कहता है... मैं आप सबका हूँ, यहीं का हूँ... जाऊंगा कहाँ..
कृत्या2010 बृहद संगोष्ठी का विषय रहा, निष्कासन, पीड़ा और उससे मुक्ति। कृत्या सभी तरह के निष्कासन को रेखांकित कर रही थी। युद्धजनित, आत्मिक, स्वैच्छिक और आर्थिक...अर्जेटाइना की एलिसा पार्टनोई ‍- Alicia Partnoy, जिन्होनें निष्कासन के दर्द को व्यक्तिगत रूप में झेला था ने काव्य पाय का आरम्भ कि , यह कहते हुए-

उन्होने मेरे पाँवों के नीचे से
मेरे देश को खींच लिया
निष्कासन‍- यह नाम देकर
अचानक इस तरह
मेरे पैरों के नीचे की जमीन खींच ली
मेरे चारों ओर अब दूरियाँ ही दूरियाँ

लेकिन इसी निष्कासन ने उन्हें ताकत दी , जिससे वे अपने देश की लड़ाई लड़ सकें‍
फिर भी मैं उस दिन को याद करती हूँ
जब सेना ने मेरे देश को
सलाखों के पीछे ढकेल दिया था
लेकिन उस दिन मुझ में जबरदस्त ताकत आई
और डर चला गया

यही शुरुआत थी
इजराइल की दिति रोनेन एक चिड़िया से कहानी शुरु करती हैं और फोटे फ्रेम की तरह हमें क्रूरता के उस क्षण की ओर ले जाती है, जहाँ मानवीयता चिड़िया की तरह पंख फड़फड़ाती हुई जमीन पर तड़प रही है।
मंच पर दिति के आँसुओं के साथ श्रोताओं के मन भीग जाते है।
तेनसिंग (Tenzin Tsundueऔ की कविता धर्मशाला में बरसात साफ साफ जताती है कि कविता दुख को व्यक्त करने में ही विश्वास नहीं करती बल्कि लड़ने की ताकत देती -

हर शाम
मैं अपने किराए के कमरे मैं लौटता हूँ

पर मैं इस तरह मरना नहीं चाहता
कहीं न कहीं
कोई रास्ता होना चाहिए

मै अपने कमरे की तरह नहीं रो सकता
मैं बहुत रो चुका

जेल में
हताशा के छोटे छोटे क्षणों में

कहीं न कहीं
कोई रास्ता होना चाहिए

मैं रोना नहीं चाहता
मेरा कमरा काफी भीग चुका है.

कश्मीर के अग्निशेखर अपनी आवाज में धार देते हुए कहते हैं‍‍.....

कहती थीं मेरी माँ
सृष्टि के अनादिकाल में कभी
फिसल गिरी थीं चाँद से
और तब से नहीं टूटता
बूढ़े समुद्र में
उनका आजीवन कारावस

कविता सवाल छोड़ती है, जमीन से जुड़ाव आजीवन कारावस तो नहीं, कहीं इसीलिए तो कबीर बाबा कह बैठे......

रहना नही देश बिराना...

सिंगोनिया सिंगोने ने अपने लेख मे् कहती हैं.....

"आदमी जन्म से ही निर्वासन में जीता है। उसकी जिन्दगी का संचालन मौत के हाथों होता है। तभी तो वह जब तक इस दुनिया में रहता है , अपनी अस्मिता और अपने आप को तलाशता रहता है। यह क्रम शताब्दियों से चल रहा है। यही नहीं अपनी जड़ों को तलाशना आदमी की सबसे तीव्र मनोभावना बन रही है। उसके लिए यह अनुभूत करना ही संतोषदायक होता है कि उसकी जड़े इस धरती में हैं, यही नहीं उसके लिए खास जगह भी है, जो शनै शनै उसकी अपनी बनती जा रही है।

आदमी अधिकार चाहता है, यह उसका नैसर्गिक स्वभाव है। यही निश्चितता का प्रमुख स्रोत होता है। यह आत्मविश्वास की पहली सीढ़ी है। अस्मिता अपने आदमी होने की तलाश है, इसे अपनी जड़ों में, परम्परा में, नाम में और जातिनाम , जाति, जबान जगह के नाम से जोड़ने की कोशिश की जाती है। "
एनरिक मोया Enrique Moya की बात


"यदि वे बचते हैं तो, तो वे आवाजे, जिन्होंने कभी उनकी देह को
आशाएँ दी थी, उनकी शहादत की आत्माओं को,
वे रहते हैं अपने अनन्त विचारों के संसार को
बाद में चुपचाप बिखर हो जाते हैं सन्नाटे में
पूर्णता की एक कविता पाए बिना

अमरता के लिए जरूरी है कि
पैदा ही नहीं हुआ जाए।"

कोस्टा रिका के ओस्वालडो सौमा Osvaldo Sauma इस आत्मिकता को ऊँचाई देते है‍

आत्मसंतुष्टि के मार्ग को अपनाते हुए
मैं खुद को समझाता हूं
पर ये दिल
अब चाहता है
अपने पिंजरे से मुक्ति
अपने संत होने से नहीं बंधा रहेगा
जो आकांक्षाओं को अस्वीकार करेगा
यह मुक्ति चाहता है
और गलियों तक ले जाते हुए
खुद को खपाना उतावले कामों में
तमाम खतरों का जोखिम उठाता है
यह जानते हुए कि सच्चे यौद्धा की तो
पहले ही मौत हो चुकी है।

कृत्या विस्थापन के विभिन्न आयामों से गुजर चुकी है, विभिन्न बिन्दुओं को तलाश रही है, और एक अन्तिम सहमती की ओर रास्ता बना रही है।

इस सफर में कविता फिल्मों ने साथ दिया, साधो की उपस्थिति और ओदवे की भारतीय कवियों पर बनाई गई फिल्में कविता के इस सफर को दृष्टि देती रहीं। भारतीय कवियों की आवाज को ओदवे विश्व पटल पर ले कर घूमी।

पश्चातल में कलाकार इन कविताओं में रंग भरते रहे, जिसे कि प्रांजल आर्ट्स ग्वालियर से लेकर आया था।
कृत्या के सारथी डा श्यामला , डा जयश्री और अमित, विजेन्द्र, शलभा, कृपाल थके नहीं बल्कि अधिक उत्साहित लग रहे थे।

कविता ले जा रही है हमे अपने पंखो पर पर बैठा निष्काशन से दूर...

रति सक्सेना


 
     पत्र-संपादक के नाम                                                  
 


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