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सिंगोनिया सिंगोने
निर्वासन और अस्मिता

आदमी जन्म से ही निर्वासन में जीता है। उसकी जिन्दगी का संचालन मौत के हाथों होता है। तभी तो वह जब तक इस दुनिया में रहता है , अपनी अस्मिता और अपने आप को तलाशता रहता है। यह क्रम शताब्दियों से चल रहा है। यही नहीं अपनी जड़ों को तलाशना आदमी की सबसे तीव्र मनोभावना बन रही है। उसके लिए यह अनुभूत करना ही संतोषदायक होता है कि उसकी जड़े इस धरती में हैं, यही नहीं उसके लिए खास जगह भी है, जो शनै शनै उसकी अपनी बनती जा रही है।

आदमी अधिकार चाहता है, यह उसका नैसर्गिक स्वभाव है। यही निश्चितता का प्रमुख स्रोत होता है। यह आत्मविश्वास की पहली सीढ़ी है। अस्मिता अपने आदमी होने की तलाश है, इसे अपनी जड़ों में, परम्परा में, नाम में और जातिनाम , जाति, जबान जगह के नाम से जोड़ने की कोशिश की जाती है।

आदमी की कोई ना कोई परम्परा होती है। वह उसी में जड़ों को जमाने की कोशिश करता है। यह क्रिया पीड़ा के वक्त भी जारी रहती है। और एक दरख्त की तरह अपनी जड़ों के द्वारा ही जीवन रस पाने की कोशिश करता है, अपने स्वभाव को आकार देता है। क्न्फ्यूशियस ने कहा है कि आदमी का सवभाव हमेशा एक सा होता है, जो अलग होता है वे हैं उसकी आदतें। और ये आदते ही उसकी पहचान बनाती हैं।
यानी की मातृभूमि आदमी की आत्मिक एवं मानसिक भावभूमि होती है। यही भाव भूमि तीव्र से तीव्रतम होती जाती है। नोस्टालजिया,( जिसका ग्रीक भाषा में शाब्दिक अर्थ है - अपने देश की पीड़ा की ओर लौटना)अपने देश और जड़ों की ओर लौटने की तीव्र इच्छा का नाम है, अपने देश, जगहों, बचपन की यादों से जुड़ी चीजों को देखने की इच्छा का नाम है जो बेहद तीव्र पीड़ा का कारण बन कर मौत का सबब भी बन जाती है।

नोस्टेल्जिया मोह और प्यार का दस्तावेज है। लैटिन कवि Sextus का कहना है कि . जब एक दूसरे से मोहब्बत करने वाले बिछुड़ते हैं तो मोहब्बत उनके बन्धन को और मजबूत कर देती है। अतः नोस्टाल्जिया,याद और पीड़ा अभाव के कारण संभव है।

अस्मिता इस अभाव को प्यार के शीर्ष की तरह देखती है। अपने बृहद आयाम में मोहब्बत व्यक्तिगत, समाज के प्रति, या किसी विशेष वस्तु अथवा वस्तुओं के प्रति हो सकती है।

मोहब्बत युद्ध से कम नहीं , सरहदों को सरकाने वाली और आत्मघाती होता है।

मातृभूमि वही है जहाँ प्रेम हो

…in Florence and Naples,
in Lorenzo’s gaze,
in a nacatamal, and in gallo pinto,
in torrential rain and the smell of manure,
in the voices of the children in the Mercado Oriental,
in Creole swing,
in the Calle de la Amargura,
In Ballena bay,
In Memo Neyra’s song,
In the eyes of a calf…

दुनिया रूमाल की तरह छोटी होती जा रही है, और आदमी नई नई जगह घूम रहा है। वह नई भूमि में अपने को आसानी से खपा भी लेता है, उसकी अस्मिता विस्तार पाती जाती है, वह वैश्विक राजनीति का हिस्सा भी बनता जाता है। लेकिन तभी तक, जब तक वह इस सवाल से रूबरू नहीं होता कि " मैं कौन हूँ?" और उसे ज्यादा परेशान करता है जिसकी अस्मिता वैश्विक अस्मिता के कारण बनी है।


जो निर्वासन में रहता है उसके लिए प्यार या अस्मिता एक मिथक में बदल जाती है। वह अपने खालीपन को नई चीजों से भरने की कोशिश में लगा रहता है। लौटने का कोई रास्ता नहीं , क्यों कि यह जरूरी नहीं कि लौटने पर वही पुरानी खोई हुई अस्मिता फिर से मिल जाए।
निर्वास उसके लिए एक आकार तैयार करता है, वह उसमे अपने को तैयार कर सकता है। मोहब्बत मौत से ज्यादा मारक होती है।

प्यार उसे जीवन रस देता है, उसे अस्मिता देता है और उसका अपने धर्म की भावभुमि तैयार करता है। यही उसकी कलात्मकता का आधार होता है जो उसे ईश्वर से जोड़ती है, जहाँ निर्वासन की कोई भूमि नहीं।


अनुवाद

रति सक्सेना

 


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