मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 

कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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हिन्दी में एक बड़ा प्यारा सा शब्द हुआ करता था, भरा पूरा
अधिकतर इसका प्रयोग ऐसे परिवार के लिए किया जाता था, जिसमें अनेक सदस्य हो और किसी तरह की आर्थिक चिन्ता का भार ना हो। यह शब्द समृद्धता से काफी अलग था। क्यों समृद्धता में धन की स्थिति व्यक्तिगत प्रसन्नता पर भारी पड़ जाती है। अधिकतर हम भरे पूरे पन और समृद्धि के बीच अन्तर नहीं कर पाते हैं। भाषा ही नहीं व्यवहार की दृष्टि से भी।

मुझे याद है कि जब मैंने करीब पाँच वर्ष पहले कृत्या पत्रिका निकाली थी तब किसी पर्वत वासी पाठक ने फोन पर कहा था कि उसने यह पत्रिका अपने किसी आयकर अधिकारी मित्र को दिखाई तो उनकी प्रतिक्रिया थी कि - इस पत्रिका के संचालक पर छापा डालना चाहिए, लगता है कि काफी पैसे वाली पार्टी है। मैं इस प्रतिक्रिया का कुच ज्यादा मतलब नहीं समझ पाई थी, क्यों कि कम्प्यूटर जगत से परिचय रखने वाला हर कोई जानता है कि नेट पत्रिका प्रिन्ट पत्रिका के मुकाबले बेहद सस्ती होटी है।
रति सक्सेना

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विस्थापन की पीड़ा
आखों में लिए
उसने अपने शब्दों को
अपने ही में चित्र तलाशने की
कोशिश की.
फिर
मीठी सी मुस्कराहट
उसके चहरे के
विस्तार को नाप गयी...
विजेन्द्र विज
*
बर्फ पर बे खौफ
बहुत देर तक चलती रही
वो जानती थी
के क़दमों के निशान
उस को लौटने की दिशा देंगें
बरसते बर्फ के फूलों को
आँचल में समेट
जब वो पलटी
समय की सर्द हवा
सारे निशान मिटा चुकी थी
रचना श्रीवास्तव
*
रात
हमने तुम्हारे कदमो की आहट सुनी
तुम्हारी नीली परछाई काँपती रही
जब तक कि मैं सो नहीं गया

रात को तुम्हारी परछाई से जलन हुई
वह तुम्हारे डर की तरह नीली पड़ गई
उसी दिन,जिस दिन तुम गई थी

यदि तुम्हारी परछाई जल होती
मैं उसे घूँट- घूँट पी लेता
सुबह की चाय के प्याले के साथ
बेहद कमजोर
तुम्हारे बिना
ERAN TZELGOV
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मुझे बहुत पुरानी बात याद आ गई, करीब 10-12  बरस पहले की बात है। नामवर जी किसी कार्यक्रम में केरल आए थे। आमन्त्रण देने वाले विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के थे इसलिए नामवर जी कुछ अनजाना सा महसूस कर रहे थे। उन दिनों मैं हिन्दी प्रचार सभा में काम कर रही थी। मैंने केरल हिन्दी प्रचार के तत्कालीन सचिव वेलायुधन नायर जी को फोन करके नामवर जी के आगमन की सूचना दी। वे जानकार व्यक्ति थे, उन्होंने  तुरन्त नामवार को सभा में लाने के लिए कार भेज दी।

अब हिन्दी प्रचार सभा काम तो बस प्रचार करना है, साहित्य पढ़ना थोड़े ही है। जब नामवर जी सभा पहुँचे तो खलबली तो थी, क्यों कि वेलयुधन नायर जी उनके स्वागत में जुटे थे, पर हिन्दी के अधिकतर छात्रो को मालूम ही नहीं था कि नामवर जी है क्या। उन्का सिलेबस तो आधुनिक साहित्यकारों के मामले मे अज्ञेय तक रुक जाता है।
कवि का कवित्व या व्यक्तित्व
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कवि का पेशा
बरामदे में, छाते, बूट, और शीशा
शीशे में, खिड़की कुछ शान्त सी
खिड़की में, गली के पार अस्पताल का गेट, वहाँ
रोगियों की लम्बी कतार, जाने पहचाने चेहरे वाले रक्तदानी
अब तक पहले वाला अपनी आस्तीने चढ़ा चुका है,
जबकि भीतरी कमरे में पाँच घायल मर चुके हैं।
छिपा पाप
पाप और सन्तपना, हमारे अनुसार एक हैं एक रात में
दूसरे के बारे में न कहने की शपथ ली जाती है, पर कौन जानता है
तुम कभी भी भरोसा नहीं कर सकते कि वह कब तक चुप रहेगा
तुम चुप रहोगे, और हो सकता है कि तुम ही मूर्खता पूर्बक दूसरे की ओर
बढ़ जाओ, रेस्तारेन्ट के चमकते शीशो से बरसात की बून्दों को
नीचे गिरते देखते हुए, जब कि भीड़ में
कुर्सियों का गिरना और शीशे के गिलासों का गिरना साफ सुनाई दे
और वह गाल पर घाव का निशान लिए, लाल आँखों वाला
अपनी लम्बी मर्दानी बाह उठा, तुम पर तान ले।
यानीस रित्सोस
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मेरी सखियों श्याम का नाम मुझेकिसने बताया?
कानों में पड़ते ही इसने मेरा हृदय चीर दिया; मैं
अशांत हो उठी हूँ?

फिर भी नाम का माधुर्य अनन्त लगता है और
मेरी जिह्वा इसकी रट लगाए रहती है।
जैसे उसका उच्चारण करती हूँ अपने पर से निमन्त्रण खो
बैठती हूँ।

मैं उससे कैसे मिलूँ मेरी सखि?
जब उसके नाम से इतनी शक्ति है, मैं अचरज में पड़ जाती हूँ।
उसके साथ शरीर सम्बन्ध में क्या होगा?
उसे देखकर उसके पड़ोस की लड़किया कैसे रोक पाती अपने को?

मैं जितना भी यत्न करूं, उसे भूल नहीं पाती
दूर करने को स्मृति क्या करूँ?
द्विज चण्डीदास कहते हैं, स्त्रियाँ अपने पति को छोड़
चली जाती हैं उसके पास।
चण्डीदास
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VOL - V/ PART X

(मार्च -  2009
)

संपादक :  रति सक्सेना


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