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में एक बड़ा प्यारा सा शब्द हुआ करता था, भरा- पूरा।
अधिकतर इस शब्द
का प्रयोग ऐसे परिवार के लिए किया जाता था, और वे सब बिना
किसी तरह की चिन्ता के साथ साथ , हँसी खुशी रहते हों। यह शब्द
समृद्धता से काफी अलग था। क्यों समृद्धता में धन की स्थिति
व्यक्तिगत प्रसन्नता पर भारी पड़ जाती है। अधिकतर हम भरे- पूरे पन और
समृद्धि के बीच अन्तर नहीं कर पाते हैं। भाषा ही नहीं व्यवहार की
दृष्टि से भी।
मुझे याद है कि जब मैंने करीब पाँच वर्ष पहले कृत्या पत्रिका
निकाली थी तब किसी पर्वत वासी पाठक ने फोन पर कहा था कि उसने यह
पत्रिका अपने किसी आयकर अधिकारी मित्र को दिखाई तो उनकी
प्रतिक्रिया थी कि - इस पत्रिका के संचालक पर छापा डालना चाहिए,
लगता है कि काफी पैसे वाली पार्टी है। मैं इस प्रतिक्रिया का कुछ
ज्यादा मतलब नहीं समझ पाई थी, क्यों कि कम्प्यूटर जगत से परिचय
रखने वाला हर कोई जानता है कि नेट पत्रिका प्रिन्ट पत्रिका के
मुकाबले बेहद सस्ती होटी है। फिर मेरा अपना वेतन इतना कम है कि
उसमें ज्यादा खर्च करने की गुंजाइश ही नहीं। लेकिन अभी हाल के
कृत्या उत्सव में सभी का यही कहना था कि उत्सव बेहद भव्य हुआ है,
जबकि कृत्या टीम वाले जानते हैं कि रहने के लिए कमरे, सभा भवन और
सिनेमा प्रोजेक्टर भवन CIIL में लगातार उपयोग में आते रहते हैं।
इसलिए उनमें कुछ खास तो था नहीं।
इसके अलावा
तीन दिन के दोपहर के भोजन CIIL ने दे दिए थे। बाकी का चाय, पानी,
भोजन आदि का इंतजाम काफी सहज और सरल था। पंजाब में दूध से जले हम,
यहाँ मैसूर में फूंक- फूंक कर काम कर रहे थे। वैसे भी इस बाहर
साहित्य अकादमी ने कवियों के लिए टिकिट खरीद कर नहीं दिया था,
कृत्या को खर्च करने के बाद बिल देने को कहा गया था। बकाया बिलों
को वसूलना कितना कठिन है, कृत्या अच्छी तरह से जानती है। इसलिए
कोशिश कर के भी भव्य आयोजन तो नहीं हो पाया था। लेकिन ना जाने
क्यों सारे समारोह में एक अजीब सी
भव्यता दिखाई दे रही थी।
इस भव्यता का रहस्य मुझे कृत्या उत्सव के पश्चात पता चला, जब कि मै
किसी अन्य सेमीनार में भाग लेने फिर से मैसूर में CIIL में गई। इस
वक्त CIIL वीरान सा लग रहा था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या
हो गया। लेकिन धीरे- धीरे यह समझ में आने लगा कि कृत्या उत्सव की
भव्यता विभिन्न भाषाओं में बतियाते, चहकते कवियों , कलाकारों में
थी, रुके हुए झरने के करीब केनवासों में झरते रंगों में,
प्रोजेक्शन हाउस में दिखाई जाने वाली कविता फिल्मों में थी। सबसे
बड़ी भावना कवि - कलाकारों के दिलों में थी। आखिरी पलों में वीसा पाने
वाले इरान के बहजाद जरीनपूर की अबोली भाषा में वीसा से उलझती दिति
की चमकीली आँखों में, अपने देश के लिए लड़ने वाली एलिसिया की
मुस्कुराहट में जो गर्मी थी वह सामान्य से सामान्य स्थिति को बव्य
बनाने में समर्थ थी।
नोटों को गिनने वाला वह आयकर अधिकारी भी संभवतः कृत्या पत्रिका में
छपी सामग्री और चित्र संयोजना से उत्पन्न भरे-पूरे पन को समृद्धता
में अनुदित कर नोटों से तौल रहा था। संभवतः यही अनुभूति कृत्या
उत्सव में भाग लेने वाले कुछ कवि- कलाकार भी महसूस कर रहे थे।
उन्हें लग रहा था कि भारी बजट वाली संस्था होगी कृत्या, जबकि हम सब
कृत्या टीम के सदस्य सब अतिथियों के लिए अच्छे अच्छे कमरे छोड़ कर
कुटीर में टिके हुए थे। टैक्सी की जगह आटों और बसों में चक्कर लगा
रहे थे। समस्या हर जगह होती है, यहाँ भी थी। लेकिन बस कवियों की
कविताओं ने हमें जीवन दे दिया था, प्रयाग शुक्ल जी ने कहा थी कि
याद नहीं आता कि इससे पहले कब मैंने इतनी अच्छी कविताएँ सुनी।
कृत्या 2010 में जो चीज सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थी, वह कवि
कलाकारों का आपसी स्नेह और समझदारी। सब इस तरह से मिल रहे थे मानों
पहले से जानते पहचानते हों, उनमें उमड़ती मानवता, कलाकारों के
हाथों की कूंची और बेहद सुन्दर कविताएँ, सब ने मिल कर अजीब सा समाँ
बाँध रखा था। दिन भर कविताएँ सुनते, शाम को कविता फिल्मे देखते और
रंगों से सरोबार होते हुए भी हम सब थकते नहीं थे, आधी रात तक
सूखे
झरने के पास गाने बजाने का माद्दा सभी में था।
बस यही भरापूरापन बव्यता में परावर्तित हो रहा था, और यही कृत्या
की समृद्धि है।
समृद्धि के बारे में मैं इस वक्त इसलिए भी बात कर रही हूँ कि
कृत्या उत्सव के खाते को देखने वाले चार्टेड अकाउण्टेड ने मुझे
वार्निंग दी कि इस तरह मैं हर बार घाटे में जाकर, अपनी पूंजी लगा कर
कृत्या संस्था को जीवित नहीं रख सकतीं, कुछ उपाय खोजिए जिस से
संस्था अपने पैरों पर टिक जाए।

मैं सोच रही हूँ अगले कृत्या उत्सव में चार्टेड अकाउण्टेड को जरूर
ले जाऊँगी, जिससे वह समृद्धता के दूसरे अर्थ से भी वाकिफ हो जाए। (
हालाँकि पिछले तीन चार सालों का बजट देखते हुए मुझे भी घबराहट हो
रही है।)
मित्रों! कृत्या को चलते हुए पाँच साल बीत गए हैं। कई सहयात्री
मिले, कुछ पलों का साथ निभा कर अपनी अपनी राह निकल गए। पागलपन का
साथी कौन होता है?
लेकिन मुझे लगता है कि भई, यह दुनिया पागलपन के बिना रह भी सकती
है। बस ऐसे ही सहयात्रियों की कृत्या को जरूरत है जो हमारे पागलपन
में साथी बन जाए..
इसी आशा से
रति सक्सेना
इस अंक के रंगीन चित्र पंजाब के कविकलाकार स्वर्णजीत सावी ने और
श्वेत और श्याम चित्र भोपाल के कविकलाकार राधेलाल बिजधावने जी ने
बनाए हैं।
पत्र-संपादक
के नाम
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