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कवि का कवित्व या व्यक्तित्व?

बचपन में कई बार कवि के व्यक्तित्व पर रट्टा लगा कर निबन्ध याद किए और परीक्षा में लिखे, उसे रटे को कितना गुना, आज याद नहीं है। लेकिन आज मैं कवि और व्यक्तित्व पर कुछ बात करना चाहती हूँ। हालाँकि आज कल ऐसे सवाल परीक्षाओं में भी नहीं पूछे जाते हैं। दरअसल मेरे मन में इस विचार के बीज कृत्या के उत्सव से पहले ही पड़ गए थे। कृत्या के लिए एक- एक दाना और एक- एक पैसा जुगाड़ने में कितनी शक्ति का अपव्यय हो जाता है इसका अन्दाज शायद ही कोई लगा पाता है, यही कारण हर कोई कुछ ज्यादा की अपेक्षा करने लगता है। अब कवियों को आमन्त्रित करने की ही बात है तो हम हिन्दी भाषा के अनेक कवियों को आमन्त्रित ही नहीं कर पाते, सबसे कारण कई होते हैं, पहला तो यही कि हम भाषाई विवधता पर विश्वास करते हैं। दूसरी बात यह कि आर्थिक सहयोग की कमी हमें हमेशा रहती है। और तीसरी और महत्वपूर्ण बात यह है कि हम कविता के आस्वादन का ख्याल रख कर प्रत्येक कवि को कुछ वक्त देना चाहते है।

बात बेहद मामूली है. इस बार भी कृत्या के लिए आर्थिक सहयोंग ना के बराबर था। ICCR ने बस इतना दिया कि सुबह के नाश्ते और चाय- पानी का इंतजाम हो जाए। CILL तो रहने के लिए जगह और दुपहर का भोजन दे रही थी। साहित्य अकादमी से तो केवल पाँच कवियों के लिए सहयोग मिलता है। फिर भी भी सिविल सर्विस में काम करने वाले एक कवि मित्र ने कहा कि वे बात करके कर्णाटक सरकार से थोड़ा बहुत अनुदान दिलवा सकते हैं। मैं तो इसी आश्वासन से खुश हो बैठी, और सोचा कि कुछ युवा कवियों को आमन्त्रित करना चाहिए। ध्यान ये रखना है कि ये दक्षिण से काफी दूर बसे हों। मैंने जो फोन नम्बर सामने आया, उस पर फोन करके रेल गाड़ी के किराए का आश्वासन दे कर आमन्त्रित करना शुरु कर दिया। उस वक्त मैं पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाले एक कवि की काफी लम्बी कविताएँ बड़ी मेहनत से कृत्या पर टाइप कर रही थी, तो सबसे पहले उन्ही फोन लगा दिया। देश के ठेठ दक्षिण में एकान्त में रहने वाली मुझ मूर्खा को कहां मालूम था कि इस तरह मैं उनकी शान में गुस्ताखी कर रही थी। उन्होंने बड़े रोबीले शब्दों में लगभग फटकारते हुए कहा- नहीं हम नहीं आएँगे, आपने हमारा अपमान किया है,आपने पंजाब में होने वाले फेस्टीवल में हमें नहीं बुलाया।"

मैं सन्न थी, इसका मतलब यदि कृत्या मे हिन्दी के पाँच कवियों को आमन्त्रित किया जाता है तो बाकी पाँच हजार का अपमान हो जाता है। अब सभी को को सभी उत्सवों में, हमेशा आमन्त्रित नहीं किया जा सकता, चुनाव करते वक्त कई बातों का ख्याल रखा जाता है, जैसे कि हमारी झोली में कितना बोझ है, या फिर दूसरी भाषाओं के कितने कवि हैं आदि आदि। कोशिश यह रहती है कि उत्तर भारत के कार्यक्रम में दक्षिण के कवि ज्यादा हो, और दक्षिण भारत मे उत्सव हो तो उत्तर के ज्यादा हो। आमन्त्रण का न जाना किसी का अपमान नहीं, कार्यक्रम की मजबूरियाँ होती है।

इस घटना के बाद अचानक मुझे बहुत पुरानी बात याद आ गई, करीब 10-12  बरस पहले की बात है। नामवर जी किसी कार्यक्रम में केरल आए थे। आमन्त्रण देने वाले विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के थे इसलिए नामवर जी कुछ अनजाना सा महसूस कर रहे थे। उन दिनों मैं हिन्दी प्रचार सभा में काम कर रही थी। मैंने केरल हिन्दी प्रचार के तत्कालीन सचिव वेलायुधन नायर जी को फोन करके नामवर जी के आगमन की सूचना दी। वे जानकार व्यक्ति थे, उन्होंने  तुरन्त नामवार को सभा में लाने के लिए कार भेज दी।

अब हिन्दी प्रचार सभा काम तो बस प्रचार करना है, साहित्य पढ़ना थोड़े ही है। जब नामवर जी सभा पहुँचे तो खलबली तो थी, क्यों कि वेलयुधन नायर जी उनके स्वागत में जुटे थे, पर हिन्दी के अधिकतर छात्रो को मालूम ही नहीं था कि नामवर जी है क्या। उनका सिलेबस तो आधुनिक साहित्यकारों के मामले मे अज्ञेय तक रुक जाता है।
मैने देखा कि सभा के तत्कालीन अध्यक्ष (वर्तमान सचिव) छात्रों को मलयालम में समझा रहे थे.--.बहुत बड़े आदमी हैं, कहानी पढ़ी नहीं क्या तुम लोगों ने उनकी लिखीं?

नामवर जी और कहानी, मैंने चैन की साँस ली कि अच्छा है नामवर जी मलयालम नहीं जानते।

तभी एक अध्यापिका जिसने कि अपनी पढ़ाई आगरा में की थी, मुझ से मलयालम में पूछने लगी-कौन है ये नामवर, कोई कवि हैं क्या?

मैं अपनी हँसी दबाती हुई वहाँ से खिसक ली... भाषा नहीं जानने वालों को कितनी सुविधा होती है!!

प्रचार सभा को मीडिया में छपने की बहुत आदत थी, आनन फानन में संवाददाता भी आ गया, लेकिन वह बस फोटो लेकर चला गया। उसने ज्यादा कुछ पूछताछ नहीं की। मैं जानती थी कल के अखबार में नामवर जी फोटो के साथ सभा की गतिविधियों की सूचना आ जाएगी।

नामवर जी अपने व्यक्तित्व के प्रति आश्वस्त थे। जो कुछ उनकी अपरिचित भाषा में घट रहा था, उसे समझ तो नहीं पा रहे होंगे। फिर वेलायुधन नायर जी काफी आतिथ्य सत्कार भी किया करते थे।
तुरन्त फुरन्त एक नामवर जी के लिए सम्मान में एक सभा का आयोजन भी हो गया। और उनका साथ देने के लिए पड़ोस में रहने वाले केरल के बेहद लोकप्रिय कवि ओ एन वी कुरुप्पु जी को अध्यक्षता के लिए आमन्त्रित कर लिए गया था। कुरुप्प जी का दर्जा केरल में किसी मन्त्री से कम नहीं है, फिल्म से लेकर साहित्य तक उनकी छाप है। अतः उनके आते ही सभा के कर्मचारी सजग हो गए और खातिरदारी में जुट गए। यह खातिरदारी नामवर जी मुकाबले कुछ ज्यादा ही थी। कुरुप्प जी की आदत है कि वे चाहे प्रमुख अतिथि हों, या अध्यक्ष, सबसे पहले बोलते हैं और सभा से चले जाते हैं। वे नामवर जी से कामरेड वाले नाते के साथ उनके दिल्ली में रुतबे को भी जानते थे। इसलिए नामवर जी को पहले भाषण के लिए आमन्त्रित कर लिया।
नामवर जी ने बोलना शुरु किया तो धारा- प्रवाह बोलते गए, कम से कम हम चार छः श्रोता तो सजग थे ही। अब सभा के सचिव मेरे पास चिट भेजने लगे कि कुरुप्पु जी को कहीं और जाना है, नामवर जी से अपना भाषण छोटा करने को इशारा करे।

नामवर जी अनुवाद के बारे में बेहद बारीक बाते बता रहे थे, एक तो बेहद उत्तम भाषण, दूसरा नामवर जी का व्यक्तित्व , मैं किसी भी तरह नामवर जी को व्यवधान देने की स्थिति में नहीं थी।

सभा वालो का सारा ध्यान कुरुप्पु जी पर था, क्योंकि उन्हे कहीं और जाना था।

कुरुप्पु जी का व्यक्तित्व नामवर जी के ज्ञान वर्धन भाषण पर भारी पड़ रहा था। यह स्थान का दोष था, दिल्ली में कुरुप्पु जी को इस तरह की जल्दी नहीं हो सकती थी।
मैं यही सोच रही थी कि गलती किसी की नहीं, परिचय उसी से होता है जो समीप रहता है, या फिर अपनी भाषा में बोलता है। दूर से तो सूरज भी छोटा लगता है।

अब इतने दिनों बाद मैं यही सोच रही हूँ कि बड़ा कौन है, कवि-कलाकार? या उसका अहम?

लेकिन यही अहम जरा से स्थान परिवर्तन से ही छोटा पड़ जाता है तो उसे बड़ा कैसे कहा जा सकता है?

तो फिर क्यों नहीं हम अपने कर्म को बड़ा मान सकते हैं?

मैं उन महान कवि से यह पूछना चाह रही थी कि कृत्या ने आपकी कविताओं को इतनी बार छापा है तो एक तरह से आपके कवित्व का सम्मान ही किया है, फिर आप अपने कर्म से बड़े क्यों बन रहे हैं?

लेकिन मैं चाहती हूँ कि मेरी बात नक्कार खाने मे तूती की तरह अनसुनी रह जाएगी

मैं इतनी समझदार हो गई हूँ कि अब मुझे कवि और व्यक्तित्व पर लेख रटने की जरूरत नहीं..

रति सक्सेना
 
 


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