विजेन्द्र विज की कविता
उसने
निर्वासन झेला
विस्थापन की पीड़ा
आखों में लिए
उसने अपने शब्दों को
अपने ही में चित्र तलाशने की
कोशिश की.
एक
मीठी सी मुस्कराहट
उसके चहरे के
विस्तार को नाप गयी...

-(अलीसिया पारटोनी की कविता पर
पेंटिंग बनाने के बाद लिखी...)
(
विजेन्द्र विज की अन्य कविताएँ )
रचना श्रीवास्तव की कविता
उसका भ्रम
बर्फ पर बे खौफ
बहुत देर तक चलती रही
वो जानती थी
के क़दमों के निशान
उस को लौटने की दिशा देंगें
बरसते बर्फ के फूलों को
आँचल में समेट
जब वो पलटी
समय की सर्द हवा
सारे निशान मिटा चुकी थी
(रचना
श्रीवास्तव की कविता)
रोजर ह्यूम्स (Roger Humes) की कविता
टूटी मोमबत्तियाँ
सुबह की मेज के चौखानेवाले मेज पोश पर
टूटी हुई मोमबत्तियों के निशान जैसे कि तैसे बचे हैं
पिघले मोम के बीच, अकेली बत्ती
लौ से आखिरी सम्वाद
तुम्हारी परछाई को दर्शाता , तुम्हारे लुप्त होने से पहले
यह गहन अकेलेपन दरवाजा ही तुम्हारे लौटने मार्ग
जहाँ से जिन्दगी विदा हो गई है
जिसे तुम अपना कह सकती हो
मन्दिम संगीत मंडरा रहा है
वहीं जहाँ तुम खड़ी हुई थीं, मेरे शब्द बिखर रहे हैं
मरुस्थल में इन्द्रधनुष पड़ा सूख रहा हो ज्यों
जब तुम अपने आप ही चल दी, शायद
निगाह तुम्हारे कंधों पर मंडराई होगी
मैं यूँ ही जड़वत खड़ा देखता रहा,
अपलक उस दूर के साथी को, लगातार
उस समुद्री यात्री को, लगातार उसको
जो वहीं बसना चाहता है, जहाँ तुम्हारे
दिल का नक्शा ले जाता हो।
मेरे हाथ काँपते हुए दराज तक पहुँचते हैं
मेज के लिए दूसरा बिछौना निकालने को
शायद दूरदराज किसी शाम के आनन्द के इंतजार में
जहाँ आन्नद के झुरमुटे में महसूस करूँगा मैं तुम्हें
सन्नाटे के गहराने के साथ मैं तुम्हारी उपस्थति
महसूस करता हूँ इस दहलीज पर, मेरी बाँहे मेजपोश
पर पड़ी हैं, दुआ के शब्दों का हिसाब लगाते हुए,
तुम्हारे शब्द थके पलों के नीचे, यह जतलाते हुए
तुम्हारा आखिरी ठिकाना मैं ही हूँ, जहाँ से
जिन्दगी विदा ले रही है।
( रोजर
ह्यूम्स की अन्य कविताएँ )
हिब्रू
कविताएँ (HEBREW POEMS )
इरन तेलगव की कविताएँ ( ERAN TZELGOV)
*
रात
हमने तुम्हारे कदमो की आहट सुनी
तुम्हारी नीली परछाई काँपती रही
जब तक कि मैं सो नहीं गया
रात को तुम्हारी परछाई से जलन हुई
वह तुम्हारे डर की तरह नीली पड़ गई
उसी दिन,जिस दिन तुम गई थी
यदि तुम्हारी परछाई जल होती
मैं उसे घूँट- घूँट पी लेता
सुबह की चाय के प्याले के साथ
बेहद कमजोर
तुम्हारे बिना
(एरेन
जेल्गोव की अन्य कविताएँ)
रति सक्सेना की विस्थापन पर कुछ कविताएँ
पूर्वजन्म
मैंने अपने एक जीन्स को
प्रयोग शाला की मेज पर रखा, और
खोजने लगी पूर्व जन्म की कहानी
मेज पर रखा जीन्स फड़फड़ाया पर उड़ा नहीं
यह तो मैं समझती हूँ कि
मैं तितली कदापि नहीं थी
ना ही चिड़िया
मेरे पंखों में कभी जुम्बिश ही नहीं थी
जीन्स आँखे खौले पड़ा रहा
रेंगा तक नहीं, केंचुए के गुण को उसने कभी जीया नही
अब चींटी और मधुमक्खी की बात छोड़ दें
इतना कतार अनुशासन मुझमें कभी नहीं रहा
मैंने अपने को मेज से जोड़ा, कुर्सी भी
फिर जाकर समझा कि
मैं खिड़की थी,
खुली
तो जमाने की निगाहे मेरे भीतर
बन्द
तो भी जमाने भर की कहानियाँ
मैंने अपने जीन्स को
दरवाजे सा जमीन पर उतार दिया
और मैं खुद
उसके बाहर निकल गई
( रति
सक्सेना की अन्य कविताएँ)