मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 

कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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मैं, अपने कमरे के खिड़की दरवाजे बन्द कर
सूरज को पर्दों से ढंकती हुई
अपने आप से सवाल पूछती हूँ

कितना प्यार है तुम्हे अपने देश से?

इस वक्त हवा
एयर कण्डीशन से छनती हुई
एक नकली ठण्डक पैदा कर रही है
मेरे घर की दहलीज पर लगे आम के पेड़ पर
एक अमर बेल ने इस तरह कब्जा कर लिया कि
वह चार टुकड़ों में कट गया
एन बगल की घाटी पर
खाड़ी के देश से खनखनाते सिक्के आकर
सीमेन्ट के दरख्त बन शान से खड़े हैं

मैं अपने देश के उस हिस्से में रहती हूँ
जहाँ मेरी भाषा मुझे लोगो से जुदा कर देती है
मेरा बचपन मेरे पन्नो में कैद हो गया है
मेरी भूख कई रंगो में बदल गई है

फिर भी सोचती हूँ कि मैं प्यार करती हूँ
अपने देश से, ...

रति सक्सेना

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किस ख्वाब को
बीज बना कर
मिट्टी में बो दूँ
कि वो छावोंदार वृक्ष बन जाएँ

पूरी कि पूरी वर्णमाला के
किस शब्द को चुनूँ
कि वो बन जाए एक कविता
परमिन्दजीत
*
इन दानों को खाऊँ या मैं बोऊँ
या फिर अपनी ही किस्मत को रोऊँ
रहम नहीं की बारिश ने अबके भी
किसके आगे अपने दीदे खोऊँ
विजयशंकर चतुर्वेदी
*
अधखुली पांखुरियों को
हलके से देना चाहता हूँ स्पर्श !
उगना चाहता हूँ तुम में
सौंपना चाहता हूँ तुम्हें
मीठेस निर्मोही

*
ताप दुःसह ऊपर से प्रवहमान
और
बगूले बगल के
उड़ाते गुबार नीचे उठ रहा
निकलता रहा हूँ हर शाम
दर्दीली आँखें लिये
दफ़्तर से मैं .
पाता रहा सुकून
अखबार देखने भर को -
के. एस. एस. कन्हैया

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कविता के क्षेत्र मे आजकल बिल्कुल ऐसा ही रहा है?ऐसा नहीं कि इस अकविता समय में कविता का अकाल हो गया है, दरअसल , आज कविता जरुरत से ज्यादा ही लिखी जा रही है और धड़ाधड़ लिखी जा रही है, हो सकता है कि आज कविता ज्यादा छपी जा रही है। फिर भी जिस तेजी से कविता अपनी दिशा खो रही है, साहित्य के जानकारों के लिए चिन्ता का विषय जरूर है। सबसे ज्यादा परेशानी हिन्दी कविता को लेकर आ रही है, कारण हिन्दी का क्षेत्रा काफी व्यापक है, और असंख्य गुटों में बँटा है। जब कोई प्रतिभावान किसी एक गुट में प्रवेश कर लेता है तो कुछ वक्त के लिए वह उस गुट में बन्ध कर रह जाता है। बस यहीं से उसका रचनात्मक संसार एक कोष्ठक में बन्द होने लगता है।
वह ना तो अपने समय के साथ चलता है, ना ही आगे। बस आत्ममुग्धता में बन्द होकर अपनी प्रतिध्वनियों को सुनते रह जाते हैं।
कुछ नई प्रतिभाएँ वक्त के साथ समझौता नहीं कर पा रहीं हैं, वे शार्ट खोजती हुई अवार्डों की राजनीति से उलझ रही हैं।
कविता का मुद्दा?
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लकड़ी की टाल पर
बर्फ के मुलायम कतरे

स्वर्ण ठहराव
*
बिना किसी साथ के

नदी का पानी
खम्भे की रोशनी में
*
यह रहा
तुम्हारा घर

एक खुला
तूफानी दिन
*
सफेद झक्क मैदान

अन्तरहित
आरम्भ
*
जनवरी की काली रात

रोशनी का विशाल काँच का घर
तैर रहा है
बर्फीली सुबह की और
*
तुम्हारी आँखो ने
सीधे उनके भीतर देखा
तुमने सोचा

सब खत्म

और छूट गया

*

क्या होता है, जब वसन्त आता है?
कोई खिलखिला उठता है

हरी हँसी
Helge Torvund
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सूर्य चन्द्र की बहन का हरण

कहों माँ सच- सच, प्यारी हंसुली कहाँ गई
साग चुनती होगी, यहीं कहीं
बहुत पुकारा, खोजा साग‍- वालियों में
प्यारी हंसुली न मिली कहीं
कहों माँ सच- सच, प्यारी हंसुली कहाँ गई
पनिहार को गई होगी , यहीं कहीं
बहुत पुकारा,पनिहारिनो में ढूँढ़ा
प्यारी हंसुली न मिली कहीं
कहों माँ सच- सच, प्यारी हंसुली कहाँ गई
गाय चराने को गई होगी यहीं कहीं
बहुत पुकारा, ग्वालिनों में ढूँढा
प्यारी हंसुली न मिली कहीं
कहों माँ सच- सच, प्यारी हंसुली कहाँ गई
बकरी चराने गई होगी , यहीं कहीं
बहुत पुकारा,बकरी चराने वालियों में ढूँढ़ा
प्यारी हंसुली न मिली कहीं
कहों माँ सच- सच, प्यारी हंसुली कहाँ गई
राण्ड हो माँ तुम, सब बताती क्यों नहीं
बकरी चराने गई थी हँसुली यहीं कहीं
हर कर ले गया दुष्ट राहू वहीं से
लाहुली लोक गीत,अनुवादक और प्रस्तुत कर्ताः--सतीश कुमार लोप्पा

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VOL - V/ PART XI

(मई-  2010
)

संपादक :  रति सक्सेना


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