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उदय प्रकाश की एक लम्बी कविता


अरुंधति

(एक)

जेठ की रात में
छप्पर के टूटे खपड़ैलों से दिखता था आकाश
अपनी खाट पर डेढ़ साल से सोई मां की मुरझाई सफेद-जर्द उंगली उठी थी
एक सबसे धुंधले, टिमटिमाते, मद्धिम लाल तारे की ओर

‘वह देखो अरुंधति !’

मां की श्वासनली में कैंसर था और वह मर गई थी इसके बाद

उसकी उंगली उठी रह गई थी आकाश की ओर

कल रात मैंने
फिर देखा अरुंधति को
वैशाली के अपने फ्लैट की छत से

पूरब का अकेला लाल तारा
अपनी असहायता की आभा में
हमारी उम्मीद की तरह कभी-कभी बुझता
और फिर जलता हरबार

साठ की उम्र में भी
मैं मां की उंगलियां भूल नहीं पाता ।


(उदय प्रकाश की कविता के बाकी अंश)


ओम पुरोहित ‘कागद’ की राजस्‍थानी से हिन्‍दी में अनुवादित कविताएं

थार में प्‍यास


जब लोग गा रहे थे
पानी के गीत
हम सपनों में देखते थे
प्यास भर पानी।
समुद्र था भी
रेत का इतराया
पानी देखता था
चेहरों का
या फिर
चेहरों के पीछे छुपे
पौरूष का ही
मायने था पानी।

तलवारें
बताती रहीं पानी
राजसिंहासन
पानीदार के हाथ ही
रहता रहा तब तक।

अब जब जाना
पानी वह नहीं था
दम्भ था निरा
बंट चुका था
दुनिया भर का पानी
नहीं बंटी
हमारी अपनी थी
आज भी थिर है
थार में प्यास।

(ओम पुरोहित की अन्य कविताएं) ) ))


प्रियंकर पालीवाल की प्रेम कविताएँ


तुम मेरे मन का कुतुबनुमा हो


भले किसी और की हो जाएं

ये गहरी काली आंखें

वे सितारे मेरी स्मृति के अलाव में

रह-रह कर चमकते रहेंगे जो

उस छोटी-सी मुलाकात में

चमके थे तुम्हारी आंखों में



भटकाव के बीहड़ वन में

वे ही होंगे पथ-संकेतक

गहन अंधियारे में

दिशासूचक ध्रुवतारा

तुम मेरे मन का कुतुबनुमा हो

अभौतिक अक्षांसों के

अलौकिक फेरे

संभव नहीं हैं तुम्हारे बिना


जीवन लालसा के तट पर

हांफ़ते रहने का नाम नहीं

किंतु अब निर्वाण भी

प्राथमिकता में नहीं है


मोक्ष के बदले

रहना चाहता हूं

तुम्हारी स्मृति के अक्षय वट में

पर्णहरित की तरह


स्नेह की वह सुनहरी लौ

नहीं चाहता – नहीं चाहता

वह बेहिसाब उजाला

अब तुम्हें पाने की

कोई आकांक्षा शेष नहीं


जगत-जीवन के

कार्य-व्यापार में

प्रेम का तुलनपत्र

अब कौन देखे !


अपने अधूरे प्रेम के

जलयान में शांत मन

चला जाना चाहता हूं

विश्वास के उस अपूर्व द्वीप की ओर

जहां मेरी और तुम्हारी कामनाओं
के जीवाश्म विश्राम कर रहे हैं ।

 

(प्रियंकर पालीवाल की अन्य कविताएँ)


अशोक गुप्ता की कविता की कविता


कवि का बायोडाटा


दरबार में
सभासदों के बीच,
सिर्फ असमंजस ही नहीं
बड़ा असमंजस है.


कवि की जन्म तिथि ? कठिन सवाल है..
जब निरंतर ही
मारे जा रहे हों क्रौंच
तब कैसे कहा जा सकता है
किस दिन
किस पल
कौन सा क्रौंच शुक्राणु बन कर
रोप गया कवि
किसी व्यक्ति के भीतर..


कवि की शिक्षा ?
सरल तो नहीं है इस प्रश्न का उत्तर भी
कवि,
सीखता है बादल से,
भौरें से, भूख से, और तलवार से भी
कवि,

अकस्मात् चुप हो कर खुद से भी सीखता है
ऐसे में
जंगल से लगातार नंगे पाँव गुज़रते हुए

कौन सा काँटा चुभ कर
क्या पाठ पढ़ा गया
यह बताना असंभव है
भले ही
कोई मान ले कवि को अशिक्षित.


कवि की कविताएं
उसकी योग्यता की सनद नहीं होतीं
नहीं होती
कविता रचे कागज़ पर किसी संस्थान की मोहर
कवि
किसी भी सूरत
मोहरें बटोरता भी नहीं
भले ही दरबार
केवल
मोहरों की कालिख को मान्यता देता हो.


कवि,
दो टूक शब्दों में
फक्कड़ मलंग कवि,
एकदम रिक्त होता है बायोडाटा जैसी शिनाख्त से
भले ही
बायोडाटा के बगैर
वह कहीं भी प्रतिबंधित हो.


दरअसल
प्रतिबन्ध ही
कवि का बायोडाटा होते हैं.


(अशोक गुप्ता की अन्य कविताएँ)


फ़रीद ख़ान की कविता


नानी का बाघ


नानी के साथ ही दफ़्न हो गए,

खेत, मेंड़, पगडंडी।

सत्तू, लिट्टी, चोखा।

हिन्दी, उर्दू, ज़र्दा, बिरयानी।

एक बड़े से घर में चार- चार पीढ़ियों का रहना।

अक्सर रात की बत्ती गुल होने पर नानी बताती थीं,

कि पटना में कई बार देखा गया है बाघ।

सफ़ेद बाघ।

ख़ामोशी से गुज़र जाता हुआ बाघ।



जब जब कोई चटा गया है अफ़ीम और थमा गया है लाठी, भाले, बरछे,

लोगों ने देखा है अशोक राजपथ पर एक बाघ।

उसके बाद जग जाते थे लोग।


मुसलमान कहते हैं कि हज़रत अली ने भेजा था बाघ।

हिन्दू कहते हैं कि भारत माता ने हमारी रक्षा की है।

इसीलिए तो,

नानी बताती थीं कि सैतालीस में भी कुछ नहीं हुआ पटना में।

क्यों कि हर बार भाले बरछे के बीच में आ जाता था बाघ।


अब लोग तर्क करने लगे हैं।

कॉल सेंटर वाली पिंकी हँसती है इस बात पर,

कि बाघ वाघ वहम है।

क्रेडिट कार्ड का एजेंट केवल मुस्कुरा भर देता है।

वह ऐसे सुनता है जैसे सुन ही नहीं रहा है।

वह पूछता है,

कि अगर बाघ को देखा है आप लोगों ने यूँ खुले में घूमते हुए

तो मारा क्यों नहीं ? या पकड़ कर चिड़िया घर में दे देते।


अब तो नानी भी नहीं रहीं और हम भी पटना छोड़ आये हैं।


उस वक़्त क्या होगा जब वह आख़िरी आदमी भी चला जायेगा पटना से

जो यह मानता है कि मौके बे मौके निकल आता है बाघ।

(फ़रीद ख़ान की अन्य कविताएँ)
 


सुभाष राय की कविता

बुलावा

आओ, चले आओ
खिड़कियों से उतरती
सुबह की किरन की तरह
मेरी हथेलियों पर
पसर जाओ
उतर जाओ मेरे भीतर
भर जाओ रोम-रोम में

रूप, गंध, स्पर्श, रस
में हो तुम ही तुम
आओ बिना
कोई सवाल किये
किताब के पन्नों की तरह
खुल जाओ
अक्षर-अक्षर
उतर जाओ
मेरी आँखों में

मैं आ रहा हूं
आओ तुम भी
जल में जल की तरह
पसर जायें
हम-तुम
सागरवत....
अंतहीन....
एकाकार.....

( सुभाष राय की अन्य कविताएँ )

 


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