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सुभाष
राय जन्म जनवरी 1957 में मऊ नाथ भंजन के बड़ागांव में। शिक्षा काशी,
प्रयाग और आगरा में। के. एम. आई. से
हिंदी साहित्य और भाषा में स्रातकोत्तर की
उपाधि। उत्तर भारत के प्रख्यात संत कवि दादू दयाल की कविताओं के
मर्म पर शोध के लिए आगरा विश्वविद्यालय
से डाक्टोरेट की उपाधि। कविता, कहानी,
व्यंग्य और आलोचना में निरंतर सक्रियता। वर्तमान साहित्य, अभिनव
कदम, अभिनव प्रसंगवश, लोकगंगा, आजकल,
मधुमती, समन्वय, वसुधा, शोध-दिशा में
रचनाओं का प्रकाशन। ई-पत्रिका अनुभूति, सृजनगाथा में कविताएं।
अंजोरिया वेब पर भोजपुरी में रचनाएं।
नाटक
माना कि मिट्टी में प्राण है
सूरज रोज धूप
उलीच जाता है खेत में
हवा इतनी है कि अंकुर
फूट सकते हैं
माना कि
मिट्टी, धूप और हवा
तना, पत्ती और फूल में
तबदील हो सकते हैं
माना कि मौसम
अचानक खराब न हो तो
फसलों में दाने
आ सकते हैं
एक दाना हजार
दाने में बदल सकता है
माना कि
कुछ भी हो सकता है
अगर मिट्टी में डाला गया
बीज ठीक-ठाक हो
लेकिन अक्सर
ऐसा क्यों नहीं होता
जब फसलें खड़ी होती हैं
हम खुश होते हैं
कटती हैं तो
हम निराश हो जाते हैं
आदमी की भूख
बढ़ जाती है
हर फसल के बाद
हम कभी मौसम को दोषी
ठहराकर चुप हो जाते हैं
कभी खेत बांट लेते हैं
यही नाटक हर बार होता है
आदमी केवल दर्शक है, श्रोता है
अकाल के बादल
नहीं कुछ मत कहना
इन मेघों से
तुम्हारा मजाक उड़ायेंगे ये
तुम्हारी पीड़ा मैं जानता हूं
लगातार एक आदमी
की उम्र तक
अकाल में दबे
तुम्हारे जिस्म का
दर्द मैं जानता हूं
मुंह मत खोलना इन मेघों से
मैं देख रहा हूं
तुम्हारे जिस्म पर
बंजर जमीन की दरारें
बारिश का इंतजार करती हुईं
लेकिन ये बादल
बहुत गरज रहे हैं
कुछ मत मांगना इनसे

जरा झांककर देखो तो
बादलों के उस पार
सुनहरी धार वाले खंजरों को
बारूदी घड़ियों को
सुनो, गौर से सुनो
पहचानो ये चीखें
आयतों और श्लोकों की
धार से घायल लोगों की
मत मांगो इनसे कुछ
दूत नहीं बन सकते
ये मेघ अकाल के |