मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 
 

कुछ लोगों को आज की कविता समझ में नहीं आती। यह सचमुच अजीब है। जैसे कि मजबूर किया गया हो कि आपको यह समझना ही होगा। वैसे भी कविता समझने की नहीं , अनुभव करने की चीज है। कविगण अपनी कविताओं के पक्ष में लम्बे चौड़े वक्तव्य देते हैं।....वैचारिक और सामाजिक रूप में हम इस दौर में कितने भी जटिल हो गए हों, बाजार, सत्ता , समाज ‌और वैश्विक उलझनों की गर्दन तोड़ बोझ के तले जी रहे हों। हमारी मानसिकता में मूलभूत बदलाव आ गया हो, बेशक लेकिन संवेदनाएँ नहीँ बदलीं हैं। वे बदल भी नहीं सकतीं।
अजेय
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पानी को नहीं छूना
इन पर अंकित चक्रवातों की नीन्द
बैचेनियों के घौंसले

इन में
तुम्हारी रूह की हुंकारी नहीं
गूँगी है इनकी पारदर्शिता
पानी को नहीं छूना !!

परमिन्दर
तुमने एक पपीता दिया था
आज दो दिन बाद
मैं उसे काटूँगा खाऊँगा
और निकलकर तुम्हारे पड़ोस से
चला जाऊँगा जंगल में
जहाँ से कभी वापिस नहीं लौटे बुद्ध

मिठाई लाल
आओ लिखते है ईश्वर के
नाम खत और उसे लेटर बाक्स
में डाल कर भूल जाते हैं
स्वप्निल श्रीवास्तव
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 वादों और नारों के उथले पड़ जाने से कविता को इतना वक्त मिला है कि वह उन विषयों के बारे मे सोचे जो फुर्सत की अपेक्षा रखती हैं। जाने कितने वक्त से मुझे लगभग हर पत्रिका में लड़की से सम्बन्धित कविताएँ मिल रही हैं कि लगता है कि कुछ दिनो में छात्र शोध का विषय इस तरह लेने लगेंगे‍‍‍‍‍‍..... समकालीन कविता में भारतीय लड़की, या फिर लड़की और कविता आदि। लगभग अधिकतर कविताओं में लड़की की तकलीफो को बयान किया जाता है और अन्ततः उसमे फूल, बादल आदि सभी रोमान्टिक प्रतीकों को सम्मिलित कर लिया जाता है।

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कवि का पेशा

बारमदे में, छाते, बूट, और शीशा
शीशे में, खिड़की कुछ शान्त सी
खिड़की में, गली के पार अस्पताल का गेट, वहाँ
रोगियों की लम्बी कतार, जाने पहचाने चेहरे वाले रक्तदानी
अब तक पहले वाला अपनी आस्तीने चढ़ा चुका है,
जबकि भीतरी कमरे में पाँच घायल मर चुके हैं।
***
गुलाब ट्रंक पर
तुम्हारा हाथ बेल्ट पर
और क्या पूछना चाहते हो तुम
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यानीस रित्सोस
 

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***
उस वृक्ष का क्या
जिसमें छाया ना हो
उस धन का क्या
जिसमें करुणा ना हो

उस गाय का क्या
जो दूध ना दे
उस खूबसूरती का क्या
जिसमें सदगुण ना हो

उस थाली का क्या
जिसमें भात ना हो
हे प्रभु!
इस जिन्दगी का क्या
यदि तुम्हे जाना ना हो

***
बिछुड़न के बाद मिलन में
जो आनन्द है मित्र!
वह नहीं है
सदा साथ रहने में
अक्का महादेवी
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VOL - 1 / PART 6
( नवम्बर-2005 )

संपादक :  रति सक्सेना


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