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मेरी
बात
कृत्या का छटा अंक हमारे हाथ
में है, इन छह महिनों में कृत्या ने ना केवल देश विदेश की जाल
पत्रिकाओं में अपना स्थान बनाया है बल्कि पाठकों से एक सार्थक
संवाद भी स्थापित किया है। सुदूर पहाड़ी प्रदेश केलंग में रहने वाले
अजेय कृत्या के एक ऐसे पाठक हैं जो बिजली या नेट कनेक्शन ना मिलने आदि
तमाम परेशानियों के बावजूद न केवल शिद्दत से कृत्या का पाठन
करते हैं बल्कि उस पर चिन्तन भी करते हैं। अजेय की कविताओं को
कृत्या दूसरे अंक में स्थान ले चुकी है जिन्हें पाठकों ने सराहा भी
था। इस बार उनका यह पत्र लेख कविता के प्रति सोच को एक नई दिशा दे
सकता है। इसलिए इस बार " मेरी बात" में पाठक की बात को प्रस्तुत
किया जा रहा है। आशा है चिन्तन की यह कड़ी और आगे बढ़ेगी.....
आदरणीय रति सक्सेना जी,
नमस्कार
कविता के बारे में कुछ कहने का मन हुआ है। मेरी मजबूरी है कि मैं
कायदे से कोई निबन्ध या आलेख नहीं लिख सकता। जब मुझे गद्य में कुछ
लिखना होता है तो पत्र या डायरियों से काम चला लेता हूँ। कृत्या
में आपकी " कविता थेरोपी" पसन्द आई। वरना आजकल लोग भारी भरकम कविता
तो लिख लेते हैं लेकिन कविता के व्यवहारिक पक्ष पर चुप्पी लगा जाते
हैं।
कविता के बारे में मेरा मत बहुत स्पष्ट है। मैं कविता को अनावश्यक
रूप से महिमा मंडित कर उसे "दैविक" या कथित " ईश्वरीय" पदवी पर
स्थापित नहीं करता। मेरे लिए कविता स्वयं को अभिव्यक्त करने का
साधन मात्र है। सृष्टि स्वयं को अभिव्यक्त करने को आतुर रहती है।
इसके लिए वह तरह तरह से प्रयास रत रहती है। आदमी अपवाद नहीं है। वह
भी स्वयं को अभिव्यक्त करना चाहता है। उसके पास अभिव्यक्ति के अनेक
साधन हैं, ढेर सारे विकल्प। कोई खूब धन कमा कर स्वयं को अभिव्यक्त
करना चाहता है। कोई कपड़े पहन कर तो कोई पद और नाम पा कर, कोई खेल
कर तो कोई मेहनत कर के, कोई युद्ध से तो कोई प्रेम से, कोई गालियाँ
बक कर तो कोई गीत गा कर, कोई अत्याचार करके तो कोई सहानुभूति पाकर,
लेकिन एक आध व्यक्ति होता है इस तरह का कुछ नहीं कर पाता,
उस
बेचारे को कविता करनी पड़ती है।

बचपन से मुझे कविताएँ आकर्षित करती थीं। लेकिन कला के मास्टर लोग
जो अर्थ बताते उससे मैं सन्तुष्ट नहीं हो पाता। कविता की व्याख्या
करना मूर्खता है, वह स्वयं में परिपूर्ण होती है। यदि कविता अपनी
व्याख्या नहीं कर सकती तो इसका मतलब है कि वह कमजोर है और उसमे
सुधार की गुंजाइश है। कविता स्थूल होनी चाहिए। एक जिन्दा दृश्य की
तरह, आप उसे छू सकें, सूँघ सके, महसूस कर सके, भोग कर सकें। और वह
आपके भीतर कुछ कंपा जाए। हाल ही मैंने कुछ कविताएँ पढ़ी हैं ।
रवीन्द्र स्वप्निल की एक कविता आई थी वितान के प्रवेशांक में...
"मेरे पास पोयेट्री है", मैं उस कविता को जी सका। वसुधा में राजेश
जोशी की कविता थी " काली धोबिन का किस्सा" मुझे लगा कि मैं घाट पर
बैठा था, धोबिन आई और कपड़े धोकर चली गई। अब उसके अन्दर अर्थ खोजने
वाली बात कहाँ रह गई। अर्थ तो आपके मन में है। चाहे जो भी हो आपका
अर्थ और मेरा अर्थ भिन्न होगा। मेरा मतलब है कि अर्थ का साधारणीकरण
नहीं जा सकता है। कविता की अपील जरूर कामन हो सकती है, व्याख्या
कदापि नहीं। इस सिलसिले में अभी परसों ही पढ़ी आपकी कविता को भी
रखना चाहता हूँ॔..."एक खिड़की और आठ सलाखें" , अब तक पढ़ी बेहतरीन
कविताओं में से एक है। बहुत संभव है लोग इसे कविता ना माने, वो
...प्रतिमान, सिद्धान्त, मुहावरे आड़े आएँगे, ऐसा माने। लेकिन मन तो
मान रहा है ना, यह अजीब है, और कितना अद्भुत! मैं हैरान होता हूँ
जब आप पूछती हैं.. यह कविता तो है ना? रति जी आपने क्या लिखा था?
मेरे लिए तो वही कविता है जो अच्छा लिखा गया हो। मुझे हर चीज में
कविता मिलती है, चीजों में भी और पहाड़ों में भी, नित नई कविता। सुबह
कुछ, दोपहर को कुछ, शाम को कुछ और ही।
ये तीन उदाहरण हैं मेरे जेहन मे ताजा थे, इसलिए दिए। नया पढ़ कर हम
अकसर पुराना भूल जाते हैं। कविता से मैं कुछ ज्यादा ही अपेक्षा करता
हूँ। मैं स्वयं कवि हूँ और अपनी कविता की सीमाएँ जानता हूँ। मैं
जैसी कविता चाहता हूँ वैसा लिखने के लिए ना जाने कितने जन्म लेने
पढ़ेंगे। लेकिन कविता को वैसा ही होना चाहिए, यहाँ किसी को कोई छूट
नहीं।
इधर कविता के क्षेत्र में कुछ परेशानियाँ हैं। पहले हम उन
परेशानियों पर बात कर लें। अन्त में उनके कारणों पर भी करंगे। कुछ
लोगों को आज की कविता समझ में नहीं आती। यह सचमुच अजीब है। जैसे कि
मजबूर किया गया हो कि आपको यह समझना ही होगा। वैसे भी कविता समझने
की नहीं , अनुभव करने की चीज है। कविगण अपनी कविताओं के पक्ष में
लम्बे चौड़े वक्तव्य देते हैं। स्थापित किस्म के साहित्यकार भी
मानने लगे हैं कि "समझ में न आने बाली कविताओं" के समान्तर में
एक गद्य का होना जरूरी है। लोग अपनी कविताओं के पक्ष में ग्रन्थ के
ग्रन्थ लिखवा रहे हैं। ये ग्रन्थ कविता को उन लोगों तक पहुँवाएँगे
जो कविता को समझ नहीं सकते। यह हद है, साहित्य में ऐसी स्थिति पता
नहीं पहले आई या नहीं। यदि आई हो तो मेरा विश्वास है कि उस दौर में
साहित्य का पतन ही हुआ होगा।

वैचारिक और सामाजिक रूप में हम इस दौर में कितने भी जटिल हो गए
हों, बाजार, सत्ता, समाज और वैश्विक उलझनों की गर्दन तोड़ बोझ के
तले जी रहे हों। हमारी मानसिकता में मूलभूत बदलाव आ गया हो, बेशक
लेकिन संवेदनाएँ नहीँ बदलीं हैं। वे बदल भी नहीं सकतीं। जब तक
रहेंगी , वैसी ही रहेंगी या फिर पूर्णतया नष्ट हो जाएँगी। तब आदमी
एक यान्त्रिक दैत्य बन जाएगा। तो हमारा मन सदियों से जिस सौन्दर्य
की लालसा में है, आज की चरम जटिल परिस्थितियों में भी वही खोज जारी
है। कुछ समझने के लिए ग्रन्थ की जरूरत नहीं। हम इस सृष्टि के
वाहियात समाज तथा उस वाहियात समाज में रहने वाले बेढ़ब आदमी के भीतर
कुछ ढूँढ रहे है... आज भी , कुछ सुन्दर, कुछ मुलायम, कुछ आनन्द
भरा.... नदी किनारे, गुनगुनी धूप में, चट्टान पर बैठे, बीयर पीते
हुए मछलियाँ पकड़ने जैसा कुछ। आखिर कुछ तो होगा इस कुंठा भरे समाज
में दौड़ कर जिसे गले लगाया जा सके। और मेरा मानना है कि कविता का
बुनियादी सरोकार यही है। यहाँ विचारधारा की बाते चल रहीं हैं,
विचार कविता की बाते चली हैं, यह कविता को छोटा करना है। विचारधारा
और विचार की जो घुसपैठ कविता में हो रही है यह अवैध है। कोई विचार
आपकी कविता में रिफलेक्ट होता है, यह अलग बात है।
यही बात विचार के बारे में है। किसी कालखण्ड में किसी विशेथ समुदाय
या समाज में जो एक स्वयंबिद्ध धारणा अस्तित्व में होती है, उसे ही
विचार कहते हैं। उनका अपना स्वतन्त्र अस्तित्व होता है। उसमे दम हो
तो स्वयं फैलेगी। वरना नष्ट हो जाएगी। कविता के माध्यम से किसी
व्यक्तिगत धारणा को ठूँसने का प्रयास कविता और वैचारिकता दोनों के
लिए ही अच्छा नहीं है। वैचारिक विश्लेषण मंथन के अपने अलग मंच होते
हैं। विचारों का बोझ गद्य ही उठा सकता है। कविता को बोझ उठा चलना
नहीं आता। क्या हम कविता पर यह अहसान कर सकते हैं?
कविता के व्यवहारिक पक्ष पर अभी तक बहुत कम कहा गया है। मैं भी
कविता को तनाव कम करने वाली वैक्सीन मानता हूँ। आपने इसे थेरोपी
बताकर बृहत्तर आयाम दिया है।
अभी पूरी कृत्या नहीं पढ़ पाया हूँ, यहाँ की समस्याएँ आप जानती है,
बिजली आदि की, अगले पत्र में विस्तृत देने की कोशिश करूँगा।
शुभकामनाएँ
अजेय
प्रसार अधिकारी उद्योग
जिला उद्योग केन्द्र केलंग
१७५१३२
कृत्या के इस अंक में अपने
सभी स्तंभों सहित पेश हैं, इस बार हम श्रीप्रकाश मिश्र जी गंभीर
लेख " आधुनिक यूरोप की कविता" को धारावाहिक रूप में प्रस्तुत कर
रहें है। यह लेख धारावाहिक इसलिए कि नेट पर पढ़ने में सुविधा हो।
आशा है कि इस अंक के प्रति भी पाठक की धारदार प्रतिक्रया मिलेगी।
रति सक्सेना
नोट-
पिछले अंको की तरह इस अंक के समस्त चित्र युवा कलाकार विजेन्द्र विज द्वारा बनाए
गए हैं। विजेन्द्र ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने कम समय में
अन्तराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है । विजेन्द्र ने कंप्यूटर और
डिजिटल आर्ट में भी महारत हासिल की है। विजेन्द्र की कलाकृतियाँ
अन्तर्राष्टीय स्तर पर खरीदी जाती हैं। विज के चित्रों की अनेक
प्रदर्शनियाँ हुईं हैं । विजेन्द्र में प्रतिभा और लगन के साथसाथ
नम्रता भी है जिसके के कारण कला में आगे बढ़ने की संभावना बढ़ती जाती
है । विज ने अपनी कलाकृतियाँ कृत्या को समर्पित की हैं , इनकी
बिक्री से कृत्या के रखरखाव के लिए मदद मिलेगी । जो कलाप्रेमी इन
कृतियों को खरीदना चाहते हैं वे कृत्या के संपादक से संपर्क कर
सकते हैं । विजेन्द्र से सीधा सम्पर्क करने का पता है
STUDIO VIJ'S
06, Madhuban Building, 54-55 Nehru Place
New Delhi, IN 110019
इ::स अंक के सारे रेखाचित्र चित्रकार
प्रभाकर के कलाकार पुत्र रोशन ने बनाएँ हैं। हमे आशा और विश्वास
है कि इस अंक के सारे रेखाचित्र चित्रकार
प्रभाकर के कलाकार पुत्र रोशन ने बनाएँ हैं। हमे आशा और विश्वास
है कि रोशन भी पिता की तरह नाम कमाएँगे।
अलंकरण हेतु चित्रों का निर्माण संपादक
द्वारा किया गया है।
रति सक्सेना
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