समकालीन कविता की भाषा और शिल्प

 अक्सर कविता की भाषा अपने समय से एक कदम आगे चला करती है। यानी कि वह अपने समय की भाषा को शिल्प का गठन और संस्कार देती है। विशेषकर उस वक्त में, जब कविता का स्थान कविता तक ही सीमित नहीं हुआ करता था कविता भाषा को संस्कार देती रही है। किन्तु हम बात कर रहे है वर्तमान समय की, जब कि काफी कुछ बदल रहा है ‌और काफी कुछ बदलने की स्थिति में है, कविता को भाषा को संस्कार देने की ज्यादा छूट नहीं रही है। यदि ईमानदारी से वस्तुस्थिति को समझा जाए तो समकालीन कविता को समाज के साथ कदम मिलाकर चलने में भी कठिनाई हो रही है। अक्सर ऐसा भी हो रहा है कि कविता को अपने बचाव में पैंतरे बदलने पड़ रहे हैं, वह समाज के साथ है, या समाज उसके साथ, यह निर्णय उसके हाथ से निकल सा गया है। लेकिन यदि कविता समाज के पीछे ही चलती रही तो भाषा को संस्कार कैसे मिलेगा, भावों में ताजगी कैसे आएगी ? हाँ इतना ध्यान तो उसे रखना पड़ेगा कि समाज उसके साथ से अपनत्व महसूस करे।  मुझे यह भी लगता है कि कविता के लिए तो हर वक्त ही मुश्किल दौर रहा होगा तो आज के दौर से घबराना ठीक भी नहीं। क्यों कि कविताएँ आज भी लिखी जा रही हैं, और धड़ाधड़ लिखी जा रही हैं, बिना अच्छे बुरे के भेदभाव के।  

            समकालीन हिन्दी कविता से मेरा वास्ता दो रूप में पड़ रहा है, एक रचनाकार के रूप में, दूसरा पाठक के रूप में। मेरे साथ तीसरी स्थिति यह भी है कि जिस जगह से मैं हिन्दी कविता को देख रहीं हूँ, वहाँ हिन्दी बोलचाल तक में मौजूद नहीं है। यानी कि जिस भाषा में मैं सोच रही हूँ वह या तो मेरे भूत की भाषा है, या फिर अनेक माध्यमों द्वारा छन कर मेरे तक पहुँचने वाली भाषा है। स्वभाविक है कि भाषा से मेरा साक्षात सबन्ध नहीं है। ऐसे में जब समकालीन हिन्दी कविता मेरे पास पहुँचती है तो मैं उसे असम्प्रक्त हो देख पा रही हूँ। इस तरह मुझे  हिन्दी कविता के कई रूप दिखाई दे रहे हैं। एक तो वह रूप जो हिन्दी के केन्द्र में है। यानी कि ऐसे विशाल क्षेत्र से ताल्लुक रखता है जो हिन्दी क्षेत्र माना जाता है, मसलन उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार आदि प्रान्त सहित वे सभी क्षेत्र जहाँ हिन्दी को कम से कम बोलचाल का दर्जा हासिल है। दूसरा वह क्षेत्र जो हिन्दी भाषा  से सम्बन्ध तो रखता है, किन्तु साहित्यिक संस्कार से दूर जमीन से टूट जाने के भय से रच रहा है, ऐसे क्षेत्र में वे कवि आते है् जो नेट माध्यमो के प्रयोग में निपुण हैं, किन्तु कविता उनके लिए मात्र अभिव्यक्ति का माध्यम है। तीसरे वे हैं जिनका परिवेश और संस्कार दोनो ही कविता से परिपूर्ण है किन्तु केन्द्र से दूरी उनके स्वतन्त्र व्यक्तित्व को बनाए रखती है। मुझे दूर से देखने में कई बार ऐसा लगा है कि केन्द्र से आने वाली आवाज आपस में टकराती है, यानी कि कुछ गिने चुने कवियों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर कविताएँ ऐसे क्षेत्र में रची जाने वाली कविता‌ओ में जिस भाषा या मुहावरों का गठन हो रहा है, उसमे काफी कुछ समानता दिखाई देती है। ऐसा भी लग रहा है कि कविता काफी कुछ एक सी समस्या से जूझ रही है। विषय के सम्बन्ध में सोचा जाए तो यह कहा जा सकता है कि यह यादों की जुगाली का या फिर रिश्तो को तलाशने का समय है अभी अभी हिन्दी साहित्य में कई वादों का दौर बीता है, सभी वाद एक समय के बाद साहित्य पर अपनी पकड़ छोड़ देते हैं। मुझे लगता है कि यह ऐसा शून्यकाल चल रहा है जिसमे सोच एक चौराहे पर ठिठकी खड़ी है। यह एक ऐसा वक्त है जो अभी दिशा निश्चित नहीं कर पा रहा है। कविता के लिए स्थिति बेहतर है या नहीं, इसमें भी संदेह है। क्यों कि अधिकतर ऐसा होता है कि या तो इस तरह के शून्यकाल में रची गई रचनाएँ भाषा और शिल्प में बेहतर बनती हैं या फिर आरामगाहों में दफन हो जाती हैं।

                        वादों और नारों के उथले पड़ जाने से कविता को इतना वक्त मिला है कि वह उन विषयों के बारे मे सोचे जो फुर्सत की अपेक्षा रखती हैं। जाने कितने वक्त से मुझे लगभग हर पत्रिका में लड़की से सम्बन्धित कविताएँ मिल रही हैं कि लगता है कि कुछ दिनो में छात्र शोध का विषय इस तरह लेने लगेंगे‍‍‍‍‍‍..... समकालीन कविता में भारतीय लड़की, या फिर लड़की और कविता आदि। लगभग अधिकतर कविताओं में लड़की की तकलीफो को बयान किया जाता है और अन्ततः उसमे फूल, बादल आदि सभी रोमान्टिक प्रतीकों को सम्मिलित कर लिया जाता है। ऐसा ही भावनात्मक सम्बन्ध कवियों का "माँ" से भी रहा है, जो संभवतः अभी तक खत्म नही हुआ है। अधिकतर माँ सम्बिधित कविताओं की माँ में इतना कुछ भावनात्मक होता है कि जिन्दगी में दिखाई देने वाली माँ काफी कुछ पीछे रह जाती है। इस सन्दर्भ में मुझे खासी भाषा के कवि " किम फाम" की कविता की याद आती है जिसमें माँ के लिए लिखी गई कविता में एक ऐसी चिड़चिड़ी, बात बात पर गरियाने वाली, लातों ‍घूँसों से बाते करने वाली अधेड़ ‌औरत का जिक्र था जो अपने बच्चों से अच्छा बुरा हर तरह का काम करवाती है। इस कविता में कवि ने उन सब शब्दों का ‌और क्रियाओं का खुल कर उपयोग किया है जो हम अकसर निम्न वर्ग की महिलाओं गली नुक्कड़ की महिलाओं को अपने बच्चों के लिए प्रयोग करते देखते हैं। कथा कहानियों में उनकी भाषा को जगह मिल जाती है किन्तु कविता में अकसर इस तरह की भाषा से परहेज किया जाता है। संभवतः इस तरह की भाषा का प्रयोग हिन्दी के कवि कभी नहीं करेंगे क्यो कि उसमें उन्हें अभद्रता दिखाई देगी, काव्य सौन्दर्य के नष्ट होने की संभावना लगेगी।  किन्तु इस खासी कविता में ऐसा नहीं लगा, क्यों कि कविता के आरंभ में जब कवि आर के नारायण की माँ के असाधारण व्यक्तित्व से बात शुरु करते हुए अपनी माँ के असाधारण व्यक्तित्व के बारे में कहना चाहता है तो कुछ पल के लिए लगा है कि हम माँ के तारीफों का कसीदा पढ़ने जा रहे हैं।‍.." आर के नारायण मर गए/ आज की रात/ अपनी बाँस की कुर्सी पर दुखी भाव से बैठे वे सोच रहे थे " एक बहुत असाधारण व्यक्तित्व" के बारे में अचानक मेरे भीतर एक इच्छा धधकी अपनी उस असाधारण आत्मा का / शुरु से आखिरी तक पुनर्लोचन करने की किन्तु अगले ही पल पाठक का सामना माँ के मुँह से निकली जिन गालियों से होता है, एक पल को पाठक का बाहरी छद्म आवरण भौचक्का रह जाता है,... मुझे वह  वक्त याद है / जब वह एक चिड़चिड़ी युवती थी दुपहर में जब वह झपकी लेती तो बाघिन बन जाती /. कमीने , भौसड़ी के एक मिनिट भी तू मुझे आराम नहीं करने देता / जरा इधर तो सही मैं तेरी टाँगे तोड़ती हूँ फिर से उधम मचाया तो इतना मारूँगी कि कुत्ते के पिल्ले की तरह चिंचियाएगा.... 

फिर ? ....शनैः शनैः हमारा छद्म आवरण  चटखने लगता है। अन्त तक हम उसे पूरे मन से पढ़ने लगते हैं, यहाँ तक कि  माँ की सारी ज्यादतियों को उतने ही आराम से झेल जाते हैं जैसे कि उसके बच्चों ने झेला होगा। लेकिन जब  कवि  कहता है कि .. मैं बच रहा हूँ / उसके बारे में कुछ अच्छा बताने में / मैं नारायण नहीं हूँ / मैं यह भी नही कहूँगा कि / मेरी माँ ने कितना झेला / जब मेरा गँवार बाप जिन्दा था या फिर / कितना भुगता जब वह मरा था मैं यह भी नहीं कहूँगा कि  / अपने दो बेटों और मरी बहन के बच्चों को पालने के लिए / उसे क्या क्या ना करना पड़ा / लेकिन एक बात मैं जानता हूँ कि / यदि उसने दुबारा शादी कर ली होती / तो वह / इतनी चिड़चिड़ी ना होती जैसी कि वह है।....

यह कविता माँ की एक ऐसी छवि का निर्धारण कर देती है जो माँ की प्रशंसा में लिखी खूबसूरत भाषा वाली कविताएँ नही कर पातीं हैं। और हमे कवि की इस बात पर विश्वास करने के अतिरिक्त कुछ नहीं बचता कि .." नारायण की माँ की तुलना में / मेरी माँ ज्यादा सच्ची और दो टूक है. मजे की बात है कि कवि जिस कथन को स्थाई में रखता है पाठक उस पर कविता के अन्त में विश्वास करता है कि सारी बेहूदा गालियाँ , माँ की ज्यादतियाँ इसी कथन के सापेक्ष में हैं। मैं यही कहना चाहूँगी कि मुझे यह कविता माँ के लिए लिखी तमाम कविताओं से बेहतर लगी। क्यों कि उस यथार्थ को बखान करती है जिससे हमारा अभिजात्य मुखौटा हमेशा बचता रहता है, माँ का यह रूप हमारे सामने कई बार आता है, किन्तु इस अभिजात्य मुखौटे को उतारने की हिम्मत हममे नहीं होती। ऐसा नहीं है कि दुनिया की सारी माँऐ ऐसी होती हैं किन्तु इसमें भी कोई सन्देह नहीं माँ भी सामान्य इंसान है जिसमें वे सभी अच्छाइयाँ बुराइयाँ है जो सामान्य इंसान में होती हैं। इस कविता में कवि का उद्देश्य माँ की बुराइयाँ दिखाना नहीं है, ही वह माँ के इस क्रूर रूप के बारे में सफाई देना चाहता है। मुझे लगता है यहाँ कवि माँ के साथ कविता के शिल्प और भाषा पर भी काफी कुछ कह जाता है।  

क्या होनी चाहिए कविता की भाषा? छद्म या नग्न सत्य?  यदि नग्न सत्य आँखों और कानो को चुभता है, हमारा सामाजिक परिवेश और हमारी मान्यताएँ, हमें मजबूर करती हैं कि हम नग्न सत्य को छद्म से भर दें। कुछ रिश्ते ऐसे हैं जिसके लिए अलंकारिक भाषा का प्रयोग करना एक साहित्यिक मजबूरी सा बन गया है। किन्तु यदि इस भाषा को सही शिल्प मिले तो संभवतः कठोर भाषा भी अच्छा प्रभाव छोड़ सकती है। जिस तरह इस कविता में, कवि आर. के नारायण की माँ से कविता का आरंभ कर रहा है नारायण ने जो भी माँ के लिए लिखा है कवि उसी के विरोध में बात करता है लेकिन शिल्प के जरिये तमाम अवांछित शब्दावली  के बावजूद केवल अपने लिए बल्कि अपनी माँ के लिए प्रति भी पाठकीय भावनात्मक सम्बन्ध बना लेता है। यह कविता बेटे या माँ की कुंठा का उगालदान नहीं है बल्कि एक ऐसे रिश्ते की स्थिरता और मजबूती की और इशारा करता है जो तमाम विरोधी परिस्थितियों के बावजूद एक समझदार ही नहीं बल्कि भावनात्मक संबन्ध कायम रखे है।  

मैं यहाँ यह सवाल रखना चाहती हूँ कि क्या समकालीन हिन्दी कवि इस भाषा और शिल्प के बारे में सोच भी सकता है? अभी तक इतनी सटीक भावोक्ति मेरी निगाह में नही आई। अधिकतर कविताओं में खूबसूरत बिम्बों को इस तरह से जड़ दिया जाता है कि कविता दुल्हन की ओढ़नी की तरह जगमगाने तो लगती है किन्तु फटी ओढ़नी के दर्द भरे छेदों को जाहिर तक नहीं होने देती है। यही पर हम समाज से कटने कि तैयारी करने लगते हैं। किन्तु एक बात और है कि केन्द्र की धुरी से दूर रची जाने वाली कविताएँ कहीं ना कहीं धरती की सौंधी खुशबू को कविता का रास्ता दिखा देती है, उदाहरण के लिए केलंग वासी अजेय की कविता "प्रार्थना" की बानगी देखिए..ईश्वर / मेरे दोस्त! / मेरे पास / यहाँ बैठ / बीड़ी पिलाऊँगा / चा पीते हैं / गप शप करते हैं / बहुत दिनों बाद फ्री हूँ / तुम्हारी गोद में सोऊँगा / तुम मुझे परियों की कहानी सुनाना/ फिर जाने कब फुर्सत होगी मुझे फिर लगता है कि यह सबसे खूबसूरत प्रार्थना है, क्यों कि इसमें ईश्वर से जो सम्बन्ध बना है वह साथ बीड़ी पीने , गपशप करने के कारण बेहद आत्मीय बन गया। सहज भाषा और सटीक शिल्प ने कविता में वह अर्थवत्ता भर दी है जो बड़ी से बड़ी प्रार्थना में भी संभव नहीं।  

इसी शृंखला में मलयालम की एक कविता "वीडियो मौत" का उल्लेख करना चाहूँगी जिसके कारण ना जाने कितनी आँखों में पानी छलछला गया। "कुरुक्षेत्र जैसी दुरूह कविता की रचना करने वाले अय्यप्प पणिक्कर के लिए इतनी सरल भाषा में कविता रचना आसान था या दुरूह, यह तो मैं नहीं कह सकती, किन्तु इतना अवश्य है कि यह कविता एक अलग शैली की ओर ध्यान आकर्षित जरूर करती है। इसे कविता कहा जाए या नहीं, यह भी संदेह होता है, क्यों कि कविता का आरंभ एक संवाद से होता है‍, अधीरता से भाई की चिट्ठी का इंतजार करती बहन और किसी संवाददाता में। दूसरी पंक्ति से ही पत्र वाचन शुरु हो जाता है, एक ऐसे बेटे का पत्र जो अपनी माँ की बीमारी की बात सुन कर बहन को लिख रहा है। वह लिखता है कि  माई डियर सरो, मालूम हुआ / हमारी मदर कुछ सीरियस हैं / लेकिन यहाँ बूँदाबाँदी हो रही है / अमेरिका की बूँदाबाँदी क्या समझ पाओगी / इसीलिए तो घर नहीं पा रहा / मदर की मौत का वीडियो जरूर भेजना"/ आखिर साँस से लेकर सारे क्रिया- करम/ जैसे शव को नहलाना, नया कपड़ा ओढ़ाना / चावल मुँह में डालना, बलि, / जलती चिता, हँडिया फोड़ना आदि.....इस तरह से खत चलता रहता है और इस पंक्ति पर आते आते पाठक का धैर्य छूट जाता है ..शेष फिर-वीडियो मिलने पर / अम्मा जी को भी जरा एडजस्ट करने को कहना  / क्रिसमस से पहले ही ...../ बूँदाबाँदी की बात अम्मा को भी बतला देना / टेक केयर

अब शिल्प की दृष्टि से देखा जाए तो इस कविता में कवि ने ना तो शब्दों का जाल बिछाया है और ना ही बिम्बों को भरा है, सहज भाषा में बड़ी सादगी से शब्दों को रख दिया गया है, इस सरलता से कि कवि वाचक के स्थान से हट सा गया है, जो कोई बोल रहा है, वह रक्त सम्बन्ध है और जो कोई सुन रहा है वह पाठक है। कही भी कवि ने क्रूर भाषा का प्रयोग नही किया और कभी भी भावनाओं को नहीं भुनाया। फिर भी कविता पाठक के दिल में प्रवेश कर जाती है। क्या है ताकत कविता की ? मात्र विषय ? किन्तु यदि ऐसा ही होता तो यह कोई नया विषय नहीं है। बेटों द्वारा माँ बाप की उपेक्षा होना कविता से ज्यादा कहानियों का विषय रहा है। फिर क्या बात है जो कसकती है? निसन्देह सही वक्त पर सही शब्दों का प्रयोग, और शिल्प की कसावट, एक बार कविता में प्रवेश करने के बाद पाठक को कविता से बाहर निकलने का मौका ही नहीं मिलता, और कविता खत्म होने के बाद भी पाठक के साथ चलती है।

ये कुछ  उदाहरण  समकालीन कविता का सम्पूर्ण प्रतिनिधित्व तो नहीं करते किन्तु कविता के शिल्प और भाषा से सम्बन्धित एक खिड़की जरूर खोल देते हैं. जो अनन्त आकाश का एक टुकड़ा भीतर तक भरने में समर्थ है। मैं सिर्फ यह कहना चाहूँगी आज जरूरत है कि हम रुके और देखें कि क्या हमारे द्वारा रची जाने वाली कविताओं की भाषा और शिल्प समय सापेक्ष है? यदि नहीं तो देखें कि हम क्या कर सकते हैं इस दिशा में? आत्म मंथन हो या चिन्तन, कविता के शिल्प को सहजता की ओर सजगता से ले जाना हमारा प्रयास होना चाहिए।

रति सक्सेना



 


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