किन फाम की लम्बी कविता

कुछ निन्दनीय पंक्तियाँ
माँ के लिए :--


आर के नारायण नहीं रहे.
आज रात वे
अपनी बाँस की कुर्सी पर बैठे
बड़े गमगीन भाव से
"अपनी उस महान आत्मा" के बारे में
बात कर रहे थे.
अचानक मुझ में भी
एक इच्छा सुलगी कि
मैं भी अपनी उस
"महान आत्मा" का
आद्योपान्त
पुनर्वालोकन करूँ

मैं अपनी बात यहीं से
शुरु करता हूँ कि मेरी माँ
नारायण की माँ की अपेक्षा
अधिक सीधी सच्ची व दो टूक है


मेरी माँ रिटायर्ड , पोपले मुँह वाली,
मधुमेह से ग्रस्त, मोतिया बिन्द से अंधी
कुल मिला कर एक झगड़ालू औरत है.........................
 

पूरी कविता अगले पृष्ठ पर )


परमिन्दर की कविता

पानी को नहीं छूना

पानी को नहीं छूना
इन पर अंकित चक्रवातों की नींद
बैचेनियों के घौंसले

इन में
तुम्हारी रूह की हुंकारी नहीं
गूँगी है इनकी पारदर्शिता
पानी को नहीं छूना

नहीं होती मनफी
पानी से प्यास कभी
पानी के भी होते हैं सहरा
पानी की भी होती है कायनात अपनी

पानी सो जाता है अपनी नींद में
पानी खो जाता है अपनी तासीर में
पानी का अपना सन्ताप होता है
पानी का अपना विलाप होता है
पानी को नहीं छूना

तुमने सुनना क्या विलाप
तुमने क्या सहना संताप
सोया रहने दो इसे
अपनी चुप में

यह एक उम्र के बाद बोलता है
उतरना मत्त इसकी लीनता में
छूना नहीं पानी को !

अनुवाद ‍- मनोज शर्मा

( परमिन्दर की अन्य कविताएँ )


अशोक सिंह की कविता

यूँ भी मरते हैं लोग

मरने से पहले मरता है आदमी
कितनी कितनी बार
कितनी कितनी बार लेता है जन्म
जन्म लेने के बाद भी

बार- बार जन्मने और मरने की
जटिल प्रक्रिया से
हर रोज गुजरता है आदमी

खुद से एक लम्बी बहस के बाद
जोड़ता है अपने आप को
अगले हादसे से लड़कर मरने के लिए

मरने के लिए जरूरी नहीं है
किसी मोटर के नीचे आ जाना
साँस की धमनियों की पकड़ से छूट जाना
या फिर लगा लेना जिन्दगी से ऊब कर
गले में फंदा

मरने के लिए काफी है
अपने आपसे अपने को चुराते
अचानक अपने ही हाथों पकड़े जाना

जो हमारी संवेदनाओं के बहुत करीब था
उसका सामने से चुपचाप
अनजान बनकर गुजर जाना

कम नहीं मरने के लिए
अपने
किसी बहुत अपने से
दुख के समय सुनना
चँद औपचारिक शब्द
एक बेहद औपचारिक भाषा...

( अशोक सिंह की अन्य कविताएँ.. )


ब्रह्माशंकर पांडेय की लम्बी कविता


सुरहा तालः उत्सर्ग की लीक भाषा

निहाल हो उठते हैं
दूर-‍ दराज से आने वाले पक्षी
सुरहा ताल में आकर
उनके आने का ताँता जैसे लग जाता है
साइबेरिया जैसे मुल्क के बाशिन्दे ये पक्षी
भीषण ठंड से निजात पाने के लिए
कमतर ठंडे देशों में पलायन कर जाते हैं समूह में
भारत ऐसे देश में
सुरहा ताल की खुली रमणीक जगह
उनकी पहचानी हुई है
उसकी पसन्दीदा जलवायु सदा से
उनके माफिक पड़ती है

उनके लिए रास्ते में पड़ने वाली
न मुल्कों की सीमाएँ अवरोधक हैं
न ही पहाड़ों की ऊँची चोटियाँ
ये कहीं भी जाए
तीमारदारी के साथ खातिरदारी होती है
उनका अभयारण्य बना है
बलिया जनपद का यह ऐतिहासिक सुरहा ताल
अपनी औलिया सुन्दर आवाज से गुंजायमान
गुलजार हो उठता है ..........................................

(  पूरी कविता अगले पृष्ठ पर )


हरिहर झा की कविता

चले फिर

चलो
चलें फिर
इस दिखावे के
यंत्रवत जीवन से दूर
पिकिनक पर
संगी साथियों की टोली ले कर
समस्त औपचारिक वेशभूषा को तिलांजलि देकर
हंसी ठिठोली करते हुये
गुपचुप ही वहां पूरे लंचडिनर की व्यवस्था के बाद भी
चना चबेना ढूँढने का स्वांग रचते हुये .

चले फिर
फिल्मी तर्ज पर गीतों से गला फाड़ते हुये
आदिवासी लोकगीतों की तरह
या फिर आर्यों द्वारा गाई
वैदिक ऋचाओं की तरह
सामूहिक अंतर्मन को सुरों में
अभिव्यक्त करते हुये
कुछ दूर बुशवाक पर निकल कर
राह भटकने का ढोंग कर लेने के बाद
मोबाइल पर सम्पर्क करते हुये

चले फिर
कड़कती ठन्ड में
गरम आंच का लुत्फ लेने
कोयले की
अंगीठी पर हाथ सेंकने के लिये
अंगीठी मे छुपे हीटर का
स्वीच आन करते हुये

चलो फिर
वृक्ष, प्रकृति, चांदतारों की
सुन्दरता का बखान कर
इन सबसे
मन शांत कर लेने की डींग हांकने के बाद
जरा सी बात पर भड़क कर
मन ही मन भुनभुनाते हुये

चले फिर
चले !!!
 

( हरिहर झा की अन्य कविताएँ.. )


स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता


फिर से शुरु

( ईशिता के लिए )


आ‌‌‌ओ फिर से शुरु करते हैं
ईशिता
उस स्त्री को याद करते हैं
जिसने मुझे जीवन और
तुम्हें जन्म दिया है

आओ लिखते है ईश्वर के
नाम खत और उसे लेटर बाक्स
में डाल कर भूल जाते हैं

हम जानते हैं ईश्वर के पास
नहीं पहुँच पाएँगे, हमारे
शब्द
बस यूँ ही जिन्दगी से
खेलते हैं

फिर से सीखते हैं जिन्दगी की
वर्णमाला
बेसबब खेलते हुए खेल
थक कर सो जाते हैं
देखते है कोई अधूरा ख्वाब
चलो सुनते हैं एक दूसरे का
दुख और एक दूसरे के आँसू
पोछते है
हमने, बहुत देख लिया है
दुनिया को
बहुत देख लिए है लोगों के अभिनय
चलो हम खुश रहने का
जतन करते हैं
दुनिया को पता नहीं होने
देते कि हम दुख के पहाड़
के नीचे दबे हैँ

आओ डायरी के प्रथम पृष्ठ पर
लिखते हैं तुम्हारी माँ का नाम
और लम्हे भर के लिए उदास
हो जाते हैं।


( स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताएँ .. )


मिठाई लाल "निशान्त" की कविता
 

पपीते से निकला प्रेम सार


तुमने एक पपीता दिया था
दो दिन रखा रहा मेरे घर में

वह पका हुआ था
जैसे पकी हुयी थी तुम्हारी माँ
तुम्हारे अब्बा
तुम और कुछ कुछ तुम्हारे भाई की तरह
मैं भी

यह अजीब बात थी
कि मेरे सर पर शादी करने का भूत सवार था
उस वक्त तुम ध्यान से देखभाल करती पपीते गाछ की
तुम्हारे पास एक तोता भी था
मुझसे ज्यादा पपीता गाछ प्रिय था तुम्हें उन दिनों
जब तुम मुझसे बेइंतहा प्यार करती थीं
मैं तुमसे निश्चित ही

यह गाछ उन कच्चे पपीते और बूढ़े गाछों के बीच
पहला पका हुआ पपीता था
जो पड़ोसियों की भीड़ में तुमने मुझे दिया था
एक महान पड़ोसी की तरह
अपने महान प्रेमी को

क्या बोधिवृक्ष की तरह
यह पपीते गाछ से निकला हुआ सार तत्व था
जिसे तुमने बुद्ध की तरह ग्रहण किया था
और मुझ से मुक्ति चाही थी फोन पर
जैसे पच्चीस सौ साल पहले बुद्ध ने चाहा था
कि अब हम फिर कभी नहीं मिलेंगे

पपीते गाछ से पपीते के अलग हो जाने पर
जैसे नहीं निकलता है वहाँ दूसरा पपीता
ठीक वैसे ही बचा के रखना चाहती हो तुम अपना प्रेम
नहीं पकने देना चाहती हो प्रेम को
कि जिसे तोड़कर अम्मा भाई और कोई और दे दे
किसी आत्मीय पड़ोसी या दूर के रिश्तेदार को
अपनी पूरी आत्मीयता दिखलाने के लिए

तुमने एक पपीता दिया था
आज दो दिन बाद
मैं उसे काटूँगा खाऊँगा
और निकलकर तुम्हारे पड़ोस से
चला जाऊँगा जंगल में
जहाँ से कभी वापिस नहीं लौटे बुद्ध


(
मिठाई लाल;"निशान्त" की कविताएँ .. )  


रति सक्सेना‍

हल्दी में फूल

*
पाँवड़े नहीं बिछाए, बसन्त ने
न ही गीत गाए भौरों ने
बादल कभी नहीं उतरा
जगाने इसे

दबे पाँव चला आया
चोर की भाँति
मुँह पर लगा रक्त पौंछ
सफेद झक कपड़ों में
कैसे खड़ा है तन के

फुसफुसाहटों का शोर‍
एक औषध का खात्मा

हल्दी का फूल !


(रति सक्सेना‍ की कविता ...आगे )

 


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