किन फाम सिं नौगकिनरिह की कविता


किन फाम सिं नौगकिनरिह खासी भाषा के प्रमुख कवि हैं, और देश के उस भाग में रहते हैं जहाँ सबसे ज्यादा बारिश होती है यानी कि चेरापूंजी। इस वक्त वे नार्थ इस्टर्न यूनिवर्सिटी, शिलाग (मेघालय) में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर आसीन है। किन फाम की कविता में बला की साफगोई और भावों की तीव्रता है। प्रस्तुत कविता हिन्दी पाठको के अभिजात्य दंभ को कहीं अखर सकती है, क्यों कि यह लीक से हट है। इसमें कठिनाई से जूझती निम्न वर्ग की उस माँ का सटीक चित्रण है जिसके लिए परिस्थियाँ अपने  प्रेम को प्रकट करने के लिए कोई अवकाश ही नहीं छोड़ती और उसका प्रेम गालियों में बरसता है। यह कोई तथाकथित सौतेली माँ नहीं बल्कि तहे दिल से सन्तान को प्यार  करने वाली जुझारू माँ है जो बच्चों के लिए अपने सुखों को पीछे छोड़ देती है। इस कविता का शिल्प भी विशिष्ट है जो माँ के विरोध में कही जाने वाली सभी उक्तियों के बावजूद अन्ततः पाठकों के दिल में माँ के प्रति संवेदना जगा देता है।




कुछ निन्दनीय पंक्तियाँ
माँ के लिए :-
-

आर के नारायण नहीं रहे.
आज रात वे
अपनी बाँस की कुर्सी पर बैठे
बड़े गमगीन भाव से
"अपनी उस महान आत्मा" के बारे में
बात कर रहे थे.
अचानक मुझ में
एक इच्छा सुलगी कि
मैं भी अपनी उस
"महान आत्मा" का
आद्योपान्त
पुनर्वालोकन करूँ

मैं अपनी बात यहीं से
शुरु करता हूँ कि मेरी माँ
नारायण की माँ की अपेक्षा
अधिक सीधी- सच्ची व दो टूक है

मेरी माँ रिटायर्ड, पोपले मुँह वाली,
मधुमेह से ग्रस्त,  मोतिया बिन्द से अंधी
कुल मिला कर एक झगड़ालू औरत है

मुझे उस वक्त की भी याद है
जब वह बेहद चिड़चिड़ी युवती थी
दुपहरी को झपकी लेते वक्त तो वह
बाघिन बन जाती थी
"अरे ओ,  भौंसड़ी के!"
वह चिघांड़ती
"एक पल भी आराम नहीं करने देते
शैतान की औलादों !
इधर आओ तो सही
जंगली कहीं के !
हाथ आये तो
टाँगे तोड़ दूँगी
कचूमर बना दूँगी..
अबे ओ कामचोर की औलादों !
मेरे आराम के वक्त
फिर से शोर मचाया तो
इतना मारूँगी कि
पिल्ले की तरह चिंचियाओगे !

नालायक बेवकूफों !
कैसे इतने काम निपटा पाऊँगी मैं
यदि अच्छे सपने तक ना देख पाई ?
कैसे खिला पिला पाऊँगी तुम लोगों को ?
हरामी की औलादों !
फिर आँधी की तरह
लकड़ी की तिपाई, लोहे का चिमटा
और काँसे की धौंकनी के साथ
हम लोगों पर पिल पड़तीं
हम लोग जान छुड़ा कर भागते
पर वे चूल्हे की लकड़ी या डंडा लिए
हम लोगों के पीछे भागतीं
उसके बाल बिखर जाते
आँखे लाल हो जातीं
मुँह से पागलों की तरह गालियाँ
बरसती रहतीं.
हम बच्चे कभी कुछ नहीं सीख पाए
सिवाय इन अपारम्परिक हथियारों से बचने के।

मुझे अब भी याद है कि
वह अपने खून से लिथड़े कपड़े
मुझसे कैसे साफ करवाती थी
क्योंकि मेरे कोई बहन न थी
मना करने का सवाल ही नहीं
मैं उन्हें लकड़ी से उठाता
और लोहे की पुरानी बालटी में
तब तक खगालता
जब तक पानी साफ ना हो जाए
लेकिन एक बात कहूँ
मैं यह काम चोरी छिपे किया करता था
यदि वह देख लेती कि
मैं हाथ से नहीं धो रहा हूँ तो
आफत आ जाती।

उन दिनो चेरा में हम लोगों ने
पाखानों का नाम तक नहीं सुना था
न ही हम लोगों के घर सैप्टिक  टैंक
या सार्वजनिक शौचालय  हुआ करते थे
निपटने का काम हम लोग
अधिकतर पवित्र बगीचों में किया करते थे
पर माँ कभी कभी यह काम
कूड़ेदान में किया करती थी
और उसे बगीचे ले जा ठिकाने लगाने की
जिम्मेवारी मेरी होती थी
कोई सवाल ही नहीं उठता कि ना कर दूँ
तो मैं उस पर राख छिड़कता
सुपारी के छिलकों से ढाँकता , और
पूरी कोशिश करता कि
पड़ोसियों और दोस्तों की खुफिया नजर से
अपने आप को बचा सकूँ
जिन लोगों ने कमला हसन की पुष्पक फिल्म देखी है
वह समझ सकते हैं मेरी चालाकियों को

इस बात को साबित करने के लिए कि
कितनी सनकी और चिड़चिड़ी है मेरी माँ
मैं हजारों उदाहरण दे सकता हूँ, और
उसके बारे में कुछ भी अच्छा कहने से बच रहा हूँ
मैं नारायण तो नहीं
इसलिए यह नहीं बतलाऊँगा कि
उसने कितना कुछ सहा
जब मेरा जंगली बाप जिन्दा था
या कितना कुछ झेला जब वह मरा,
और उसे पालने पड़े अपने दो बेटों ‌के साथ
दिवंगत बहन के नन्हें बच्चे
उसके बारे में मैं एक बात जरूर स्वीकारता हूँ कि
यदि वह दुबारा शादी कर लेती तो
इतनी झगड़ालू और चिड़चिड़ी ना होती
फिर मैं यहाँ खड़ा होकर
कविता भी नहीं पढ़ रहा होता।


अंग्रेजी से अनुवाद --- रति सक्सेना


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