ब्रह्माशंकर पांडेय

ब्रह्माशंकर पांडेय की यह लम्बी कविता मानवीय संवेदना का अपने परिवेश के साथ सार्थक संवाद है। अपने अतिरिक्त किसी और की स्थिति ना मानने वाला मानव यह नहीं समझ पाता है कि सृष्टि की अनेक चीजों जैसे कि आसमान, हवा, जमीन और नदी नालों पर उसका हक ही नहीं बनता। उसकी क्रूरता प्रकृति के विरोध में अनेक सवालों को सामने रखती है। ब्रह्माशंकर पांडेय का पता है‍ डी 65/112 क, मिसिरपुरा, लहरतारा, वाराणसी ( उ. प्र. )

 

सुरहा तालः उत्सर्ग की लीक भाषा


निहाल हो उठते हैं
दूर ‍ दराज से आने वाले पक्षी
सुरहा ताल में आकर
उनके आने का ताँता जैसे लग जाता है
साइबेरिया जैसे मुल्क के बाशिन्दे ये पक्षी
भीषण ठंड से निजात पाने के लिए
कमतर ठंडे देशों में पलायन कर जाते हैं समूह में
भारत ऐसे देश में
सुरहा ताल की खुली रमणीक जगह
उनकी पहचानी हुई है
उसकी पसन्दीदा जलवायु सदा से
उनके माफिक पड़ती है

उनके लिए रास्ते में पड़ने वाली
न मुल्कों की सीमाएँ अवरोधक हैं
न ही पहाड़ों की ऊँची चोटियाँ
ये कहीं भी जाए
तीमारदारी के साथ खातिरदारी होती है
उनका अभयारण्य बना है
बलिया जनपद का यह ऐतिहासिक सुरहा ताल
अपनी औलिया सुन्दर आवाज से गुंजायमान
गुलजार हो उठता है

वे लम्बी दूरियाँ तय कर पहुँच आए होते हैं
अपने गन्तव्य स्थल पर
यहाँ से खुशगवार मौसम का आनन्द लेने
बेहिचक निर्दिष्ट पथ से
आइने की तरह साफ उनकी उड़ाने
और उसी तरह का मन्तव्य लिए हुए
पूरी कर लेते हैं
बकाये में नहीं रखते कुछ
अपनी सोच को न अधिक भुलाते हैं
ना टालते हैं
यहीं से,
जहाँ पर हम चुके होते हैं
शुरु होता है स्त्रोत का अखण्ड प्रवाह
पंखो की भाषाई उद्गार का
अपनी पूरी अर्थवत्ता लिए हुए
संदर्भ के साथ प्रतिबिम्बित होता है
हमारे जनमानस में

हम घूम पड़ते हैं उस तरफ
जिधर ये पंख फड़फड़ाते हैं
और ध्वनि उत्पन्न होती है
उसमे नकार नहीं होता
वह बोझिल हो सकती है
पंखो की समृद्ध भाषाई प्रमेय के उत्पाद से पूर्ण
कितना बड़ा अनुष्ठान लिया है अपने हाथों में
दावे से पूर्ण इन पक्षियों ने

ये पंख सिर्फ हिलते नहीं
हिलाकर रख देते हैं पूरे व्योम को
उनमे वायु जैसा तेज, ओज और ऊर्जा है
ये वायु से भी टकराते हैं
उत्सर्ग की लीक भाषा
सदा सकारात्मक, सन्तुलित, सद्भावनापूर्ण और
संवेदनशील हुआ करती है
उसकी कोई वर्ण माला नहीं बनी है
भावबोध की प्रक्रिया अपनाने से
हम पहुँच सकते हैं उसके मर्म की हद तक
दूसरा कोई जरिया नहीं है।

उड़ान भरने का सलीका यदि किसी में है
तो वह इन गगन विहारियों में
जिनका रागात्मक सम्बन्ध हमारी धरती से जुड़ा है
ये चले आते हैं यहाँ हमें अपनी याद दिलाने
ताकि वे पुरानी ना पड़ जाएँ
अच्छा है वे आया करें इस तरह से भी
हो सकता है वे चले आएँ इसी उद्देश्य से
मगर इस बार का उनका आना
और अशुभ एक अनहोनी घटना का घट जाना
यह किस तरह का संयोग बन गया
कि सुरहा ताल की आत्मा काँप उठी
उसकी जमीन झनझना पड़ी
पेड़, रुख, बिरिछ साँय- साँय करने लगे
प्रवासी आगन्तुक पक्षियों में से एक अप्रत्याशित
किसी नादान गोली का शिकार हो कर
जमीन को लहुलुहान करता पड़ गया
वेदना की चीत्कार के साथ
बुझ गई उसकी जीवन बाती
पंखों का भाषाई संवाद
अंतिम हिलकोरे देकर जुदा हो चला

 


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