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हरिहर झा की कविता द्वन्द्व के उस दर्द को बयान करती है जो अपनी
जमीन से कटने और सुविधा से जुड़ने के बावजूद कहीं ना कहीं अन्तर्मन
में टीस देता रहता है। आस्ट्रेलिया में विस्थापित हरिहर झा ने अपनी
इस ताकत को कचरे की टोकरी में डाल दिया था, यह सोच कर कि ये
कविताएँ नींद की गोलियों की तरह सुला देने वाली आज की कविताओं के
स्वाद की नहीं हैं। किन्तु कृत्या के आग्रह पर वे अपनी बरसो पुरानी
सोच के साथ उपस्थित हुए हैं।
घोड़े
घोड़े महत्वाकांक्षाओं के
ऊँची- ऊँची लालसाओं के
भागते हुये
सरपट मैदान की बात ही क्या
चढ़ भी जाते हैं सीढियों पर
भले ही पैर लहुलुहान
कभी तो दुनियावी बोझे से लदा तांगा
कंधो पर उठाये
आकाश मे उड़ते हुये
भावना के परिन्दों को
नीचा दिखाते हुये।।।
ये घोड़े दे गये मुझे
अथाह शक्ति, धन दौलत
ईष्या मित्रों की
गालियां दुश्मनों की
अजनबियों की व्यंग्यमय मुस्कान
सब कुछ पा लिया
अपने ही बलबूते पर याने
बलपूवर्क इस घोड़े के बूते पर
सब कुछ पा लिया
अपने स्वयं की पूणार्हूति देकर
मैंने
अश्व नहीं
नरमेध यज्ञ मे
घोड़े को किया
यशस्वी विजयी कीतिर्मान !
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दर्द
का दर्द
मै जब खाली पेट था
भूखा ! सिर्फ भूखा !!
नहीं जानता था
क्या होता है सिर दर्द
दिल मे लिये फिरता था
सिर्फ प्यार का दर्द
हाँ अब, जब खट्टी डकारे लेता हूं
कल का भोजऩ कोई छीन न ले
इस चिन्ता मे व्यस्त रहता हूं
तब चुभ रहा है तीर
दर्द से फटा जाता है सिर ।
कहते हैं इस युग में
दर्द को संवेदना नहीं
अनुभूति नहीं
बिल्कुल जड़ समझो
किसी सड़े हुये सेव की तरह
या गले मे अटकी गोटी की तरह
वस्तु समझो और
गोली खाकर
गोटी को निकाल फेको
गुब्बारा हुये इस पेट का दर्द
लगता है सड़ा हुआ सेव
न्यूटन से पूछ कर
सिर से गिर कर
पेट मे उतर आया
सेव फट कर
ज्यों मिट्टी मे मिला
शुरु हुआ बदन दर्द
आखिर दर्द है क्या
काया से मस्तिष्क तक
न्यूरोन से गुजरती यात्रा ?
न्यूरोन को पकड़ा पर
दर्द कहां पिट पाया?
बिजली को धूल माना
पर दर्द कहां मिट पाया ?
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