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स्वप्निल श्रीवास्तव अपने समय से जुड़ कर लिखने वाले कवियों में
प्रमुख हैं। वे स्मृतियों और भविष्य के बीच एक
ऐसा सन्तुलन बना रहे
हैं जो विचारों से भी कहीं न कहीं जुड़ा है। उनकी कविता में अद्भुत
आशावादिता है, जिन्दगी से जुड़ने की शक्ति है जो "फिर
से शुरु" नामक कविता में साफ दिखाई देती है। आपका पता हैः 510 ,
अवधपुरी कालोनी, अमानी गंज, फैजाबाद (उ. प्र)
224001
चमरौधे के जूते
चमरौधे के जूते इन दिनों
सुदूर देहातों में नही
दिखाई देते
उनका चलन बन्द हो
गया है
उनकी जगह आ गए हैं
कीमती जूते
उनकी कीमत चमरौधे
जूते से कई गुना
अधिक है,
मुझे पिता के चमरौधे
जूते की स्मृति है
वे गाँव से ढाई कोस
दूर मोचियों के गाँव से
लाते थे, चमरौधा जूता
उसमें डालते थे सरसों का तेल
ताकि मुलायम हो जाए
चमरौधे जूते
चलने में कोई परेशानी
न हो,
चमरौधा जूता, पहनने के
शुरु में उन्हे काटता था
वे बताते थे चमरौधा जूता नहीं
मरे जानवर के दाँत
हमे काट रहे हैं
वे चलते थे, भचर भचर
बोलता था जूता
उसकी ध्वनि सुन कर वे
मुस्कुराते थे
धीरे धीरे वे जूते में अपने
पाँव की जगह बना लेते थे
जबसे चमरौधे जूतों का
कारोबार बन्द हुआ
बाजार में आ गए नये
किस्म के जूते, वे चिन्तित
रहने लगे थे,
उन मोचियों के लिए जिनका
कारोबार बन्द हो गया था
पिता जीवित होते तो देखते
आदमी के जूते नहीं पाँव भी
बदल गए हैं .
भोजन
चौके में कुछ भी न बचे
स्त्रियाँ बचा कर रखती हैं
नमक
वे हमारे जीवन के सबसे जरूरी
स्वाद के बारे में बेहतर
जानती हैं
उनकी आँखों में लहराता है,
खारा समन्दर
जहाँ से वे इकट्ठा करती हैं
नमक
यही नमक हमारी धमनियों में
रक्त बन कर दौड़ता है
भोजन का स्वाद फीका होने लगे
तो यह जान लेना चाहिये कि
समुन्दर में गिरने वाली
नदियों की निष्ठा सन्दिग्ध
हो रही है,
चालाक मछुआरे मछलियों
की जगह नमक की
चोर बाजारी कर रहे हैं
चौके में आने वाला है कोई
संकट
कुछ लोग भूखे उठ जाने
वाले हैं
बच्चों की आँख में बढ़
गई है भूख
जैसे स्त्रियाँ बचा कर रखती
हैं नमक
वैसे हमे बचा कर रखना
चाहिए साहस
और बच्चों को समुन्दर
के साथ जिन्दगी के बारे में
तफसील से बताना चाहिए
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