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जिन्दगी से पूरी रह जुड़े मिठाई लाल जब हकीकत से निकल कर कल्पना के
आसमान में छलाँग लगाने की कोशिश करते हैं तो पाते हैं कि उस आसमान
के तो अनेक ठेकेदार हैं जो अपने-अपने हिस्से पर कब्जा जमाए बैठे
हैं, वे अपने परिवेश से ले कर चले थे झउआ भर शब्द और झाड़ी की डाल
डाल में लदी झरबेरी जैसी कच्ची-पक्की, खट्टी मीठी भावनाएँ। वे भूल
गए थे कि शहर का आदमी अब जंगली बेरों का स्वाद ही भूल गया है, राम
के कटघरे में बन्द होने के बाद तो यह और भी मुश्किल हो गया है।
मुझे यही डर है कि मिठाई लाल से "निशान्त" तक की यात्रा में मिठाई
लाल खो ना जाएँ, अभी तो हम उनकी ताजगी भरी कविताओं का आनन्द लेते
हैं।
अतिरिक्त दरवाजे के
बहाने.......
दरवाजे से झाँकती हैं दो लड़कियाँ
यह इस कमरे का अतिरिक्त दरवाजा है
जिससे आता है कमरे में अतिरिक्त प्रकाश
अतिरिक्त आक्सीजन और सब कुछ अतिरिक्त
कमरा सिर्फ एक नहीं है
न ही कमरे में सिर्फ यह दरवाजा है
कई कमरे हैं उस एक बड़े से कमरे के अन्दर
आलमारी में जैसे कई खाने होते हैं
सभी खानों में अलग- अलग दरवाजे होते हैं
एक दरवाजा खुलता है और उसमें
ठीक पिता की तरह मिलता जुलता एक चेहरा
अन्दर आ बैठता
एकदम पिता की तरह
एक दरवाजा खुलता
भाई जैसा एक चेहरा आता और
आकर ऐसे बैठता जैसे बैठता है एक छात्र
अपने पढ़ने के कमरे में
एक दरवाजे से माँ आती
अपनी पुत्री के साथ
माँ की आँखों के नीचे बढ़ रही है काली रेखाएँ धीरे-
धीरे
इन दिनों बढ़ रहीं दोनों लडकियों की तरह
मैं देखता हूँ
इस बड़े कमरे में
कई कमरे हैं
कई खिड़कियाँ हैं
कई दरवाजे हैं
क्या सचमच है कमरे में अतिरिक्त कमरा
जैसे माँ के अतिरिक्त है माँ
पिता के अतिरिक्त पिता
और भाई बहनों के अतिरिक्त भाई बहन
जैसे मैं जानता हूँ
मेरे अन्दर है एक अतिरिक्त लड़का
और उस दरवाजे से झाँकती लड़कियों में
दो अतिरिक्त लड़कियाँ
यह अतिरिक्त दरवाजा अतिरिक्त है
यह आने वाले अतिथियों के लिए बनवाया गया है
और अतिथि हमेशा अतिरिक्त होते हैं
दाल में घी की तरह
तो क्या इस दरवाजे के सामने
जब खड़ी होती हैं लडकियाँ
तो एक के अन्दर अतिथि और
दूसरे के अंदर अतिरिक्त दरवाजा आ जाता है
अपनी पूरी उपस्थिति के साथ
जो मुक्त रहती है उस व्कत
अतिथियो और दरवाजे की तरह
यह आपातकालीन दरवाजा है
जो उनके अपने-अपने आपातकाल में खुलता है
और धीरे-धीरे नहीं
अचानक बन्द होता है जैसे
अचानक आ जाता है तानाशाह
एक पिता के अन्दर
मैं खड़ा हूँ
इस आपातलीन दरवाजे के सामने
बगल में बैठा है छोटा भाई
और दरवाजा है कि आपातकाल की तरह
कभी भी खुल सकता है मेरे सामने॔
कभी भी झाँक सकते हैं उनमें से अतिथियों और
मृत दरवाजों की जिंदा आकृतियों के इतिहास
जिसे बाताया करते थे
भूगोल के शिक्षक, मेरे पिता सरीके इतिहासकार
और कभी मिटाए जा सकते हैं
अतिथियों और अतिरिक्त दरवाजों के इतिहास
इस अतिरिक्त दरवाजे की तरह
इतना तो तय है
एक बड़े कमरे में निहित कई कमरों का मालिक
जानता है
यह अतिरिक्त दरवाजा
जब अतिरिक्त नहीं रहेगा
जिसमें कुछ नहीं होगा अतिरिक्त
न माँ में अतिरिक्त माँ
न इन लड़कियों में अतिरिक्त लड़कियाँ
न इतिहास में अतिरिक्त इतिहास
और मेरे जैसे लडके में
अतिरिक्त लड़का !
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