रति सक्सेना‍

हल्दी में फूल

*
पाँवड़े नहीं बिछाए, बसन्त ने
न ही गीत गाए भौरों ने
बादल कभी नहीं उतरा
जगाने इसे

दबे पाँव चला आया
चोर की भाँति
मुँह पर लगा रक्त पौंछ
सफेद झक कपड़ों में
कैसे खड़ा है तन के

फुसफुसाहटों का शोर‍
एक औषध का खात्मा

हल्दी का फूल !

**

यह उतना ही नाजुक
जितनी कठोर
इसकी जड़े

यह उतना ही सफेद
जितनी पीली
इसकी मूल

फिर कैसे और कहाँ
यह एक कत्ल कर आया

हल्दी का फूल !

***

यह अलग है
और फूलों से

यह अकेला है
ढेर सी पत्तियों में

यह नाजुक
फिर भी कत्ल एक
हो जाता है
इसके जन्म के साथ

***

कत्ल किया नही जाता
कत्ल हो जाता है
सपनों के साथ
हकीकतों का भी

हल्दी के फूल को देखते ही
छिप जाते है कातिलों के चेहरे

***



 


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