सच्चे
जन कवि के सौ साल

वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' जिनको हम बाबा नागार्जुन के नाम से जानते
हैं यदि आज हमारे बीच होते तो सौ साल के होते . इस वर्ष साहित्य जगत
जिन चार कवियों की जन्म शताब्दी मना रहा है उनमें से एक बाबा
नागार्जुन भी है .हिंदी, मैथिली, संस्कृत और बांग्ला भाषा में
काव्य रचना करने वाले बाबा नागार्जुन एक प्रगतिशील यानी प्रखर
राजनीतिक चेतना वाले, आवेगशील घुमंतू स्वभाव के कवि रहे है .हिंदी
के आधुनिक कबीर बाबा नागार्जुन के काव्य की पहुँच किसान की चौपाल से
लेकर काव्य रसिकों की काव्य गोष्ठियों तक है, स्कूल के जमाने में
मैंने इनकी प्रसिद्ध कविता अपनी हिंदी की किताब में पढ़ी थी, जिसमें
इन्होंने अकाल और इसके बाद की परिस्थितियों का वर्णन बहुत
संवेदनशीलता से किया है -
''कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास .
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास .
दाने आये घर के अन्दर कई दिनों के बाद,
धुँआ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद. ..''
प्रख्यात आलोचक रामविलास शर्मा ने बाबा के लिए लिखा है: ''जहाँ मौत
नहीं है ,बुढापा नहीं है .जनता के असंतोष और राज्यसभाई का संतुलन
नहीं है वह कविता है नागार्जुन की.'' बिहार के छोटे से गाँव तरोनी
से अपने जीवन की शुरुआत की और परम्परागत तरीके से ही संस्कृत की
शिक्षा प्राप्त की .इनकी संस्कृत में एक प्रमुख कृति है
'धर्मलोक
शतकम' .बाबा की साहसिक काव्य रचना शैली "प्रभु तुम कर दो वामन होगा
मेरी क्षुधा का अन्त'' में साफ़ झलकती है .
इनके काव्य संसार का बहुत बड़ा भाग अनूठे प्रकृति चित्रों से सजा
है,जिसमें गहरी एन्द्रियता और सूक्ष्म सौन्दर्य-दृष्टि का अहसास
होता है.वर्षा और बादलों पर निराला के बाद संभवत सबसे ज्यादा
इन्होंने ही लिखा है एक और जहाँ यात्री के रूप ''अमल धवल गिरी के
शिखर पर बादलों को घिरते हुए देखा है'' तो दूसरी और किसान की तरह
"धिन धिन धा धमक धमक मेघ बजे'' का गीत मस्त होकर गाते हुए भी .अपनी
पहली भाषा मैथिली में भी वर्षा पर बहुत खूबसूरत गीतों की रचना
इन्होंने की है .बाबा ने प्रकृति को साथ जोड़ते हुए जीवन के हर काले
पक्ष को बहुत ही खूबसूरती से अपने काव्य के द्वारा दर्शाया है अपनी
इस कविता मै इन्होने महंगाई से लेकर सरकारी अध्यादेशो तक की बात को
काले रंग की उपमा से अभिव्यक्त किया -
''काले-काले ऋतु रंग
काली काली घन घटा
काले काले गिरी श्रृंग
काली काली छवि छटा
काले काले परिवेश
काली काली करतूत ...''
कुछ इसी प्रकार से-
''आओ रानी हम, ढोएँगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहरलाल की
रफू करेंगे फटे पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी ''
इन पंक्तियों के साथ बाबा नागार्जुन ने उस समय की अधूरी आजादी पर
ज़ोरदार व्यंग्यात्मक प्रहार किया है .नारी सौन्दर्य पर खुली दृष्टि से, अकुंठ भाव से
इन्होंने लिखा है
हिंदी के शीर्षस्थ आलोचक नामवर सिंह जी ने बाबा के लिए कहा है कि
''जो वस्तु और्रो की संवेदना को अछूती छोड़ जाती है वही नागार्जुन
के कवित्व की रचना भूमि है .नागार्जुन खुद को अपने ऊपर भी कविता
करने से रोक नहीं सके बड़ी ईमानदारी से इन्होंने अपनी
दुर्बलताओं, अपने संदेहों, अपनी व्यथा,अपनी निष्ठा को वाणी दी है .खुद
पर हँसते हुए इन्होंने बेहद मनमोहक तरीके से कहा है" ये बनमानुष ये
सत्तर साला उजबक उमंग में भर सिर के बाल नोंचे" अकेले में बजाये
सीटिया....नागार्जुन ने अपनी कविताओं में इतने प्रयोग किये है कि इन
प्रयोगों ने इनकी कृतियों को कालजयी बना दिया है.इनकी कविताओ मे
खास बात है कि
ये लोकप्रियता और कलात्मक सौंदर्य में पूरी तरह से
संतुलन बनाये रखे है.लोक संस्कृति को बहुत ही करीब से हम इनकी
कविताओं में देख सकते है एक हिंदी भाषी किसान और मजदूर जिस तरह की
भाषा समझ सकता है,बोलता है उसी का निखरा रूप काव्यमय रूप बाबा
नागार्जुन के काव्य संसार मे मौजूद है ......
इसी तरह से इन्होने अपने काव्य में सत्ता की असंवेदनशीलता,
निर्ममता को विद्रोही रूप में रखा है :
''कड़ी हो गई चांप कर कंकालो की हूक
नभ में विपुल विराट सी शासन की बन्दूक
बढ़ी बधिरता दस गुनी बने विनोबा मूक
धन्य धन्य वह ,धन्य वह ,शासन की बन्दूक ...''
इस प्रकार से सच्चे अर्थो में बाबा स्वाधीन भारत के प्रतिनिधि जन
कवि है जिनको जन्मशताब्दी वर्ष में हमारा दिल से सलाम !
प्रस्तुति - सी सुमन
बनस्थली विद्यापीठ
बनस्थली.
निवाई (टोंक) राजस्थान