नीरज दइया की बीस प्रेम कविताएँ


राजकुमारी- 1

वह जा रही थी
अपने घर
बैठ कर रिक्शा में
लगी- राजकुमारी-सी !


मैंने कुछ नहीं किया
मैं जल्दी में था ।
बस खुशी छ्लकी
अपने आप ।


उसने भी
देखा होगा जल्दी में,
मगर किसे-
मुझे या खुशी को ?


राजकुमारी- 2

दोहरी जिंदगी जीने को
श्रापित है राजकुमारी
चलता है निरंतर
उस के भीतर युद्ध


युद्ध-विराम के समय
वह सोचती है-
हाँ यह ठीक है
और जैसे ही आगे बढ़ाती है
दो-चार कदम
रूक जाती है वहीं
सोचते हुए- नहीं,
यह गलत है ।

***
(नीरज दइया की अन्य प्रेम कविताएँ )


रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति


मेरे गाँव की नदी पर पुल


मैं पहाड़ बना एक शहर में मेरे दोस्त
तुम गाँव बने रहे अपने गांव में
इस तरह हम गाँव और शहर के दो दोस्त हुए

वक्त ने हमारे बीच से गुजर जाना मंजूर किया

वह नदी बना और हममें से होकर बहने लगा

मेरे सपने पेड़ बन कर उग आए
वक्त की नदी पर सपनों ने झाड़ फैलाए
किनारों को छाँव दी और फल गिराए

मेरे विचारों ने दूब का रूप धर लिया
मेरी शुभकामनाएँ फूल बन गईं

अपनी गलियों को छोड़ते हुए शहर आ गया
नदी बह कर सूख चुकी थी और
गाँव उसके किनारों पर नहीं ठहरा
पहाड़ में से एक सड़क गुजर गई
और नदी पर पुल बन गया

आज मैं महसूस करता हूं कि मैं पहाड़ हूँ
अपनी नदी में देखता हूँ चेहरा

नदी सूख चुकी है-
पुल भी मेरे कंधों तक ऊँचा बना है

(रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति की अन्य कविताएँ )


शैलेन्द्र चौहान


प्रणय रत

मांडव के महलों जैसे
क्षत
ये कल्प वृक्ष

कब
कहाँ
कौन रहा होगा

वर्जिश
मालिश
रूमान

उकाबों के पंख झड़ते
प्रेम के अनन्य
अबूझ प्रतीकों से

अवर्णनीय रूप
रूपमती का
कहाँ-कहाँ से
प्रत्यावर्तित हो
झाँकता
कितने आइनों में

जहाज महल
उजाली बावड़ी
छप्पन महल
बाज बहादुर के
महलों से
चमकता

सहलाता
हजारों दर्शकों के
तृषित मन

(शैलेन्द्र चौहान की अन्य कविताएँ)


मनीषा कुलश्रेष्ठ

सादा दिल औरत के
जटिल सपने

लोग कहते थे वह एक सादा दिल
भावुक औरत थी
मिजाज - लहजे
ढब और चाल से
रफ्तार-ओ-गुफ्तार से

उसकी रेल अकसर सपनों में
छूट जाया करती थी
अकसर वीरान स्टेशनों पर
सपनों में वह खुद को अकेला पाती
उसके सपनों में
कोलाज जैसे कुछ चेहरे थे
अजनबी शहरों का रास्ता दिखाते
भीतर दबे शहरों का
माकूल - सा पता बताते

उसके सपनों में सैलाब थे
भंवर के बीच खिलते कमल थे
एम्फीथियेटरों में भटकती
वह उनके गलियारों में नाचती थी
न जाने कौन से अनजाने दृश्य जीती
और
सम्वाद दोहराया करती थी
वह उड़ती थी सपनों में
नीली मीनारों की ऊँचाइयों से
कूद कर
हवा में ही गुम हो कर

घबरा कर
रोज सुबह
वह पलटा करती थी पन्ने
सपनों का अर्थ जानने वाली किताबों के
सपने जो उसे
बिला नागा हर रात आते
सपने जो दुर्लभ थे
वे और उनके अर्थ वहाँ नहीं मिलते थे
किसी ने कहा था लिखना खुल कर
अपने सपनों के बारे में देर रात तक
जागना चाय के प्याले, कलम और
कागज़ के साथ
फिर कहा -
रख देना
मेज पर इन कागजों को खुला
फड़फ़ड़ाने देना पाँच घण्टों तक

वह लिख देती सपने कागजों पर
छोड देती फड़फ़ड़ाता
कुछ ही घण्टों में
उनके रंग और अर्थ बदल जाते
तब वह गुमसुम हो जाया करती
बन्द कर देती
एम्फीथियेटरों के विशाल दरवाजे
उतर आती नीली मीनारों से
और लौट जाती
अपनी सादा सी दुनिया में
दिन भर.
 
(मनीषा कुलश्रेष्ठ की अन्य कविताएँ)


शेखर मल्लिक


बेटियां

कभी-कभी बेटियाँ
बाप की दुलारी होती हैं,
उनका गुरूर होती हैं...
और ज्यादातर...
उनकी मालिकाना जागीर...
मोहर लगा पट्टा...

बेटियाँ स्वेच्छा से देती हैं
बाप को
अपना दुलार, लाड
अपनी ताकत,
अपनी चिंताएँ
ढेर सारा मान और आदर...

मगर,
ये जानते हुए भी बहुत भोली होती हैं
बेटियाँ
कि बाप की गहरी तिजोरियों में
संस्कारों के फीते से बंधी हैं
उनकी मुस्कानें...
उनकी जिद...
इच्छाएँ...
फैसले...
जिंदगानी..

बाप के दालान पर
मसाले पिसती
झाड़ू लगाती
कपडे फींचती
क्यारिओं में पानी देती
और हमजोलियों से गप्पे हाँकती
हथेलियों पर मेहँदी खिलाती...
बुजुर्गों पर अरमान न्यौछावर करतीं...
किताब-कापी, सपनों संग क्षण-क्षण
बड़ी होती बेटियाँ
ज्यादातर चुप ही रहती हैं...

क्योंकि जब वह बोलकर
जताने लगती है
अपने इंसान होने का हक़...
माँग बैठती है,
अपने रजस्वला होने के
बाद की नैसर्गिक आज़ादी...
और अपने मन के गांठों और तंतुओं को
चेतना के नाखूनों से कुरेद कर
खोलने का यत्न करती है...
बेटियाँ इसके बाद
केवल एक विपरीत लिंगी देह भर
रह जाती हैं...
बाप और बाप जैसों के लिए
सिर्फ़ प्रतिशोध की
उत्प्रेरणा में तब्दील...



(शेखर मल्लिक की अन्य कविताएँ)


सी. सुमन

1
माँ कहती थी
किसी का भरोसा ना बन सके
तो वफ़ा की उम्मीद भी ना करना
माँ कहती थी
चाहे फूलों को दामन में
तो काँटों का हार किसी को ना देना .
माँ कहती थी
मुश्किल राहों को करना हो आसां
तो दर्द किसी को ना देना .
माँ कहती थी
.................................

माँ कहती थी
शाम होते ही घर लौट आना
बाहर दरिंदगी बहुत है
दिन में अपनों का चेहरा
पहचान नहीं पाते हैं
तो रात का एतबार कैसे करे .
..........................................

माँ कहती थी
अपनों के बीच जब पराया महसूस करो
भीड़ में रह कर भी अकेला हो
तो सजदे में चले जाना उसके
सुकून होगा शांति होगी
वो तेरा अपना होगा .
.......................................

माँ कहती थी
याद आये कभी मेरी
जाने के बाद
जीना मुश्किल लगे या
उठ जाये कभी किसी से एतबार
लेना हो जिंदगी में किसी फैसले का जवाब
तो बक्से में बंद एल्बम से वो तस्वीर निकालना
जिसमे ऊँगली पकड़ चलाया था तुझे पहली बार .


अवतार एंगिल की पंजाबी कविता

ब्रह्मपुत्र दक्ष

मेरी इच्छाएँ मेरी कन्याएँ हैं

मेरी कन्याएं - मेरी इच्छाएँ हैं

पुत्रहीन पिता

पुत्र सृष्टि के रचयिता का

बाँटता है

रंगों की आलोकिक रेखाएं:

काम को: रति

भृगु को : ख्याति

शिव को: सती

कैसी है ये विडंबना

कि रचनाओं का रचयिता

घृणा कुचक्रों घिरा भी

बाँटता है, समता से

अपना प्रसाद :

क्या अत्रि/ क्या चंद्रमा/ क्या कश्यप/ क्या धर्म/ क्या नाग

पुरस्कृत हैं जिसकी रक्त- बूंदों से

वही दक्ष, ब्रह्मपुत्र दक्ष

पुत्र प्रसाद से वंचित

इच्छाओं का दुःख लिए

बार-बार हारता है :

पत्नी प्रसूति से

पुत्री सती से

पुत्री के पति से

धड़ पर बकरे का सर लिए

करता है : प्रजनन.

{दक्ष की पुत्री सती, शिव की पत्नी थी. एक बार ब्रह्मा द्वारा दिए गए भोज में

दक्ष देरी से पहुंचे. सभी ने उठ कर सम्मान किया, परन्तु उनके जमाता शिव बैठे

रहे. इसलिए जब दक्ष ने यज्ञ किया तो भगवान शिव को आमंत्रित न किया. पत्नी सती

से पति का अपमान सहन न हुआ.उसने योग की अग्नि में समाधि ले कर अपने आप तो भस्म

कर लिया. शिव ने कुपित होकर दक्ष का सर काट दिया. परन्तु स्तुति के बाद उनके

सर पर लगाने के लिए बकरे का धड़ ही मिला.

ये कविता दक्ष के दुःख को प्रस्तुत्त करती है, क्योंके उनके केवल बेटियाँ ही

हैं.

(अवतार जी पंजाबी के कवि है, आपकी कविता में समकालीन सामाजिक समस्या को पौराणिक कथाओं के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए बिम्बों को गहन बनाया है। )


 


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