मेरी इच्छाएँ मेरी
कन्याएँ हैं
मेरी कन्याएं - मेरी
इच्छाएँ हैं
पुत्रहीन पिता
पुत्र सृष्टि के
रचयिता का
बाँटता है
रंगों की आलोकिक
रेखाएं:
काम को: रति
भृगु को : ख्याति
शिव को: सती
कैसी है ये विडंबना
कि रचनाओं का रचयिता
घृणा कुचक्रों
घिरा भी
बाँटता है,
समता से
अपना प्रसाद :
क्या अत्रि/ क्या
चंद्रमा/ क्या कश्यप/ क्या धर्म/ क्या नाग
पुरस्कृत हैं जिसकी
रक्त- बूंदों से
वही दक्ष,
ब्रह्मपुत्र दक्ष
पुत्र प्रसाद से
वंचित
इच्छाओं का दुःख लिए
बार-बार हारता है :
पत्नी प्रसूति से
पुत्री सती से
पुत्री के पति से
धड़ पर बकरे का सर
लिए
करता है : प्रजनन.
{दक्ष
की पुत्री सती,
शिव की पत्नी थी. एक
बार ब्रह्मा द्वारा दिए गए भोज में
दक्ष देरी से पहुंचे.
सभी ने उठ कर सम्मान किया,
परन्तु उनके जमाता
शिव बैठे
रहे. इसलिए जब दक्ष
ने यज्ञ किया तो भगवान शिव को आमंत्रित न किया. पत्नी सती
से पति का अपमान सहन
न हुआ.उसने योग की अग्नि में समाधि ले कर अपने आप तो भस्म
कर लिया. शिव ने
कुपित होकर दक्ष का सर काट दिया. परन्तु स्तुति के बाद उनके
सर पर लगाने के लिए
बकरे का धड़ ही मिला.
ये कविता दक्ष के
दुःख को प्रस्तुत्त करती है,
क्योंके उनके केवल
बेटियाँ ही