शैलेन्द्र चौहान

कविता को समकालीन समय से जोड़ना जितना दूभर होता जा रहा है, उसके लिए नए आयाम खोलना उससे भी ज्यादा। शैलेन्द्र की कविता को मुद्दे तलाशने नहीं पड़ते, वे स्वयं ही उसके पास खुद-- खुद चले आते हैं, बिल्कुल आसपास की जिन्दगी से।

शैलेन्द्र की जिन्दगी से जोड़ती ये कविताएँ अपने समय के महत्वपूर्ण सवालों को उठाती हैं।

फफूंद

बगीचे में बचे
सूखे ठूंठ
और
गर्म दोपहर के
बीच विद्यमान
बीता समय

कोई कौंध
धीरे-धीरे थमती

मिमियाते बकरों की
नियति जैसे
फूलों के खिलने का
अन-जिया वक़्त
शहतीर सा चुभता मन में

कहाँ रह गया मैं ?
फिल्मी अवार्ड
फैशन परेडों तक
पसरी लालामी में
मेरे भोग और
वासना का प्रतिफलन नहीं


सूखे हुए ठूँठ
और उड़ती धूल के बीच
उगी कौंपल

वह
मृत जैविक अंगार पर
जमी भूरी फंगस
ही रही बस

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सम्मोहन

प्रसिद्धि के
रॉबिनहुड घोड़े का
जिक्र यूँ

बीमार हों या
आयकर का नोटिस
मिला हो
दुआओं में उठने लगते हाथ
करोड़ों

हमारा सुख
हमारा दुख
माचिस की तीली से
कान खुजाने जैसे
आनंद सा
संदर्भच्युत

पुराने लकड़ी के
संदूक में
उत्तरोत्तर पीले होते
पन्नों वाली
कोई किताब
होती धूमिल
दैवीय आनंद बिखेरती
असुध

भानुमती के कुनबे से
सरकता साँप
आस्तीनों में घुस जाता
चुपचाप

सराहना में जन
खो जाते
अपने
आप
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महाकाल

थका-थका जिस्म
बुझा चेहरा
आसमान से उतरते देवदूत
को भासता
भूमि पुत्र

निरभ्र आसमान
निष्क्रिय हवा
विचारमग्न, निराश
बैठा मोहन

संस्कृति
के मिथक
महाकाल की
महती माया
ले उड़ी
मन प्राण

अनंत यम
महाकाल के
हवन कुंड में
पंख हिलाते
गिद्धों और
काले कौओं से

ब्रह्मराक्षसों
की विकट सनातनी माया
आचमन कराती
रोज
लाखों
श्रद्धालुओं को

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आदि-वासी

स्नायुतंत्र में
प्रविष्ट हो चुकी
शोधित वायु

मस्तिष्क, धमनियाँ
शिराएँ, कोशिकाएँ
सचेत

चौतरफा चिल्ल-पों
जर्जर होते ही शरीर
फूल गया
गुब्बारे सा
हीलियम नहीं

भरी
कार्बन डाइ ऑक्साइड

तड़कता हाड़-माँस
भयानक पीड़ा मन में
अच्छी सेहत को
दरकार संसाधन,

औषधि
अति महंगी

कपूर और लौंग बाँध
हाथों में
दूर भगाते
चिकनगुन्या,
मलेरिया, डेंगू

विपन्न भील
मालवा, निमाड़ के

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बेचारगी

लटका है पेड़ से
बेताल

नहीं इच्छा अब उसकी
कुछ भी
पूछने की
विक्रमादित्य से

इतना सताने का
फायदा क्या
निरंतर, निरापद विमर्ष
सत्ता और विपक्ष में

वैश्वीकरण की
अपरिहार्यता और
विक्रम की बेचारगी
बेताल की समझ से
आगे की बात नहीं

दक्षिण-पश्चिम
उत्तर-पूर्व
हैदराबाद, चेन्नई, बैंगलोर,
पुणे, मुंबई, कोलकाता
से सिंगूर, नंदीग्राम तक

बिखर गया
टुकड़े-टुकड़े हो
बेताल का सर

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अठारह सौ सत्तावन

एक

कौन हैं ये विद्वतजन
वर्तमान में
गिरहकट या लुटेरे
इन्हें क्या काम तुमसे ?

तुम्हारी जेब में
मुद्राएँ तो हैं नहीं
क्या ?
अर्जुन के तीर पर
बिंधी हैं मुद्राएँ

इसलिए
खोद रहे
गड़े मुर्दे
मंगल पांडे, लक्ष्मी
तात्या, अजीमुल्लाह

पांडे !
वह अदना सिपाही
रानी !
विधवा स्त्री
तात्या !
दास पुत्र
और म्लेच्छ
अजीमुल्लाह

इतने भर से
नहीं चैन
इतिहास के वे कुपात्र
अस्पृश्य, शूद्र
मातादीन भंगी,
महावीरी, पूरन कोरी,
झलकारी बाई
कौन थे ये सब ?

इतिहास को कर
गड्ड-मड्ड
विलुप्त हो गये
अठारह सौ सत्तावन
के भूत
किसको याद अब
कौन झांकता अतीत में

नहीं यह
गीता, कुरान या
बाइबल का उपदेश
झुनझुना
बर्गर, पीज़ा, सिज़लर

मनोरंजन भी नहीं वह
भूमंडलीकृत तिजारत
बाजार, सूचनातंत्र,
सनसनीखेज समाचार
कुछ भी तो नहीं

नई पीढी और
आज के जनमानस से
क्या साम्य
अठारह सौ सत्तावन का ?

एक शगूफा नहीं
तो और क्या !
अवसरवाद, आयोजन धर्मिता
और कमाई का
स्रोत नहीं
अठारह सौ सत्तावन

दो

बस करो
बस भी करो
कुछ मुद्राओं और
थोड़ी सी प्रसिद्धि के लिए
उपहास न करो
उस महान भावना का
जो मुक्ति की चाह में
स्वत:स्फूर्त थी जन्मी

देखो आज जो सूर्य
पश्चिम से उगा है
कहाँ दर्ज है उसपर
अठारह सौ सत्तावन

जैसे कि चाँद में
दिखती एक
सूत कातती वृद्धा
सदियों से

मिथ

मेहनत से होता शरीर
और मजबूत
कैसी भी रहे काठी किसान की
उसमें शक्ति और स्फूर्ति
रहेगी भरपूर

श्रमिक काया
होगी बलिष्ठ, मजबूत
पत्थर सी

जिम, अखाड़े और
खेल के मैदान
इसीलिए तो
नहीं बनाए जाते
गाँव-देहात,
श्रमिक,
गरीब बस्तियों में

सूखे मेवे, फल, दूध
मांस, मछली अंडे
शक्तिवर्धक पेय
जरूरी नहीं
उनके लिए

जड़ी-बूटियाँ
मिल जाती मुफ्त
जंगलों में
शरीर उनका हाड़-मांस का नहीं
पत्थर का होता है

खाने को ना मिले कुछ भी
तब भी रहते स्वस्थ

आदिवासी इलाकों में
हाट के दिन
मरियल, तेजहीन, बीमार
चेहरों वाली अनेकों
मनुष्याकृतियाँ
टहलतीं

मेहनती वे शरीर
गैस, एसिड़िटी, जोड़ों के दर्द,
बुखार, ल्युकेमिया,
इन्सोम्निया से पीड़ित
तीस-पैंतीस की उम्र में
लगते बूढे

बिरसा मुंडा
और टंटा भील के
अभागे बहादुर वारिस
खरीदते हाट से
प्लास्टिक की सस्ती
चप्पलें, खराब अनाज,
पके हुए केले,
बीड़ियाँ और तंबाखू

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कैसा नखलिस्तान !

सारा पानी
खंभात की खाड़ी में बह जाये
उससे बेहतर
बने उँचा बाँध
केवड़िया गाँव के पास

दिखेगा नीला, गहरा
ठहरा-ठहरा पानी
पहुँचेगी नहर
कच्छ के रन तक
बदल जायेगा
थार का रेगिस्तान
हरे-भरे नखलिस्तान में

विद्युत धारा
जायेगी
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र
गुजरात
पर्यटनस्थल
सरदार सरोवर
हरी-भरी
वादियों में
सतपुड़ा की

डूब की परिधि में
साढे छह हजार गाँव
अड़तालीस हजार ग्रामवासी
हैं जो
उनका क्या ?

पुनर्वसन में लपकती
लोभ की लंबी जिह्वाएँ
चमकती लालच की सहस्त्रों शहतीरें
मिटा देतीं फर्क
इंसान और
श्रगाल, गिद्ध, भेड़ियों में

दरकता है सरदार सरोवर
लपकती मगरमच्छों सी
राजनीति
बेदखल नागरिकों की
गरदनें दबोचने को

शेयर-खान

बेहद गर्व की बात है
झोंपड़ी में रहनेवालों ने
बेच बर्तन भांडे,
गिरवी रख खेत-मकान

लगा दिए पैसे
रिलायंस इनर्जी के
आई पी ओ में

अब इससे ज्यादा विकास
क्या होगा इस देश का
इससे ज्यादा क्या जागरूकता
और शाइनिंग

रूबरू हैं शेयर बाजार से
अमीर, गरीब एक साथ
साढे सात लाख करोड़
रुपयों की उगाही
यह है चरम विकास

लाटरी वाले, सटोरिये,
केसिनो और जुआरी
हैं स्तंभित
चौंक कर हड़बड़ा रहे हैं
कहीं उनका भविष्य
अंधकार में तो नहीं

ये जो दसियों करोड़
गरीब हैं
ये अपनी मेहनत की कमाई
दाँव पर लगाकर
रगड़ रहे हैं अपने हाथ

भारत बनेगा बड़ी
आर्थिक शक्ति
बड़ा ग्लोबल मार्केट
नरकंकालों का
भारी जखीरा

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काठ का घोड़ा


कौन सी प्रतियोगिता
क्या तो है खेल
क्रिकेट, कबड्डी, कुश्ती
अंताक्षरी
या
तीतरों की लड़ाई

खैर जाने दीजिए
चलिए
मान यह एक युद्ध है
अमेरिका-ईराक
भारत-पाकिस्तान का नहीं
लोकतंत्र में है मतदान

तब और बात थी
जब बरुआ जी ने कहा था
इंदिरा इज इंडिया
बेचारे देवकांत बरुआ
चाह कर भी
नहीं
कह सके
बरुआ इज इंडिया

यहाँ
हर दीवार, हर विज्ञापन
हर पोस्टर
कह रहा है
जीतेगा गुजरात

किससे जीतेगा ?
महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश,
राजस्थान से,
शेष भारत से !

कौन जीत रहा यहाँ
मतदाता, नागरिक, समाज,
संस्कृति ?

हर बार हारते हैं वे तो
राजनीतिक
चकमेबाजी में

जो जीता
वह गुजरात पर था सवार

और गुजरात !
दुलत्ती झाड़नेवाला नहीं
एक काठ का
घोड़ा था ।


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