शेखर मल्लिक

शेखर मल्लिक युवा कवि हैं , उनकी कविता एक अलग शिल्प की रचना करते हुए समकालीन सन्दर्भों को विशेष निगाह से देखती है। अच्छी बात यह है कि वे अलग संरचना प्रक्रिया जो गुजर रहे हैं, जो उन्हें अपनी पहचान बनाने में मदद दे रही है।

मेरे हिस्से की धूप

मेरे हिस्से की धूप
मेरे हिस्से की साँसें
मेरे हिस्से की मुस्कान
मुझे इनके वास्ते
जिंदगी पर दावा ठोंकने की
जरूरत क्यों पड़ी ?

ये तो मेरे हैं...

मगर मैंने पाया
मेरे हिस्से की कविता
कोई और गा रहा है...
मेरे हिस्से की खुशियाँ
कोई और जी रहा है
मेरे हिस्से का पानी
कोई और पी रहा है...
मेरे हिस्से की लड़ाई
कोई और तय कर रहा है...

इसी तरह
कुछ अनिवार्य अधिकार
मीठी भाषा में छीन लिए जाते हैं
और कानों-कान खबर नहीं होती...
एक भ्रम के बादल के ठीक नीचे
हम-तुम सूखे छोड़ दिए जाते हैं...

मैंने मेहनतकशों को देखा...

मैंने मेहनतकशों को देखा...
आज "निराला" की नज़र से...
चढ़ती जून की गर्म दोपहरी थी...
मार उमस भरी
पसीने की बास से बोझिल...
चलाते कुदाली-फावड़े...
श्रम से चूर...
पर नहीं होते या ही दिखते श्लथ !

फिर जैसे हुआ मध्यावकाश...
सुस्ताते खाकर रोटी-भात... नमकीन...
बात एक गजब थी --
सबकी सब्जी सबसे साझा होती...
एक सा स्वाद उनके रिश्ते का
मुँह पर खिलता जाता...

मेहनत की बास छूटती हवा में...
मटियाली धूप में
चमकती उनकी
काली-काली पीठ...
देखी...और....
सुनी...
उनकी मातृभाषा में
सामूहिक खिलखिलाहटें...
गप्पें...
धुंधले दिन के तार पर तनी हुईं...
*


वो कैद है वहाँ

सलाखों के पीछे से,
दो चमकती हुई
उजली हथेलियाँ ही दिखती हैं मुझे
इशारा करते -
कि मैं हूँ यहाँ
अभी सुरक्षित
और जीवित
मैं उन हथेलियों के पीछे
अंधकार में डूबे
उसके चेहरे का अनुमान कर
मानस में उभार लेता हूँ...
कुछ आश्वस्त हो जाता हूँ.

वो वन्दिनी है वहाँ
सिर्फ़ इतने ही के लिए
कि उसने अपनी नैसर्गिकतावश
प्रेम किया
कि उसने स्वीकार भी किया
कि मैंने प्रेम किया है...!
और अब वो वहाँ कैद है...

दुःख सिर्फ़ इतना ही नहीं कि
'सभ्य' समाज में प्रेम जैसे शाश्वत गुनाह की
उसे सजा मिली
दुःख तो इसका ज्यादा है कि
उसे रौशनी से काट कर
अंधेरों में फेंक दिया गया है...
किताबें होतीं, कॉलेज कैम्पस होता,
जहाँ आज़ाद हवा होती,
उस दुनिया से उसे उखाड़ दिया गया है...
वह इतनी सी उम्र में ही चूल्हे-चौके के साथ
घरेलू हो गई है...
यदि वह चेतना का उजास पा जाती
तोड़ देती दीवारें, बेडियाँ काट डालती...
इसलिए उसे
अंधकार में कैद किया गया है...

सलाखों वाली खिड़की के पीछे से,
मैं जानता हूँ,
मुझे देखकर उसे
थोड़ा संतोष होता होगा
एक क्षण बहल जाता होगा उसका मन
फिर जिस्म उसका काँपता होगा
मन से अधिक
मेरी तरफ़ आ जाने को
छटपटाता होगा...
सलाखों के पीछे से
मेरी ओर
उन फैली हुई बाजुओं की जुम्बिश
मुझे बेतरह बेचैन कर देती है...

वो कैद है वहाँ,
जहाँ विरोध कर बच निकलने की
कोई गुंजाईश नहीं
चुपचाप सीने के मरोड़ को
ओंठ भींच कर दबाते रहना है...
प्रगति की कोई लौ तक
उस खोह में नहीं टिमटिमाती...
जहाँ चूल्हा-चौका, हांड़ी-पतीला, ख़सम-बच्चा
सिर्फ इतनी ही चर्चा,
इतने ही फलसफ़े...
औरत की जिंदगी के
सारे परम्परागत 'धरम-करम'
बांचे जाते हैं.
और इस तरह
उसे हजारों सालों पीछे
धकेल कर रखा जाता है...

मैं जानता हूँ वह
इस सबके बीच
कई बार मुक्ति के लिए सोचती होगी
बार-बार उसकी प्राथनाएँ बाँझ बन जाती होंगी
कंटीली हदबंदियों से टकराकर रह जाती होंगी
बेबस...असफल...
रोज सुबह वह यदि सोचे भी कि
किताब-कलम उठाना है
उठाती वह झाड़ू ही है...
और पूरे दमखम से मकान को बुहारने
लगती है...
भोर से देर रात तक पहरे में
तानों और हुक्मों से छीजती
मेहनकश दिनचर्या निपटाती है...

सलाखों के पीछे वाली लड़की में
बहुत सी संभावनाएँ थीं
अब उनके अवशेष ही बचे हों,
ये संभावना भी क्षीण है...


 शिकारगाह


एक खूबसूरत शिकारगाह है यहाँ
दुनिया...

लहू और मांस के लोथड़ों से
पटे हर मंज़र में,
घुटी हुई चीखों की ढेरों प्रतिध्वनियाँ हैं...

आसमान पर टंगी है,
कत्लों के वक्त इस्तेमाल हुई कटारें...
इनमें किसी एक से
रेता गया था मेरा गला
जैसे औरों के भी रेते गए हैं...

मैं तब
एक देह के भीतर कैद आवाज़ था
और क़त्ल हुआ उस देह का...

मैं सड़क पर, नुक्कड़ या चौराहे पर...
घर में, या गली में...
बाज़ार में, मजार पर
कहीं भी हो सकता था,
कत्ल
और अंततः हुआ

शिकारगाह में कत्ल किया जाना
शिकारी की हुनरमंदी का
नमूना होता है...

इसलिए
डंका बज रहा है...
प्रशस्तियाँ गायीं जा रही हैं...
जिन्होंने मेरा और
मेरे जैसों का
कत्ल किया है...
उनका
संसद में,
सिनेमा में,
सभाओं में,
सम्मेलनों में...

मैं उन सभी लोगों की तरह
देह था...
आवाज़ था...
सो शिकार के योग्य था
मारा गया हूँ

शोर से
ख़ामोशी में
तब्दील हुआ हूँ
शिकारियों को ये ही पसंद है...

शिकारगाह में मेरी
बदसूरत लोथ पड़ी है
और शिकारियों की टोली
करके हूँ-हूँ, हो-हो..
जश्न मनाने की तैयारी कर रही है...

भाषा

एक भाषा,
जिसमें आम आदमी
दाल-रोटी खाता है
और जिस भाषा को बाजार का
सबसे धारदार हथियार बना दिया जाता है...
नृशंस समय का
यथार्थ भी
उसी भाषा में दर्ज किया जाता होता है...
इतिहास सटीक समय पर
उसका निरपेक्ष वक्तव्य देगा
बर्बर समय का एक पुख्ता
सत्य होता है
इतिहास उसे नहीं नकारता
और ना ही छुपा पाता है...
अत्याचार, व्याभिचार के फर्माबदारों से
अपील है कि
कृपया ध्यान दें...
आने वाले समय की स्लेट पर
इन गृहीत तथ्यों की परछाइयाँ
बेबाक उभारने के वास्ते
भाषा
तुम्हारे अनाचार के
सभी ब्यौरे इकठ्ठे
कर रही है...
२६.०५.२०१०

 


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