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कुमार
अंबुज
कुछ शहरों को याद करते हुये
अब रातें अपना काम करेंगी
झरनों की तरह मेरे ऊपर गिरेंगी
और मुझे भटकायेंगी जैसे बतायेंगी
कि यह शहर तुम्हारे लिये नया है
कभी -कभी नीम या पीपल दिखेगा दिलासा
देता
फिर गलियाँ धीरे-धीरे मुझे अपनायेंगी
कहीं कोई झील, घाटियाँ, पुल,
कोलाहल से भरे चैरस्ते और उदासी
झाड़ियाँ, मैदान, एक तरफ खिले हुये फूल
गिरती ओस और टूटती पत्तियाँ
हर शहर में एक स्त्री का स्थापत्य छिपा है
इधर इस साँवली सड़क का मैं क्या करूँ
जिसने मुझे बाँहों में भर लिया है
तारों की परछाइयाँ मुझ पर सुलगती गिर रही हैं
मेरे माथे पर उनके चुंबनों की बौछार है
जिनकी चमक झील में गिरकर उछलती है
छूटता ही नहीं शहरों से मेरा प्रेम
उनके भीतर से उठती है मारक पुकार
वही है जो बार-बार मुझे उनकी तरफ लिवाये जाती है
और उन्हें किसी मादक प्रेम की तरह
यादगार बनाती है।
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अभिजनतंत्र

तीन -चार जन गपशप करते हैं
तुम देखते हो यकायक उनमें से एक
बातचीत पर नियंत्रण करना चाहता है
हजारों की भीड़ है
एक आदमी मंच पर चढ़ता है
हाथ उठाकर कहता है यहाँ मेरा खेल जारी है
और स्मारक भी यहीं बनेगा
तुम देखते हो जहाँ भी लोग इकट्ठा होते हैं
अचानक उनमें से ही कोई उभरता है
और दृश्य को हथियाने लगता है
तेज हार्न बजातीं, वर्दियों से लदी गाड़ियाँ
सड़कों पर घबराहट फैलाती भागती हैं
तुम देखते हो खून के धब्बे
चश्मों के फ्रेम, बिखरे हुये जूते चप्पलें
उसी वक्त हाफ स्लीव चेक की शर्ट पहने
एक सुदर्शन सा व्यक्ति जीप में आता है
चीजों को फिर से नियंत्रण में लेता है
तुम देखते हो, सिर्फ देखते हो।
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रोज़गार करते हुए
मैंने फेंक दिया है अपना वायलिन
अब मैं निहत्था हूँ
फेंक दी हैं पतवारें
लहरें मुझे कहीं भी ले जा सकती हैं
दूर कहीं से उठती है पुकार
एक चीख, एक आलाप, एक तान
लेकिन बहुत दूर तक आ चुका हूँ मैं
यही आसान था
यहीं सुरक्षित हूँ
आपके लिये भरोसेमंद औजार हूँ
इन सपनों में खिलते हैं फूल
महकती है रातरानी
उतरती है धमनियों में सिम्फनी
दिखता है सितारों की परछाईं से भरा तालाब
फिर ढलती रात में अचानक
सुनाई पड़ती है दरवाजे पर धीमी दस्तक
मैं उठकर खोलता हूँ दरवाजा
और मेरा हमशक्ल मुझे गोली मार देता है।
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कवि का पता

मेरा पता चट्टान से पूछो
वह अविचल धूप सोखती रहेगी
या पीती रहेगी अंधकार
तुम जो इतनी दूर से देखते हो
तुम जो इतनी ऊँचाई पर हो
किस तरह पाओगे मेरा पता
इतनी दूरी से इतनी ऊँचाई से
मैं एक चींटी हूँ कोई भुनगा
या धब्बे जैसा कुछ
मुझे छूकर देखो
तो देख सकते हो मेरे रोमों का उठना
मेरी पलकों पर जमा धूल
माथे पर चमकती चाँदनी
समुद्र है अपने ज्वार में उमड़ता
जिसे तुम छोटी -सी डोंगी में बैठकर
पार कर सकते हो
यह मेरा अरण्य है जिसमें
तुम फिर हो सकते हो आदिम
तुम चकित नहीं हो पाते
और जानना चाहते हो कवि का ठिकाना
पूछते हो किसी कठोर हृदय से मेरा पता
और गिरते चले जाते हो अपरिचय की घाटी में।
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ऐसे वक्त में
मैं यहीं था और दृश्य गायब होते रहे
वह पोखर भी नहीं रहा
जिसमें जमा बारिश के पानी में
फरवरी तक तारे चमकते थे
जिसमें बलशाली और निर्बल
दोनों के चेहरे दिखते थे
मैं यहीं था और लोग मारे जाते रहे
पहले वे अन्यायी के कब्जे में रहे
और उसे मालिक कहते रहे
वे रोते थे और सिर झुकाकर
बुदबुदाते रहे हमारे लिये यही
जीवन है
अगले दृश्य में वे आसमान को दोष देते
और जबावदारों को बरी करते थे
मैं यहीं था और फूलों की, बच्चों की
चिड़ियों की प्रजातियाँ खतम हो रहीं थीं
लोगों में से गायब हो रही थी निराशा
उनकी चीख, उनका संताप गायब हो रहा था
उनके पास केवल जल्दबाजी बची हुयी थी
और वे किसी भी तरह भागते हुये
चलती गाडी के पायदान पर लटक जाना चाहते थे
ऐसे वक्त में मुझे निराश होने दो
इससे भी उम्मीद पैदा होती है।
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प्रार्थना
एक शरण -स्थली
संभव अपराध से पहले
या अपराध के बाद।
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अकेले का विरोध
मैं बहुत छोटा -सा कंकड़ हूँ
तुम्हारे पाँव में गड़ता हूँ
तुम्हारी नींद में विघ्न पहुँचाता
एक छोटा -सा विचार हूँ
तुम मुझे मच्छर कहते हो
इस तरह तुम मुझ पर ध्यान देते हो
तुम्हारी चमकदार भाषा में एक शब्द हूँ
जिस पर तुम हकलाते हो
तुम्हारे रास्ते में एक गढ्ढा हूँ
एक छोटा -सा अवरोध
तुम्हारी रफ्तार के लिए दहशत हूँ
तुम्हारे लिए बेचैनी हूँ एक खटका हूँ
अकेला हूँ लेकिन इतिहास हूँ
शिलालेख हूँ , दंतकथा हूँ
तुम्हें विचलित करता हुआ
इसी विराट जनसमूह में हूँ
तुमने सितारों को जीत लिया है
आभूषणों , गुलामों, मूर्तियों
और खण्डहरों को जीत लिया है
तुम्हारा अश्व लौट रहा है हिनहिनाता
इस वक्त यह छोटी -सी बात उल्लेखनीय है
कि यहाँ कम से कम एक आदमी है
जो अकेला है लेकिन तुम्हारे विरोध में है
तुम्हारे लिए यह इतना जानलेवा है
इतना भयानक कि एक दिन तुम उसे
मार डालने का विचार करते हो
लेकिन वह तो कंकड़ है , गढ्ढा है
एक शब्द है, दंतकथा है।
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स्थानापन्न नहीं
इस महाजीवन का एक ज़रूरी अवयव हूँ
समूह में हूँ तो समूह की चमक हूँ
किसी का स्थानापन्न नहीं
मंै सामने खड़े पेड़ की जगह नहीं ले सकता
न चित्र की न चित्रकार की
न हवा की जगह
जो एक दिन मेरी जगह में आकर रह सकती है
मेरी जगह नहीं ले सकती
एक फूल भी दूसरे फूल की जगह नहीं लेता
जुडँवा में से भी हर एक अद्वितीय है
जो कुचला गया उसका स्थानापन्न भी कोई नहीं
जो सच था उसकी जगह जो है

ज़्यादा से ज़्यादा वह उसकी प्रतिलिपि है
आज का स्थानापन्न कल का सूर्योदय नहीं
फिर मैं तो हर पल नया होता हुआ मनुष्य हूँ।
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कला की समझ
(भारत भवन में वरिष्ठ राजनीतिज्ञ की टिप्पणी: मुझे आधुनिक चित्रकला
समझ नहीं आती)
जहाँ लाल रंग कत्थई में विलीन होता हुआ
किसी ब्लेक होल में खिंचता चला गया है
और उधर जो उस आदमी का चेहरा
लटक गया है चमगादड़ की तरह
ये तसवीरें हमारे इसी जीवन का हिस्सा हैं
जिसे मिल गया है कला का संग -साथ
कला की समझ मनुष्यों को, उनकी मुश्किलों को
वृक्षों को, कीड़ों को, शब्दों को
नदियों को, तारों को और आँसुओं को
प्यार करने से आती है
जिन चीजों से हम करने लगते हैं प्यार
तो वे हमें हर रूप में समझ में आती हैं
जैसे हमारे बच्चे आवाज़ बदलकर बोलते हैं
मुखौटे लगाकर आते हैं या अभिनय करते हैं
तब भी हम समझ जाते हैं ये हमारे ही बच्चे हैं
कला को समझना सपनों को समझना भी है
जैसे सपनों में हमेशा कुछ जुड़ जाता है
कुछ टूट जाता है कुछ छूट जाता है
कुछ विद्रूप हो जाता है और कुछ अकस्मात्
अकसर ही उनमें कोई तर्क कोई तारतम्य
कोई औचित्य नहीं होता
वे हमारे ढर्रे के जीवन में हस्तक्षेप करते हुये आते हैं
वहाँ हम सड़क पर चलते हुये समुद्री तूफान में घिर सकते हैं
कछुआ हमसे बात कर सकता है
चिड़िया का पीछा कर सकता है त्रिशूल
या हम पहाड़ से लुढ़कते हुये अचानक
जीवित पाते हैं खुद को फूलों की घाटी में
सपने खूबसूरत होते हैं और कई बार इतने खौफनाक भी
कि हम नींद में से चौंककर उठ जाते हैं
और अपने अपराधों पर अपनी जीवन शैली पर
यहाँ तक कि सोने की करवट पर भी करते हैं विचार
ऐसी ही होती हैं कलाकृतियाँ भी
हमें अदेखी सुंदरताओं की तरफ़ ले जाती
लहरों के आवत्र्त में लपेटकर दूर फेंकतीं
वे हमें उलझा सकती हैं डरा सकती हैं
और हमारे दिमागी तंतुओं को
हिलाती हुईं पूछ सकती हैं-पहचाना हमें?
हम तुम्हारी ही खुशियाँ हैं तुम्हारे ही पाप
वे कामनाएँ जिन्हें तुम छोड़ आए थे अँधेरी कोठरी में
तुम्हारी ही सुंदरताओं और कुरूपताओं से बनी हैं हम
हमारी व्याख्या तुम्हारे भीतर है।
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अपराध

यहाँ इस जगह खरपतवार है, उधर इबादतगाह
मैं कहाँ जाऊँगा आखिर
यहाँ इस एक ही कमरे में गंदगी है, यहीं बचपन
यहाँ भूख है, यहाँ हर कदम पर निष्कासन
उस कोने में मेरे माता -पिता प्यार कर
रहे हैं
उधर बेकरी की दुकान है, उस तरफ कोतवाली
इस जगह में बीमारी, इस पटिए पर बेरोजगारी
मेरे दायीं तरफ वैभव है
सामने सूअर और उंकड़ूँ बैठने की जगह
बायीं तरफ अपमान है और उस कोने में चुनाव
-कार्यालय
संपन्न और ढुलमुल दुनिया के बीच यह एक जगह खाली है
मैं अपना एक ठिकाना यहाँ बनाता हूँ
जीवन का मोह मुझे है और इस कीड़े को भी
जो सामने दीवार पर रेंग रहा है और तुम्हें भी
सामने नदी आएगी या रेल की पटरी तो तुम रुक जाओगे
मैं पार कर जाऊँगा नदी की धारा
इसके पहले कि इंजिन के नीचे आऊँ
मैं फलाँग जाऊँगा पटरियाँ
मैं जीवन के लिए भाग रहा हूँ, तुम
बाल-बच्चों के लिए
यह मेरी कमजोरी है इसे मैं गोली से उड़ा देता हूँ
यह एक दूसरी कमजोरी इसे अपने तहखाने में रखता हूँ
यह मेरी लालसा, यह मेरा साहस, यह मेरी ग्रंथि
यह मेरी क्रूरता और यह मेरा प्रतिशोध
इन्हें मैं रखता हूँ कमीज के ऊपरी बटनों की जगह
मैं किसी कुकरमुत्ते की तरह नहीं उगा हूँ
तुम्हारी और मेरी दोनों की महत्वाकांक्षा से
प्रहसन और त्रासदी के इस अंक तक आया हूँ
अब तुम्हारी कायरता मुझे हर बार बचाती है
तुम्हारी लोलुपता मेरे लिए जुटाती है बार
-बार अवसर।
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हज़ार प्रकाशवर्ष दूर तारे के लिये
सबसे पहले दिखा जो मुझे शर्मीला
नदी की क्षीण देह में
रात के तीसरे पहर में
जब मुझे कुछ रोशनी चाहिये थी
पुराकथाओं से होकर
यह मेरे जीवन में आया
यातनाओं में सपनों में शब्दों में
मेरे शरीर में मेरी कंदराओं में रहा
शताब्दियों के पार से आया उसका उजास
टिमटिमाता कभी चमकता हुआ तेज़
अँधेरे दरिया में इसने मुझे डूबने नहीं दिया
यह हज़ार बरस पहले खो चुका अपना जीवन
और टूटता दिख रहा है आज
सँभालता रहा जो अपनी मृत्यु के बाद भी
मेरे जीवन के बरस
ओस, दूब, कोहरे और पराजयों से भरे
लंबे पचास बरस
प्यार का तारा टूटता है इसी तरह।
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जीवनयापन
मैं बादल की दिशा में जाता हूँ
घास के मैदान की तरफ
ज्वालामुखियों की तरफ जाता हूँ
और पहुँच जाता हूँ एक विशाल दफ्तर में
मेरे पास हजारों खुशियाँ हंै
मैं एक रोटी के लिये
कुर्बान करता हूँ एक खुशी
इस तरह धीरे-धीरे अनेक खुशियाँ
मैं एक शब्द खोजता हूँ
और उसे खाई में फेंकता हँू
इस तरह अनेक वाक्य
मेरी तरफ इस तरह मत देखो
मुझे शोरबा और शराब चाहिये
पलंग, मच्छरदानी, फूलवाले पर्दे चाहिये
कोट , साड़ी और नजर का चश्मा चाहिये
और इनसे भी पहले चाहिये बच्चों की फीस
अभी भी मेरे पास
हजारों सपने हैं, हजारों खुशियाँ, हजारों शब्द
मेरा यह जीवन कट जायेगा आराम से
एक लेखक भी बीमार पड़ता है
घर भर को लगती है भूख
इस नयी सदी में यह कितनी तसल्ली है
कि लेखकगण अपनी खुशियों के एवज में
कर पा रहे हैं जीवनयापन
सुनते हैं आगे अधिक मुश्किल वक्त आयेगा।
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वित्तमंत्री जी से अभिधा में
तुम नमक , अदरक, दाल, चावल पर
टैक्स लगाते हो बिना यह सोचे
कि यह कम से कम खुराक है
जो आदमी को जिंदा रहने के लिये चाहिये
तुम फूलों पर , किताबों पर, चुंबनों पर,
हारमोनियम पर , झील की सैर पर कर लगाते
हो
तुम हर सुंदरता के रास्ते को कठिन बनाते हो
कहा जाना चाहिये
तुमसे लोगों की खुशी नहीं देखी जाती
उधर पाँच आदमी रात भर में
बैठे -बिठाये पचास करोड़ कमा चुके हैं
तुम कहते हो इसमें
भला वित्तमंत्री क्या कर सकता है
तुम जिसे बीच -बीच में साफ करते हो
वह तुम्हारे चश्मे पर आहों की भाप है
तुम्हारी आवाज को कुछ नहीं हुआ है
वह सीमेंट के गोदाम में से
या किसी टावर से आती हुयी सुनायी देती है।
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कवि
(जागे अरु रोवे)
पीले पड़ रहे पत्ते के लिये कभी एक आवाज़ के लिये
एक स्वप्न के लिये वह अपने को बरबाद करता है
किसी दुख के लिये कभी एक हिचकी के लिये
उठती हुए धुएँ के लिये वह खुद को बरबाद करता है
उसे कौन बचा सकता है जो किसी न किसी बहाने
खुद को ही बरबाद करता है
और खुश होता है
उसके सामने हारे हुये मुकदमे आते हैं लेकिन वह लड़ता है
उसकी मुश्किलों का अंत यहीं नहीं होता
रात उस पर मादा चीते की तरह झपटती है
लंबी घास और चित्ताकर्षक झाड़ियों के पीछे
वह खुद का ही मांस चखता है
सदियों से वह खुद को उजाड़ने का कारखाना चलाता है
उस चूजे के साथ वह अभी तक रहता है
जो पैदा होते ही बन गया था निवाला
आखिर उसकी विकलता उसके लिये
कटार हो जाती है
कभी -कभी उम्मीद
उस पर बर्फ की तरह गिरती है।
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